अलसाई सी भोर
अलसाई सी भोर
अलसाई सी भोर सुहागिन उतर रही पायल झनकाती ।
नभ की छत से अरुण उषा की सीढ़ी पर इठलाती आती ।।
नभ में रात चाँद था छाया, नीर चाँदनी का फैलाया ।
उसकी ही नैया पर चढ़कर दुल्हनिया निज पी घर आती ।।
रूप बहा कुछ मन्द पवन संग, नयन झुके लज्जा से बोझिल ।
कलित कपोलों पर गुलाल सी रक्तिम आभा है मुसकाती ।।
स्वागत में कुछ पँछी चहके, बेला और चमेली महके ।
सकुचाई सी रजनीगन्धा, सिमट स्वयं में ही है जाती ।।
कहे सुहागिन भोर, मृत्तिका निर्मित एक काया जैसी मैं ।
रंग सुगन्ध सभी कुछ मुझमें प्रकृति तुम्हारी है भर जाती ।।
तुमने गूँथ नेह के रंग से, एक सुन्दर मूरत गढ़ डाली ।
ना दोपहरी, ना ही संझा, मैं निशिचर के पीछे आती ।।
मेरा न कोई अपना है, ना कोई पराया शेष बचा है ।
सींचो प्रेम सलिल से, तब मैं, एक कली से पुष्प खिलाती ।।
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