क़लम...
क़लम...
हर पल ग़ुजर ज़ाता है
हमारे ग़ुजरे हुए कल के साथ ।
और उसी में ग़ुजर ज़ाती है
हमारी सारी ऱात ।
फ़िर भी हम उसी की करते हैं बात ।
बहाने ढ़ूढ़कर हम सच से बचते हैं
लेकिन फ़िर भी हम बीती हुई बातों के बारे में ही सोचते हैं ।
हर लम्हा बीत ज़ाता हैं सोचने में
और क़लम ख़ो जाती हैं कविता ऱचने में ।
