प्लास्टिक एक अफ़सोस
प्लास्टिक एक अफ़सोस
चलो दो कदम पीछे चलते है
थोड़ा अपने बिते वक़्त से मिलते है
बिना बनावट बिना सजावट
वो पुरानी प्रकृति से मिलते है
तुम्हे आधुनिक दुनिया में
प्लास्टिक से दूर ले जाते है
मेरे बचपन की यादों में
फिर से खो जाते हैं
तब कागज के पेपर में
माँ रोटी लप्पेट के लती थी
जब दादी माँ की झोली में
मिठाई बंधी होती थी
प्लास्टिक बैग का तभी कोई
नामोनिशान नहीं होता था
कपड़े और बोरी में
पूरा राशन घर आता था
गर्मियों की छुट्टियों में
ठन्डे हवाओं के झोंके थे
न प्लास्टिक के ACs ना
कोई फ्रिज हुआ करते थे
ठंडे वो में चाय
कुल्लड़ में मिलते थी
बताओ उसकी खुशबू प्लास्टिक के
कप में थोड़ी ही होती थी
दुकानों में खिलोने
कांच में ही खिलते थे
उनको ना कभी प्लास्टिक
के कवर हुआ करते थे
घर का कचरा भी तब
खेतो में खाद हुआ करता था
प्लास्टिक और उस कचरे का
दूर दूर तक ना कोई नाता था
नदी, तालाब समुन्दर
पानी से ही उभरते थे
प्लास्टिक के ढेर तब
कहाँ कोई मिलते थे
जँवार कों के जीवन में
भी तक सुकून हुआ करता था
बोलो दोस्तों प्लास्टिक खाने से
तब कहा कोई पशु मरता था
बच्चों, ऐसा मेरा
कल हुआ करता था
बिना महामारी के
जीवन पूरा गुजर ता था
काश मैं तुमको
मेरा बचपन दे पता
आज के दुनिया में
भी कल जैसा स्वर्ग होता
तुम ना इससे बचोगे
अपने हातो खोजोगे
देकर के प्लाटिक की
दुनिया को खुद
प्लास्टिक हो जाओगे
हर जगह ये पड़ा होगा
नदियों से भी बहता होगा
जलता हुआ इसका धूआ
अपने साँसों में रहता होगा
फिर भी कहता हूँ
दिल से मनो पुरे मान से
अब भी वक़्त है न करो
ज्यादा प्लास्टिक पे विश्वास
बस यही अफसोस जताओगे
या आगे कदम बढ़ाओगे
आने वाली पढ़े को फिर
तुम क्या हिसाब दिलाओगे।
