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Anupama maheshwari

Abstract

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Anupama maheshwari

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खुद से भी मिल लो कभी

खुद से भी मिल लो कभी

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जय गणेश


आज सुबह जब आईने के सामने से निकली तो एक जानी-पहचानी सी आवाज ने मुझे रोका और न जाने क्या -क्या कहकर टोका। 


ओ प्यारी सी "मैं" जरा इधर तो देखो,

बहुत जरूरी कुछ कहना है, कुछ पल तो रुको। 


सुबह से शाम सिर्फ भागती रहती हो,

चंद सांसे फुरसत की कभी तो ले लो। 


एक ही हो किरदार न जाने कितने निभाती हो तुम,

जिंदगी भी तो एक ही है, न हो जाए गुम। 


करो परवाह सबकी कोई गिला नहीं,

पर खुद को दरकिनार करना क्या है सही??


जानती हूँ समय नहीं है तुम्हारे पास ,

पर दो घड़ी की तो मैं भी रखती हूँ आस। 


इन बिखरी जुल्फों को कभी तो संवारने आओ

बहुत हुआ इंतजार अब कुछ लम्हे खुद के नाम भी कर जाओ।



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