पहेली सा प्यार
पहेली सा प्यार
ना गोरी थी
ना काली थी
ना अच्छी थी
ना बुरी थी
ना सुंदर थी
ना असुंदर थी
वो रोज
आती थी
चली जाती थी
क्यों आती थी
क्यों जाती थी
पता नहीं
ना दुश्मन थी
ना दोस्त थी
उसको देखता तो
कुछ भी नहीं होता
लेकिन न देखता तो
कुछ कुछ दिल में होता
कुछ कसक होता
कुछ हुक सा उठता
सब मिलकर
बहुत कुछ होता था
उसने हमें
कभी देखा नहीं
मैं उसे चोर निगाहों से
कभी कभी देखा
वो हमेशा के लिए
चली गई
अरसा बीत गए
लेकिन अब भी
याद आती है
खूब याद आती है
पहेली थी
अबूझ थी
वो मेरे लिए क्या थी
कहीं ये प्यार तो नहीं थी
