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KatyayaniDrPurnima Sharma

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अलसाई सी भोर

अलसाई सी भोर

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अलसाई सी भोर सुहागिन उतर रही पायल झनकाती ।

नभ की छत से अरुण उषा की सीढ़ी पर इठलाती आती ।।

नभ में रात चाँद था छाया, नीर चाँदनी का फैलाया ।

उसकी ही नैया पर चढ़कर दुल्हनिया निज पी घर आती ।।

रूप बहा कुछ मन्द पवन संग, नयन झुके लज्जा से बोझिल ।

कलित कपोलों पर गुलाल सी रक्तिम आभा है मुसकाती ।।

स्वागत में कुछ पँछी चहके, बेला और चमेली महके ।

सकुचाई सी रजनीगन्धा, सिमट स्वयं में ही है जाती ।।

कहे सुहागिन भोर, मृत्तिका निर्मित एक काया जैसी मैं ।

रंग सुगन्ध सभी कुछ मुझमें प्रकृति तुम्हारी है भर जाती ।।

तुमने गूँथ नेह के रंग से, एक सुन्दर मूरत गढ़ डाली ।

ना दोपहरी, ना ही संझा, मैं निशिचर के पीछे आती ।।

मेरा न कोई अपना है, ना कोई पराया शेष बचा है ।

सींचो प्रेम सलिल से, तब मैं, एक कली से पुष्प खिलाती ।।

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