STORYMIRROR

Anupama maheshwari

Abstract

4  

Anupama maheshwari

Abstract

खुद से भी मिल लो कभी

खुद से भी मिल लो कभी

1 min
29

जय गणेश


आज सुबह जब आईने के सामने से निकली तो एक जानी-पहचानी सी आवाज ने मुझे रोका और न जाने क्या -क्या कहकर टोका। 


ओ प्यारी सी "मैं" जरा इधर तो देखो,

बहुत जरूरी कुछ कहना है, कुछ पल तो रुको। 


सुबह से शाम सिर्फ भागती रहती हो,

चंद सांसे फुरसत की कभी तो ले लो। 


एक ही हो किरदार न जाने कितने निभाती हो तुम,

जिंदगी भी तो एक ही है, न हो जाए गुम। 


करो परवाह सबकी कोई गिला नहीं,

पर खुद को दरकिनार करना क्या है सही??


जानती हूँ समय नहीं है तुम्हारे पास ,

पर दो घड़ी की तो मैं भी रखती हूँ आस। 


इन बिखरी जुल्फों को कभी तो संवारने आओ

बहुत हुआ इंतजार अब कुछ लम्हे खुद के नाम भी कर जाओ।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract