खुशियों के दीप जलाते हैं
खुशियों के दीप जलाते हैं
लगती है क्यों जान सस्ती?
मुल्कों के हुक्मरानों को।
बेवजह कुर्बान हैं करते,
अपने वीर जवानों को।
हर मुल्क लदा हथियारों से,
तादाद बडी है दिवालों की।
सेहत खराब है हर मुल्क की,
जरूरत है अस्पतालों की।
मजहब, जाति अलग सही,
रगों में खून, एक सा जान लें ।
अमन, चैन से रह सकते है,
गर मन में, हम सब ठान लें ।
जहन में जो भरी है नफरतें,
चलो, प्यार से इन्हें भूलाते हैं ।
एक तू जला, एक मैं जलाऊँ,
मिलकर, खुशियों के दीप जलाते हैं ।
