कवि की कविता
कवि की कविता
यूँ तो कविता लिखना ना कभी किसी ने सिखाया,
ना ही किसी ने कविता लिखने की दरखवास्त की,
पर ये लीजिए,
हम यहाँ लिखते हैं वो पंक्तियाँ
जिन्मे हो सकती हैं कई ग़लतियाँ।
हम इश्क़ का दीदार करते हैं,
तो लिखते हैं,
हम बयान करते हैं,
किस तरह पनपती मोहब्बत मैं हमारा दिल बेचैन होकर गुलाटियाँ मारता है,
हम बयान करते हैं,
किस तरह हमारा चंचल मन कभी-कभी उदास हो जाता है,
हम बयान करते हैं,
किस तरह एक प्रेमी का दिल टूटता है,
हम बयान करते हैं,
किस तरह छोटी मोटी ख़ुशी से दिल फूल उठता है,
हम उजाले में बैठ अंधेरे के बारे में लिखते हैं,
हम अंधेरों में बैठ उजाले के बारे में लिखते हैं।
हम बयान करते हैं ज़िंदगी का मक़सद,
ना हो तो लिख देते हैं कुछ पेड़, पौधे, बादलों के ऊपर,
वो भी ना हो तो बयान करते हैं रूखसत,
नहीं है हमारे मन में कोई भेद भाव,
लिखते हैं ख़ुशियों पर भी,
लिखते हैं उदासियों पर भी,
हम बयान करते हैं खुद को और उन लाखों लोगों को,
जिन्हें दुनिया समझ नहीं पाती।
कविता उल्लास लाती है, कविता अमन लाती है,
वह देती है एक वजूद,
जो खो चुका है इस भीड़ भाड़ में।
दुनिया तो हमें बेबस आत्मा मानती है,
जो पंक्तियों में अपना घर दूँढती है,
एक दूसरे को सहारा देते हुए,
छोटी छोटी ख़ुशियाँ बाँटते हुए,
क्यूँकि काग़ज़ में लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ,
बहुत कुछ बयान कर जाती हैं।
