STORYMIRROR

Sumitra Hembram

Abstract

4  

Sumitra Hembram

Abstract

एक शीर्षक

एक शीर्षक

1 min
123

आज थामा है कलम इस हाथ में 

जाने कितने शब्दों को पिरोए।

सोच में जाने कितने सोच आए 

पर जाने क्यों एक शीर्षक ही समझ ना आए ।


कभी बेचैनी सी इस मन में, मन की उन बातों को 

शक्ल एक देने की चाह में हम उन शब्दों से बस लड़ते गए।

अधूरी रह गई पंक्तियां....... 

और बस अधूरा रह गया वह पन्ना......

आज थामा है कल अब इस हाथ में 

पर जाने क्यों एक शीर्षक ही समझ ना आए।


घबराना जाए मन मेरा , कहीं छूट न जाए

शब्द मेरे फिर अधूरा ना रह जाए एक और पन्ना.....

आज थामा है कलम इस हाथ में 

जाने कितने शब्दों को पिरोए।

सोच में जाने कितने सोच आए 

पर जाने क्यों एक शीर्षक ही समझ ना आए ।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract