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उड़ान
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© Sarita Naresh Bahukhandi

Drama

14 Minutes   541    19


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 पहली बेटी के बाद स्मिता मन बना चुकी थी कि बस अब दूसरा बच्चा नहीं। किसी तरह उसने नौ वर्ष खींच लिए थे परंतु अब घरवालों के बढ़ते दबाव, खैर वो उसके लिए मायने नहीं रखता था। खुद अपने दो भाइयों के साथ उसके मधुर संबंध अपार प्रेम हंसी - मजाक मायके में मिलने वाले मान - सम्मान के चलते उसे स्वयं कहीं न कहीं लगने लगा कि एक दूसरी संतान जरूरी है। हमारे बाद इस बच्चे का संसार में कोई तो अपना होगा। एक कोख से हुई संतान अलग होते हुए भी कहीं न कहीं रक्त का हवाला तो दे ही जाती है। ऐसे तमाम खयालातों के चलते उसने मन को एक बार फिर राजी कर लिया एक और पर फिर से बेटी हुई तो, स्मिता थोड़ा विचलित हुई अगले ही पल फिर मन बदला क्यों वह खुद भी तो एक बेटी ही है उसे ऐसा कत्तई नहीं सोचना चाहिए;

कई बार वह खुद भी सोचती काश उसकी भी कोई बहन होती जिससे वह मन की बात कर लेती। कई बातों का जिक्र भाइयों से नहीं कर पाते और मम्मी पापा से तो सिर्फ खुशहाली व अपने सुख की चर्चा करती ताकि उन्हें चिंता ना हो, बेटी ही सही।

आखिरकार वह शुभघड़ी आई उसके यकीन पर डॉक्टर ने मुहर लगा दी, दूसरा महीना है; हालाँकि यह स्थिति पिछले दस वर्षों से बिल्कुल भिन्न थी, प्लान्ड थी। इस निर्णय में उसका भी योगदान था तब तो वह मात्र उन्नीस की थी आज उन्तीस की फिर भी पति से खबर बताने में लज्जा रही थी इतना ही कह पाई रिपोर्ट पॉजिटीव है। ढेर सारी चुम्मियों व गलबहियों से उनकी खुशी का अंदाज़ा लगा पाई; मन ही मन और प्यार ऊमड़ पड़ा आखिर मेरा मन रखने के लिए ही तो इन्होंने आज तक मुझ पर दबाव नहीं बनाया। अब अगली बारी घरवालों को यह खबर बताने की थी जो कि उसे स्काय डायव्हिंग की तरह चुनौती पूर्ण लग रही थी। आखिरकार सास को अकेला पाकर स्मिता ने कह ही दिया- आप दोबारा दादी बननेवाली हैं।

बड़ी खुशी की बात बताई, जवाब सुनकर सास के चेहरे की खुशी व अपने चेहरे की लाली का रंग उसे एक सा प्रतीत हो रहा था इस बार की गर्भावस्था व पिछले बार में जमीन आसमान का अंतर था। महीने के हिसाब से शरीर कुछ ज्यादा ही तेजी से बढ़ने लगा। तीसरा महीना पूरा होते ही सखियां धीरे से पास आ कर पूछती टेस्ट करवाया क्या ? कॉन्वेंट में पढ़ी लिखी व पढा़ती स्मिता को आश्चर्य होता कि आधुनिकता की दुहाई देने वाला समाज स्त्री-पुरूष समानता की बात करने वाले शिक्षक कही जाने वाली यह प्रजाति जो कि स्वयं जानती है कि लिंग परीक्षण गैर कानूनी है बावजूद इसके। यहाँ तक कि उसकी दो सखियां डॉक्टर हैं उन्होंने सामने से यह ऑफर भी दिया। पति से बात कर दोनों इसी निर्णय पर पहुंचे -ईश्वर की जो भी मर्जी होगी उन्हें स्वीकार होगी। अगले ही पल पति बोल उठे- मैंने कभी किसी का बुरा नहीं किया। किसी के लिए गलत खयाल तक नहीं आने दिया, अपने घर परिवार की पूरी जिम्मेदारी ली है तो मेरे लिए भी ईश्वर ने गलत नहीं सोचा होग।

