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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Inspirational

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Inspirational

निवृत्ति

निवृत्ति

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जिनसे निवृति करनी थी 

उनसे आसक्ति कर बैठे 

जिनमें आसक्ति करनी थी 

उनसे निवृति कर बैठे । 

परमपिता परमेश्वर के अंश हैं हम

सिर्फ उन्हीं से आसक्ति करनी थी

पर उनके अलावा हर किसी से 

नाता जोड़कर ये क्या कर बैठे । 

शरीर को ही सब कुछ समझने की

हाय , ये कैसी भूल कर बैठे 

मैं, मेरा से आगे बढ नहीं पाये 

काम क्रोध मद लोभ की गोद में जा बैठे 

अब लेनी है राग - द्वेष , सुख - दुख 

हानि - लाभ , जीवन - मरण , हर्ष - विषाद 

ईगो, अहंकार से निवृति मोह माया से निवृति 

खुद को "शरीर" समझने की प्रवृति से निवृति । 

अब भी समय है अभी कुछ नहीं बिगड़ा है 

कामनाओं से निवृति लेकर जीवन सुधर सकता है 

ईश्वर सत्य है , सिर्फ उनमें आसक्ति रखनी है 

भक्ति योग और कर्म योग से मोक्ष मिल सकता है।

 



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