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PRAJAKTA AGASHE

Abstract

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PRAJAKTA AGASHE

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मत पूछो !

मत पूछो !

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मत पूछो इन हवाओं से,

उनके बहने का आलम ..

तबाही तो भीतर के तूफानों से हुई थी !!


अंजान राहों से गुजरने पर..

मत पूछो , अब "क्या लगता है डर ?"

जानकार भी अंजान जब अपने ही हो गए थे !


दुनिया ने सिखा दी, दुनियादारी 

जब अपनों ने अपनाना छोड़ दिया..

मोड़ आने से पहले ही 

अनजाने में खुद को मोड़ लिया 


उन गलियों की चाह छोड़ दी ,

उन घटाओं ने आह तोड़ दी 

जब अपनों को मनाते मनाते ..

हम ही ने रूठना छोड़ दिया !!


मत पूछो , अब "क्या लगता है डर ?"

जानकार भी अंजान जब अपने ही हो गए थे !


मत पूछो इन हवाओं से,

उनके बहने का आलम ..

तबाही तो भीतर के तूफानों से हुई थी !!



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