स्मिता वहीं डर गई जब सोच अपेक्षाकृत हो तो परिणाम विपरीत ही होते हैं पर यह उसका अपना निर्णय था इसीलिए अटल रही। आज चौथे महीने की सोनोग्राफी थी पता चला कि जुड़वा बच्चे हैं। अब तो खुशी कम धक्का सा लगा। हे भगवान ! काश यह खबर पहली बार में सुनने मिलती तो आज यह नौबत नहीं आती। खैर नसीब के आगे कुछ नहीं. अगर पहले बेटा होता और दूसरे दफा दो जुड़वा तब भी मन में यही डर समाता। दिन बढ़ते गए और स्मिता भी। आज गोद-भराई की रस्म में देवी माँ का कीर्तन भी रखवाया गया। खूब चहल पहल थी सभी बेहद खुश थे स्मिता भी अपने आप को तीन बच्चों की माँ स्वीकार कर चुकी थी सारी महिलाएं आशीर्वाद दे रही थी "पुत्रवती भव" मन में तो आया कह दे क्यों बेटी हुई तो ? अगले ही पल उसने खुद अपने मन को रोका, पहला बेटा होता तो भी वह दो जुड़वा बेटों के लिए तैयार नहीं होती। उसकी माँ अक्सर कहती- ईश्वर ने दो फल दिए हैं बेटा और बेटी दोनों का अपना - अपना महत्त्व है वो भाग्यवान होते हैं, जिनके घर दोनों होते हैं यहां तक कि जब उसने देवी मां के चरण स्पर्श किए तो मन ही मन मांगा; "हे माँ दो जुड़वा बेटे देना या फिर एक बेटी - बेटा" बस आगे खुद उसकी हिम्मत न हुई अपने डर को प्रकट करने क। उसके मन में एक पल भी यह विचार नहीं आया कि आदिशक्ति जगतजननी, प्रधान प्रकृति, गुणवती, बुद्धि तत्व की जननी अंधकार व अग्यान्ता रूपी राक्षसों का विनाश करने वाली परम शक्तिशाली मां दुर्गा से वह बेटे मांग कर स्वयं उनका अपमान कर रही है। वो स्वार्थी हो गयी थी उसका नारी वाद सांसारिक अंधविश्वास की चपेट में आ गया था। जो नहीं चाहती थी कि उसका रूप भी उस आधी दुनिया का गुलाम बन जाए जो केवल लिंग प्रधानता के चलते समाज के दोहरे मानदंडों का शिकार बने।

 सास तो कई बार इशारा दे चुकी थी कि तुम्हारे पापा कह रहे थे, "कि बहू से कहो समय रहते चेक करवा ले।" परंतु बहू - बेटे की जिद के आगे किसी की ना चली।आखिरकार हँसी-खुशी में नौंवा महीना लग गया अब तो स्मिता का चलना भी दूभर था वह खुद परिणाम के लिए बेकरार थी। अक्सर मंदिर में मत्था टेकती- 'हे ईश्वर रक्षा करना, हे माँ कृपा बनाए रखना, हे पितृ देव अपनी शाख बचाए रखना। इस खानदान को एक वंशज अवश्य देना।

पता नहीं समाज के दबाव के चलते अपनी दबी चाह के चलते या घरवालों के प्रति अपार प्रेम के चलते, अक्सर सोचती, मेरी एक छवि तो मेरे पास है एक इनकी भी छवि देना। डॉक्टर ने पहले ही बता दिया था सी सेक्शन करना पड़ेगा आप समय बता दीजिएगा एक बच्चे के गले में नाल बुरी तरह फंसी है हम रिस्क नहीं ले सकते। आप समय देखकर बता दीजिए। आखिर कार पंडित जी से मुहूर्त निकलवाया स्मिता के हाथ में पुखराज कीअंगूठी बनवाई गई। सब कुछ शुभ हो प्रात : 8:40 का मुहूर्त निकला।

