पहला परिचय
पहला परिचय
सुनो!
तुमसे यूँ ही बातें करना अच्छा लगा
बोला कम, तौला ज्यादा, पर अच्छा लगा।।
नया- नया सा परिचय और नयी - नयी सी बात
शब्द कुछ अटकते से, इठलाते जज़्बात,
कुछ कही, कुछ रह गई मन में मन की बात
फिर भी मन कहता है कि, जो भी हुआ, अच्छा लगा।।
अद्भुत सा रोमांच वह, दूरी में निकटता का
वाह्य जगत से हटकर कुछ, तुम में ही सिमटता सा,
कस्तूरी मृग की तरह, सर्वत्र दिग-दिगंत में
एक तुम्हारे रूप को खोजना अच्छा लगा।।
कनखियों से देखना, तुम्हारे गर्वित रूप को
उसमें ही निहारता, प्रकृति के प्रतिरूप को,
ईश्वर की रचना अनूप, तुम्हारे इस अस्तित्व में
ख़ुद का ही अस्तित्व भूलना, जाने क्यों अच्छा लगा।।

