प्रेम सिर्फ़ प्रेम है
प्रेम सिर्फ़ प्रेम है
नाम और रूप चाहे कितने भी हों
लेकिन प्रेम – सिर्फ प्रेम है
सतत और अनवरत प्रवाहित मलयानिल सा…
अनादि अनन्त / बोधगम्य / समस्त ज्ञान से परे अगम्य भी
जिसने जैसा समझा मान लिया वैसा ही…
कभी लगता पवित्र नदिया के जल जैसा
निरन्तर उद्वेलित होता तन और मन में…
प्रेम का स्वर कभी सुनाई पड़ता
कान्हा की वंशी सा दिव्य और मधुर
आह्लादित करता रोम रोम को हर क्षण प्रतिपल…
कभी झनकारता राधिका के नूपुर सा
घोलता हुआ कानों में मधुर रस
सुनकर जिसे झूम झूम उठता है
तन के साथ मन भी…
तो कभी करता विषपान भी मीरा की भाँति
देने को परीक्षा अपनी गहनता की…
झोंक देता कभी ऊँची उठती ज्वाल में निज गात को
सीता की तरह देने को अग्नि परीक्षा
अपनी तपस्या की…
कभी भोर की प्रथम किरण के साथ गुँजाती
मन्दिर की घण्टियों सा
तो कभी संझा को निज नीड़ लौटते
पंछियों के कलरव सा…
कभी आँगन में खड़े तुलसी के बिरवे सम
लुटाता अपनत्व
जब जलाते नेह दीपक भावनाओं का
समक्ष उसके…
तो कभी खिल उठता
पूजा की थाली में सजे पुष्पों की नाईं
इस आशा में
कि अर्पित किया जाएगा कामदेव को
क्योंकि जगाना है शिव को उनके ध्यान से…
गंगा यमुना के संगम को छिप छिप कर ताकती
मन ही मन मुस्काती सरस्वती भी तो
भावना है प्रेम की ही…
प्रेम ही तो है बसा हुआ धड़कन बन हर हृदय में
अनात्म होते हुए भी जो है परमात्मा
क्योंकि करता है निवास इसी मर्त्य शरीर में…
वही स्वयं ही है शब्द भी और वही स्वयं है अर्थ भी
रच जाते हैं जिनके मेल से
न जाने कितने महाकाव्य और उपन्यास…
अन्धा कहो / शून्य कहो / या कह दो पागल भी
लेकिन रहेगा प्रेम सदा शाश्वत चिरन्तन सत्य…
तभी तो किया है मैंने दीपदान
अँजुलि में भर प्रेम को ही
प्रेम की ही पुनीत त्रिवेणी में
ताकि पहुँच सके वह लक्ष्य तक अपने
जो है अन्त में स्वयं प्रेम ही…
