STORYMIRROR

Alok Rai

Abstract Inspirational

1.2  

Alok Rai

Abstract Inspirational

खुला आकाश

खुला आकाश

2 mins
28.4K


बंद पिजड़े से आस भरी आँखों से देख रही थी मौसम प्यारा,

बसंत बीता, बरखा बीती आया सावन न्यारा 

 

नित नया सवेरा आता, इक उम्मीद लिए वो उठ जाती 

देखती पंछियो का कलरव और उनकी कलाबाजियां , उसको थी आजादी भाती 

 

चाहरदीवारी का यही कोना उसको सबसे ज्यादा भाता था,

जहाँ से खूबसूरत , खुला आकाश नजर आता था ।

 

लोग आते थे किसी मकसद से, नजरे बदन पर फेरते 

मैं बेपरवाह गुमसुम खिलौना वो मेरे जिस्म से खेलते ।

 

आंसू बहते रहते, साल बीत गए ये सहते 

आंसू बहते रहते, साल बीत गए चाहरदीवारी में रहते

 

तब खुला आकाश था मेरा छत, 

रहने को घर ढूंढती थी ।

 

लिये अपने भाई को गोद में , कुछ पैसो के लिए पूरा शहर घूमती थी ।

 

भूखी थी पर खुश थी, न जाने किसकी नजर लग गयी ।

मैं माँ बाबा से दूर इस कोठे पे बिक गयी ।

 

ख्वाब आते थे, सोचती उन ख्वाबो में ही जिंदगी बीत जाती,

काश इस घुटन भरी मौत से जिंदगी जीत जाती ।

 

इक राजकुमार आएगा, इक राजकुमार आएगा। 

मुझे मेरी दुनिया से दूर उस खुले आकाश में ले जाएगा ।

 

मेरी वीरान अधूरी सी दुनिया में रंग भर जाएगा,

 

मेरी अँधेरी जिंदगी में उजाला लाएगा ।

न जाने कब वो राजकुमार आएगा 

बन्द पिजड़े से आस भरी आँखों से देख रही थी मौसम प्यारा 

बसंत बीता, बरखा बीती, आया सावन न्यारा ।

 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Alok Rai

Similar hindi poem from Abstract