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Janki Punjabi

Abstract

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Janki Punjabi

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नारी

नारी

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सदीयों पहले जब होती थी बेटी, लेना चाहती थी वो जन्म करना चाहती थी वो दुनिया में प्रवेश, कन्या भ्रूण हत्या के नाम का सूनाया जाता था आदेश।

जाने क्यों नन्ही परी की चढ़ा दी जाती थी बली। दुनिया क्यों करती थी आलोचना बेटी के आने की जबकि थी वो ज़रूरत आंगन ओर जमाने की।

जिस बेटी की तुम करते हो निंदा, क्या बिन उसके जीवन बनता? कन्या भ्रूण हत्या कर बेटा तो ले आते, पर बिन बीवी के वंश कैसे बढ़ाते? यह सोचकर समाज ने दिया जन्म अधीकार समान, फिर भेद कर,‌ कर दिया बेटी का अपमान।

फिर आया वो दौर जब लगता था "बेटी बचाओ" का नारा, बाल विवाह कर छा जाता था उसके जीवन में अंधियारा।

खोली थी आंखें उस नन्ही सी परी ने, संजोया था सपना उन नन्ही सी आंखों ने, करछी पकड़ाकर जिम्मेदारी सौंप कर, सपनों कि जगह ले ली आंख से बेहते हुए पानी ने।

धीरे धीरे जागरूत हुआ संसार, किया "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" का प्रचार, लगा अब मिलेगा अधीकार समान, सोचा आया हे नया विचार।

सोचा होगी क्रांति, आखिर मिलेगी बेटी को शांति, नारे‌ लगे, आग उठी, पर सोच कि न हुई बढ़ौती।

शुरुआत हुई आखिर आया वह समय, स्कूल, कोलेज और दफ्तर तक उठाया कदम, देखी न गई तरक्की बेटी की, आलोचना से घोंटा दम।

न रुके कदम, न झुकी नज़र, आखिर वो दिन आया जब तय किया घर से आसमान का सफर, पर थी कुछ लोगों कि बुरी नज़र, तोड़ दिया वो अभीमान बल जबरी के जोर पर।

चाहे हो हत्या, लगाई हो अनगिनत बंदिशें या की हो तानो की बौछार, फिर भी बेटियों की मुकम्मल हर वो कोशिश ने किये सारे सपने साकार।

आज ये सोचकर आती हे शर्म, ये भूमि जहां बेटियों को दिया जाता हे दर्जा लक्ष्मी का, ओर इसी जगह जबरन लूटी जाती हे इज्जत या लगता है मोल बेटी का।

लगता है बिक चुके कुछ लोगों के ज़मीर, लगता है भूल गए इन्सानों ओर दरिंदों के बीच का अंतर, अगर याद होता ये फर्क, तो न दिखाया जाता आरूषि, निर्भया या कइयों को जीतेजी नर्क।

आज हम भारत के नागरिक, हे स्वतंत्र अंग्रेजों के राज़, पहेनाव ओर विचार से, पर जब आता हे विचार औरतों के हक़ का, उनके पहेनाव या उनके ढंग का, हवा के रूख कि तरह मोड़ लेती हे उनकी सोच और छिन ली जाती हे स्वतंत्रता उनसे।

नया भारत तो बन गया बनाए गए कुछ नए कानून, आशा हे एक दिन आएगी सोच ऐसी,‌ जो देगी हम बेटियाें को दो पल का सुकून।

इंतजार रहेगा उस घड़ी का जब न होगी किसी मासूम की हत्या, न होगा कोई भेद लींग का और आखिर देखेंगी हर उठी नज़र हमें सम्मान से, बस गुज़ारिश है हमें उस वक़्त से जो दिखाएं हमें बदलाव जल्द से।


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