कद्र
कद्र
पति कद्र करता तो यह नहीं होता।
दुर्योधन आंख उठा, ग़लत सोच ना रखता।
कैसे मजाल कोई आंखें उठा देख ले।
चीर हरण तो क्या, अपशब्द बोल ले।
जिंदगी सुकोमल सुकन्याओ की रहती है।
दैत्य दानव दहेज के हुंकार से मरती है।
लाखों करोड़ों अब तक महिलाएं मर गई।
बेकसुर घर की बाला तन अग्नि को सौंप गई।
अरमां उनके भी थे, फिर ना उन्हें मिले।
एक ग़लत सोच आदमी की औरतें से जग हिले।
चीख तो निकली ही होगी, जौहर के सीन में।
हकीकत बयां क्या करती, रानी वन में।
देवी भी भटकी यहां क ई अबलाए अटकी है।
गिनती असंख्यों में है, वे यहा झटकी है।
सौंपे गए हाथ से हाथ कभी ना छुटे तो।
उतम जिंदगी रहती, घुंघट में मुख है तो।।
एक बालिका से नारी बनते ही उठे चेहरे।
वे हंसते मिलने लगे, जो खूद पापी लिए हरे।
आज बस इतनी सी बात बाबुल और पति की है।
वटवृक्ष के छांव में ही हर देवी सती की है।।
महादेव की महिमा हो, या राम की सीता हो।
पति बिना अनाथ बनकर, जग ताने देता है।
भूल आते जालिम यह नर इनके घर भी बेटी है।
जंवाई अच्छा ना मिला तो, ह्रदय में खंजर की सीटी है।
इसलिए पराए घर की नारियों का मोल करो।
