प्रेम
प्रेम
व्योम ने उतारा अधरों से वर्षण को
मिट्टी में मिल सोंधी सुगंध बनी
बनी बिगड़ी बात बहुत बार बैरी
बैरन रात मनवा हाथ उठाए चली
जली कटी जान मेरी कई बार छटी
पिया क्यूँ ना पग लाए मेरी गली
उठ झरोखे निहारूं पट खोलूँ मारूँ
राह देखे कान्हा तेरी बरसाने लली
