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athira mohan

Abstract

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athira mohan

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मेरा ख्वाब

मेरा ख्वाब

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जीने की कोई इच्छा नहीं

नहीं है कोई ख्वाब मेरा 

जीना है खुलकर मुझे  

पर जी रही हूँ पुतला बनकर 


मन करता है कि जियूं, 

अपनी ज़िन्दगी जी भर के 

पर लगता है भगवान को है 

कुछ और ही चाहतें मुझसे

 

छोड़कर जाना हे मुझे इस दुनिया को,

जो कभी न अपना सके, मेरे दर्द को 

जिया है मैं ने हर पल मर के 

जीना है अभी खुलकर 

पर सपना है यह मेरा, 


जो कभी न होंगे साकार  

अधूरा है सपना मेरा

दूर हे हकीकत से अभी भी

काश कर पाती मैं, इस ख्वाब को सच,

जी सकती अपनी ज़िन्दगी को

अपने ही मर्ज़ी से, अपने बल पर।


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