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Saroj Vyas

Abstract


4.9  

Saroj Vyas

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अहसास अनूठे रिश्ते का !

अहसास अनूठे रिश्ते का !

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नहीं जानती मैं

कब से निहार रहा है ?

अब महसूस कर रही हूं, 

मेरे सानिध्य के लिए,

हर पल बेकरार रहा है।


प्यार के इज़हार की आतुरता में,

हर पल-हर दिन,

उसने मेरे आने का, 

बेसब्री से इंतजार किया होगा।

मेरे दीदार के साथ-साथ

मेरी बेरुखी से भी, 

उसे प्यार हुआ होगा।


इंतजार किया होगा, 

घंटों उसने ,

एक झलक पाने के लिए ,

एकांत में बैठकर,

शिद्दत से बेपनाह प्यार किया होगा।


मेरी लापरवाही, मेरी व्यस्तता

भागती हुई ज़िन्दगी 

और दौड़ते हुए पलों में

उसके लिए कोई जगह नहीं थी।

परवाह तो दूर,

मुझे तो उसकी खबर तक नहीं थी।


इस सच को जानते हुए भी

टूटने नहीं दिया खुद को उसने

इस क़दर मोहब्बत,

क्या किसी ने किसी से की होगी ? 

 

प्रेम की निश्छलता,

मौन संवाद,

और 

बस ! देखने भर की हसरत लेकर,

जब उसने ईश्वर से दुआ की होगी।

पवित्र इबादत सी आरज़ू उसकी,

सबके मालिक ने,

फुरसत निकालकर, 

फ़रियाद उसकी सुनी होगी।


मुझसे कोई भूल हुई,

या दुआ प्रेम पुजारी की कबूल हुए ?

लाॅकडाउन के चक्रव्यूह ने,

मजबूर मुझे कर दिया।

फ़ुरसत के पलों में,

उसकी नजदीकी का

अहसास मन में भर दिया।


अब प्यार एक तरफा नहीं,

अनजान सी बनती हुई,

तिरछी नजरों से,


मैं भी उसकी तलाश में रहती हूं।

दिखाई नहीं देने पर,

व्याकुल होकर झुंझला लेती हूं।


धीरे-धीरे हौसला,

उसका भी अब बढ़ रहा है,

अहसास है मुझे भी,

अब छूने की कोशिश कर रहा है।


मेरी घूरती निगाहों से 

लेकिन डर जाता है।

सच तो यह है,

मुझे भी अब वह

अपना सा लग रहा है।


अक्सर धीरे से,

कान में भिनभिना कर कहता है,

सुरक्षित हो मेरे साथ प्रिय तुम !


क्योंकि

तुम्हारा मेरा जन्मों का रिश्ता है,

घर के एक महत्वपूर्ण कोने में,

अब वह मेरे साथ रहता है।


सामाजिक दूरी का

उल्लघंन करता हुआ,

मेरा अनन्य मित्र,

एक प्यारा सा मच्छर ! 

मेरे साथ लाॅकडाउन का

सख्ती से पालन कर रहा है।


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