Pooja Sharma

Abstract


4.3  

Pooja Sharma

Abstract


अंजानी, अकेली

अंजानी, अकेली

1 min 11.7K 1 min 11.7K

देख रही थी दुनिया को

मैं कुछ दूर से,

सब देख रहे थे मुझ को

न जाने क्यूँ घूर के ।


अंजानी, अकेली सी मैं

डरी हुई थी उनसे,

क्या था ऐसा खास जो मैं

अलग हुई थी उनसे ।


अहसास कुछ घबराहट का था

कुछ अजीब बेचैनी भी

देख के हथेली भी

कुछ गीली सी महसूस हूई ।


रख हाथ दिल पर सोचा,

जैसी भी हूँ ठीक हूँ उनसे

अलग खडी हूँ जब,

तब खास हूँ उनसे।


देख रही थी दूर...



Rate this content
Log in

More hindi poem from Pooja Sharma

Similar hindi poem from Abstract