जीवन के आइने में
जीवन के आइने में
जीवन के आइने में ******** मृत्यु जीवन की एक प्रक्रिया, एक अनुभूति है, जिसका आनंद हम लेना ही नहीं चाहते बस! केवल डरते रहते हैं। जीवन की सबसे बड़ी ग़लती और जानबूझकर अपराध करते हैं। आखिर हम ऐसा क्यों करते हैं? मृत्यु को अपना क्यों नहीं मानते हैं? क्या बिगाड़ा है उसने आपका जो उसे दुश्मन समझते हैं। सच मानिए! बड़ी भूल कर रहे हैं, नाहक ही उससे दो-दो हाथ कर रहे हैं, आखिरकार हार भी हम जा रहे हैं। अपनी उम्र हम सब जीते हैं फिर भी मृत्यु से बचने की लगातार राह खोजते हैं पर सफल भी भला कहाँ होते हैं? जिससे बचने के लिए ताउम्र तमाम इंतजाम और जुगाड़ करते हैं, अंततः थक-हार कर मजबूरी में सही उसके शरणागत ही होते हैं, बड़ा सवाल है कि हम ऐसा क्यों करते हैं? या खुद को मृत्यु से बड़ा मानने की जिद में ही हम यह अपराध कर रहे हैं, मृत्यु के अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं इसलिए नकारने का नाहक श्रम कर रहे हैं, और मृत्यु से दूर भागने की जिद में उसके और करीब होते जा रहे हैं, मृत्यु हर पल हमारा उपहास कर रही है जिसे हम वास्तव में देख ही नहीं पा रहे हैं, जीती मछली निगलकर खुश हो रहे हैं। अब सोचना हमें है कि बड़ा तीसमार खाँ बनकर हम कौन सा झँडे गाड़ रहे हैं, जीवन के आइने में मृत्यु को देखकर भी अनदेखा करते जा रहे हैं शायद खुद को खुद का खुदा समझ रहे हैं। सुधीर श्रीवास्तव