जैसे ही स्मिता को होश आया अपने आस-पास लटके हुए मुँह पसरा हुआ सन्नाटा देखकर उसकी कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई वो समझ गई थी उसके डर ने जन्म ले लिया है।प्यारी - प्यारी, शांत - शांत सफेद - सफेद रूई की फांखो सी ! गुलाबी - लाल होंठ लिए पलकें बंद किए संसार की अव्हेलना को ठेंगा दिखाते हुए दो नन्ही - नन्ही परियां उसके आँंख की छोर से अपने - आप दो बूंदे गिर पड़ी। मन ही मन उसने खुद को संभाला।

नहीं, ये जीवन है, इनका स्वागत तू शोकाकुल होकर कत्तई नहीं करेगी। घरवालों ने नर्स व डॉक्टर से मुँह फेर लिया, जैसे अस्पताल वालों ने ही जबरन थोप दी हों इनके कुल पर ! ओह ! कितने जोर से रोने की आवाज आई अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए दूसरी ने भी तुरंत हाजिरी दी दोनों एक समान लग रही थी। अलग पहचान करना नामुमकिन जैसे स्मिता की ही नन्हीं छवि हों, थीं भी।

स्मिता ने उठने की कोशिश की पर यह क्या दर्द से कराहती स्मिता जितनी तेजी से उठी थी धप से पड़ गयी। चिल्लाने का शोर बर्दाश्त से बाहर था सास और माँ भी वहीं थी आखिर कार एक को माँ ने थामा और एक को स्मिता ने सास जड़वत बैठी रही। वे माँ को इस निगाह से देख रही थीं मानो तुमसे रिश्ता बनाकर हम फंस गये। उन्होंने बच्चियों को देखा तक नहीं। स्मिता मन ही मन परिस्थिति भांप गयी थी। माँ-बाबा की इकलौती, चहेती भाग्यवान बेटी भाइयों की दुलारी तीन बेटियों की माँ बन चुकी थी। तीन बच्चों के लिए स्मिता मन बना चुकी थी पर तीन बेटियों के लिए नारीवाद व समानता की गुहार लगाने वाली बी. एस .सी .बी एड् स्मिता ने कत्तई नहीं सोचा था। उसे लगा जैसे ईश्वर है ही नहीं, कुछ समय पहले वह अंधविश्वासु हो गयी थी, जिसने जो कहा उसने वही किया; नाड़ी देखकर संस्कार कराने से लेकर अंगूठी,पहनने से लेकर सुबह शाम ओम नम:शिवाय के जाप नियमित रूप से करना, रामायण का रोज एक पन्ना पढ़ना, सभी एक के बाद एक उसका मजाक उड़ा रहे थे और एक उसकी माँ थी कि जिसे सिर्फअपनी बेटी की चिंता हो रही थी क्या हो गया ये ? कैसे संभालेगी खुद को ? स्कूल, घर-परिवार तीन-तीन बेटियाँ उपर से घरवालों का रूखापन, माँ को दो ही दिन में आधा कर गया।

लोगों के फोन पर फोन आ रहे थे परंतु खबर इतने धीरे से बताई जा रही थी जैसे बच्चियां जन्म लेते ही स्वर्ग सिधार गई हों, शायद ऐसा होता तो भी कोई दु़:खी ना होता स्मिता को ऐसा लग रहा था जैसे उसने बहुत बड़ा अपराध कर लिया है। जो भी मिलने आता एक ताना अवश्य मार जाता; एक तो बेटा हो जाता, भगवान को भी इस बेचाऱी पर दया नहीं आई। संभालो अपने को, ईश्वर की मर्जी के आगे किसका बस चलता है। किसी जन्म का इनका कुछ बकाया होगा तुम्हारा। ईश्वर का भी अजीब इन्साफ है, कहीं बेटों की कतार लगी है तो कहीं बेटियों की। अपने-अपने नसीब का फल है और न जाने क्या क्या ? सुन-सुन कर उसके कान पक चुके थे जैसे उसकी बच्चियां पैदा होते ही कसूरवार हो गई हों पर यह क्या बीच- बीच में उनका दूध के लिए रोना उसका कलेजा छलनी कर देते माँ शब्द का अर्थ आज वो और अधिक गहराई से जान पाई, जब सारा जमाना एक तरफ 

