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फिर आ गया लौट के सावन

फिर आ गया लौट के सावन

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अच्छा लगा तू वापिस आया तो
लेकिन… सुन…
तेरे आने से कितना अस्त-व्यस्त हो गया वो पता है तुझे?
फिर से मुझे छत पे सूख रही यादों को सिमटने दौड़ना पड़ा (भीग ना जाए बेचारी?)
फिर से देर तक रिमझिम गिरती बूंदों में कोई भीगता दिखाई देने लगा…(और कौन?)
फिर से अनजाने में ही सूखे बालो को तौलिये में लपेट लिया…
फिर से तुझ से घबराकर एक चिड़िया घर में आ गई…(और हम दोनों देखते रहे… मैं तुझे और वह अपने घोंसले को)
फिर से लगा की आंगन से किसी ने ‘दो गर्म चाय' की आवाज़ दी हो…(और एक प्लेट पकोड़े भी…)
फिर से अलमारी में रखे कपड़ो के नीचे से डायरी निकालनी पड़ी…(कमबख्त वह तो वैसे भी भीगी होती है)
फिर से आँखों से निकले पानी ने तेरे पानी में मिलकर आँगन में बाढ़ ला दी…
फिर से पूरा दिन ऐसी ही बीता… बैठे-बैठे… तुझे बरसता देखने में
फिर से खुली खिड़की पे हाथों को तकिया बनाकर रात गुज़ारनी पड़ी…(नींद कहा आती है ऐसे में?)
देखा तूने…? कितना अस्त-व्यस्त हो गया सब कुछ…
लेकिन…फिर भी…
अच्छा लगा तू वापिस आया तो…
मुझे लगा तू अब वापिस नहीं आएगा… उसकी तरह…
एक बात बता…?
तू अकेला क्यों आया?
क्यों नहीं लाया उसको भी साथ में?
जिसे तू पिछली बार ले गया था अपने साथ…
बता ना… बोल ना…


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