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Devakee Dhokane

Abstract

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Devakee Dhokane

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क़लम...

क़लम...

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हर पल ग़ुजर ज़ाता है 

हमारे ग़ुजरे हुए कल के साथ ।

और उसी में ग़ुजर ज़ाती है

हमारी सारी ऱात ।

फ़िर भी हम उसी की करते हैं बात ।

बहाने ढ़ूढ़कर हम सच से बचते हैं 

लेकिन फ़िर भी हम बीती हुई बातों के बारे में ही सोचते हैं ।

हर लम्हा बीत ज़ाता हैं सोचने में 

और क़लम ख़ो जाती हैं कविता ऱचने में ।



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