मत पूछो !
मत पूछो !
मत पूछो इन हवाओं से,
उनके बहने का आलम ..
तबाही तो भीतर के तूफानों से हुई थी !!
अंजान राहों से गुजरने पर..
मत पूछो , अब "क्या लगता है डर ?"
जानकार भी अंजान जब अपने ही हो गए थे !
दुनिया ने सिखा दी, दुनियादारी
जब अपनों ने अपनाना छोड़ दिया..
मोड़ आने से पहले ही
अनजाने में खुद को मोड़ लिया
उन गलियों की चाह छोड़ दी ,
उन घटाओं ने आह तोड़ दी
जब अपनों को मनाते मनाते ..
हम ही ने रूठना छोड़ दिया !!
मत पूछो , अब "क्या लगता है डर ?"
जानकार भी अंजान जब अपने ही हो गए थे !
मत पूछो इन हवाओं से,
उनके बहने का आलम ..
तबाही तो भीतर के तूफानों से हुई थी !!
