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Sudhirkumarpannalal Pratibha

Abstract Inspirational

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Sudhirkumarpannalal Pratibha

Abstract Inspirational

मेरी बेटी

मेरी बेटी

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मेरी

बिटिया

बड़ी

हो

रही

है

अपने

बल

पर

खड़ी

हो

रही

है

गिरती

है

फिर

उठती

है

तोतली

भाषा

में

वह

मुझको

पापा

पापा

कहती

है

मेरा

पैर

पकड़कर

वो 

झट

से

खड़ी

हो

जाती

है

मेरे 

गोदी

में

आने

की

खातिर

जिद

वो

करने

लगती

है

मेरी

बेटी

अब

बड़ी

हो

रही 

है

अपने

दम

पर

अब

खड़ी

हो

रही

है

जब

वह

काफी

छोटी

थी

केहाक

केहाक

कहकर

रोती

थी

पालने

में 

वो

पड़ी

रहती 

थी

उसकी 

मां

कोई

काम

कर

रही

होती

मै

जब

उसके

पास

जाता

तो

वो

चुप

हो

जाती

थी

मुझे

देखती

अपलक

वो

मुझे

निहारती

अपलक

वो

काफी

देर

तक

चुप

रहती

मानो

खुद

को

गोद

में

उठाने

की

प्रतीक्षा

करती

और

जब

मैं

उसे

गोद

में

उठाता

मुस्कुराकर

वो

मुझसे

चिपक

जाती

थी

वह

अब

थोड़ी

और

बड़ी

हो

गई

धीरे

धीरे

चलती

है

धूल

में

सनी

रहती

है

उसके

हाथों 

का

काड़ा

और

पैरो

के

पायल

से

रुनझुन

रुनझुन

की

आवाज

है

आती

घर

आंगन

गुंजयमान

रहता

कितना

प्यारा

लगता

घर

कितना

न्यारा

लगता

आंगन

जब

वह

जन्म

नहीं

ली

थी

तो

सब

कुछ

जीवन

में

उदास

सा

था

ना

हीं

कोई

मकसद

था

उसके

जन्म

लेने

के

बाद

हीं

जीवन

में

उल्लास

गया

जीने

का

मकसद

मिल

गया

है 


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