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Khushi Kumari

Abstract

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Khushi Kumari

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ओ कृष्ण

ओ कृष्ण

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ओ कृष्ण बोलना तू कहां है?

हूं बहुत बेचैन मैं, बोलना तू कहां है?

मेरे दिल में जो तूफान उमड़ता हैं, तू उसकी रजा है

मेरी आंखों मे जो झलकता हैं, तू उसकी चमक है

मेरी सांसों में जो बसता हैं, तू वो खुशबू है

मेरी हृदय में जो उटता हैं, तू वो हर्ष है

मेरी चेहरे पर जो दिखता हैं, तू वो अदा है

तू हैं मेरे हर हिस्से में, ना जाने फिर भी क्यूं तू मुझसे जुदा है

ओ कृष्ण बोलना तू कहां है

हूँ बहुत परेशान मैं, बोलना तू कहां है।

खुद का पता धुंढते-धुंढते थक गई हूँ,

आकर एक बार राह दिखादे।

जिम्मेदारियों में अब बंधती जा रही हूँ,

आकर कुछ तरीके सिखादे।

दिल की वासनाओ से भाग रही हूँ,

आकर मुझे ढेराव दे।

जिन्दगी के कस्मकश में उलझती जा रही हूँ,

आकर ज़रा सुलझादे।

धीरे-धीरे खुद को बदलती जा रही हूँ,

आकर तसल्ली तो दिलादे।

छोटी-छोटी बातों से रूट जाया करती हूँ,

आकर मुझे समझादे।

हैं मझधार में मेरी नईया, आकर पार लगादे।

हैं कहते हैं लोग मुझे बावरी, आकर इन्हे डांट लगादे।

है ज़रा तबियत दब मेरी, आकर दवा तो करा दे।

मेरी व्योम मंडल की अग्नी को शान्त कर, मुझे सुकून दिलादे।

है दिल में कई सवाल, आकर सारे सवालों के जवाब दे।

फिल-हाल बस एक सवाल, अपना पता तो बतादे।

खुद आ जाया करूंगी तेरे पास, बस एक बार इशारा तो करदे।

फिर ना करूंगी तंग ये पूछ कर-

ओ कृष्ण बोलना तू कहां है?

हूँ बहुत बेसबर कबसे में, बोलना तू कहां है?



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