घर लौटता फौजी
घर लौटता फौजी
क्या होता है एक फौजी के मन में
जब वह अपने गांव वापस आता है
कितने अरमान मचलते हैं
कितने सपने पलते हैं
न जाने कितने ख्वाब उसकी
जागती आंखों में तैरते हैं ।
ना जाने पिताजी कैसे होंगे
वजन ढ़ोते ढ़ोते उनकी पीठ
पेट से चिपक गई है
खाल, धूप और गर्मी से
जलकर काली पड़ गई है।
थोड़े दिन जमकर उनकी मालिश करूंगा
जब तक गांव में हूँ उन्हें
काम नहीं करने दूंगा।
मां भी कितनी थकी थकी से लगती है
पथराई आंखों से उसकी हालत दिखती है
ना ढंग से सो पाती है ना जगती है
पता नहीं, किन खयालों में गुम रहती है।
कुछ दिन उसके आंचल की छांव में रहूंगा
उसके पैरों के कांटे निकाल
तेल से अच्छी मालिश करूंगा
बहुत दिन हो गये हैं उसे मुस्कुराते देखे हुए
उसके कदमों में आज अपनी जन्नत महसूस करूंगा।
मुन्ना कब से एरोप्लेन मांग रहा है
आज उसकी ख्वाहिश पूरी होने वाली है
उस मासूम को खिलखिलाते देखकर
मेरी सारी थकान दूर होने वाली है।
गुड़िया भी अब चलने लगी है
तोतली बोली से पापा कहने लगी है
छैंया छैंया चलते देखने की ख्वाहिश
अब तो सिर चढ़कर बोलने लगी है।
उसके छोटे छोटे पैरों के लिए
चांदी की पाजेब लेकर आया हूँ
पीठ पर बैठाकर घुमाऊंगा पूरे घर में
ऐसी ख्वाहिश को साकार करने आया हूँ।
कितने दिनों से रजनी को नहीं देखा है
ना जाने कैसी होगी वह
विरह के दिनों में मेरे बगैर
कैसे सबको संभालती होगी वह।
आज उसको अपनी बांहों का हार
पहनाकर खुश करने की कोशिश करूंगा
उसके पतझड़ से जीवन में अनगिनत
बसंती रंग भरने कि कोशिश करूंगा।
गांव का मंदिर नया बन गया बताया
उसे देखने का सौभाग्य मिलने वाला है
जो पीपल का पेड़ मैने लगाया था कभी
क्या उसे भी किसी ने संभाला है ?
कच्चे रास्ते से जाने में कितनी तकलीफ होती है
इसका अहसास हम सबको है
विधायक महोदय को गांव लाकर
वो अहसास उन्हें भी करवाऊंगा
और गांव की सडक़ के लिए विधायक कोष से
पांच लाख रुपये वहीं पर स्वीकृत करवाऊंगा।
मगर, यह रेल इतनी धीरे धीरे क्यों चल रही है
लगता है कि आम लोगों की तरह
यह भी धीरे धीरे घिसट रही है।
काश कि यह ऐरोप्लेन बन जाये
और एक झटके में मुझे
गांव पहुंचाकर मेर अपनों से मिलवाये।
