कुदरत की छांव तले
कुदरत की छांव तले
माटी की प्यास बुझाने को आसमां में
उमड़ घुमड़ रही हैं मस्त घटाएं काली
होकर बेकरार मचल रहा है चातक
क्षितिज के अधरों पर खिली है लाली
मत पूछो मिजाज क्या है दरखतों का
खिलखिला रही है सरसों की दिवानगी
हथेली में फुहार लेकर गरजा है सावन
देखी सबने बावरे बादलों की आवारगी
नव जीवन की पावन बेला बिखरी है
माथे पर तिलक मुट्ठी में हैं रंगीन सपने
दूर तक फैली रेशमी चादर विकास की
धरती से अम्बर तक हैं अरमान अपने
बेईमान मौसम हुआ है आज मतवाला
बहारों ने कहा ईश्क की कोई बात करें
सनन सनन बहती हवाओं ने है पुकारा
साकी की मधुशाला में सुहानी रात करें
ये बहकी जिंदगानी फिर मिले ना मिले
बचपन के यारों से चलो मुलाकात करें
मिल बैठेंगे जब चार यार महफिल में
पैमाने छलकाकर कोई खुरापात करें
बेला की नव पंखुड़ियों ने नयन खोले
मधुमास का मौसम लौटकर है आया
मुस्कुराके कलियों ने घूंघट पट खोले
जिधर नजर दौड़ाओ ईश्क का साया।

