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Girijesh Singh

Abstract

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Girijesh Singh

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मिल गया मैं

मिल गया मैं

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खोजता था मैं जिसे, वो आज मैं मुझमें मिला

मुझमें ही था वो मैं मेरा, पर मैं मिला उसे आज ही

अंजान था उस मैं से अब तक, जो मैं मिला मुझे आज ही

मेरा मैं मुझी में था छिपा, और मैं उसे नहीं जानता

मैं खुद को मैं था सोचता, पर मैं मेरा मुझ सा नहीं

मेरे मैं का क्या अस्तित्व था, मैं आज तक समझा नहीं

मैं और वो मिल एक होकर, हम हैं हमेशा साथ ही

पर दूध पानी का मिलन यह, अब मैं अलग मेरा मैं अलग

उस मैं में थी जो शुद्धता, इस मैं में विष था तब मिला

जो मिल गया मैं ये मेरा, अब मैं अलग और विष अलग

मैं ही मेरा बस था मेरा, मैं ही मेरा भगवान था

मैं से शुरू मैं पर खतम, यह मैं तो बस इंसान था

मैं ही जगत में था कभी, मैं मे जगत अब आ गया

मैं ये मुझ में ही था कभी, अब मैं इस मैं में समा गया!


                    


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