था और वो खुद उन दो बेटियों के साथ। तमाम दर्द और तकलीफ में भी वह समझ गई थी कि इन दोनों का मेरे सिवाय कोई नहीं, मन ही मन बोली इस निष्ठुर दुनिया में तुम्हारी माँ तुम्हारा स्वागत करती है मेरी बच्चियों।

ऐसे-ऐसे लोगों के गाँव से औपचारिक फोन आते जिनसे वह मात्र परिचित भर थी, वह इतनी दुखी नहीं थी जितना की सांत्वना देने आए लोग कर जाते। ससुर वैसे ही बौखलाए थे उनकी घोर बेइज्जती हो गई थी अपने बड़े बेटे की नासमझी के चलते। बहुत बीवी के आगे-पीछे करता था, इन पढ़े - लिखे सिर चढे लोगों की अक्ल तो घुटनों पर ही होती है तीन बेटों से जम कर लिया दहेज उन्हें सूत समेत लुटता नजर आ रहा था। अपने आप को कंगाल व लाचार बनते हुए वो सपने में भी सोच नहीं पा रहे थे। मन ही मन उन्होंने इस बहू बेटे को घर और संपत्ति से बेदखल करने की ठान ली तब जाकर कहीं संतोष मिला।

डिस्चार्ज के दौरान अस्पताल के किसी भी कर्मचारियों ने ना बख्शिस की मांग की ना मिठाई की। स्मिता अस्पताल से ऐसे घर जा रही थी जैसे पता नहीं क्या छूट गया ? किसी और का सामान चोरी कर ले जा रही हो उसे कोई नहीं देखे पांच दिन किसी तरह माँ के साथ निभ गए थे। चुप रही भीतर - भीतर टूट चुकी थी घरवालों की बेरुखी से जमाने की निर्दयतापूर्ण व्यवहार से। बहुत कुछ जोड़ने आए दो नन्हीं जीवों के लिए अपने को खड़ा कर रही थी; पति अस्पताल में भी नहीं आए अपनी ऩाराजगी का सबूत उन्होंने भी दे दिया था। बहरहाल सुखी - संपन्न समृद्ध घर में ना मालिश वाली रखी गई ना ही मैथी के लड्डू बने।दस वर्षीय बड़ी बेटी ही उसकी सखी बन गई थी। बहनों को प्यार देना, उनकी तस्वीर खींचना उनके वीडियो बनाना उसकी निरस दिनचर्या में थोड़ी आशा भर देते।

उसकी असली चुनौती अब शुरू हो गई थी अपने परायों को तो वह अच्छे से पहचान गई थी। एक स्त्री को एक स्त्री की जरूरत सिर्फ इसी घड़ी में पड़ती है बाकि तो वह झेल ही लेती है। फरमाइशों के आधार पर तरह - तरह के पकवान बनाकर तीन बार पूरे घर को खिलानेवाली स्मिता को एक बार भी ढंग का खाना नहीं मिलता। एक बच्चे का डायपर बदलती तो दूसरी गिला कर देती दूसरी को ठीक करती तो पहली पौटी कर देती। जब तक साफ करती उनके दूध पीने का वक्त हो जाता, उनकी मालिश नहलाना दिन में चार बार कपड़े बदलना पावडर लगाना दवा पिलाना आदि के चक्कर में वह अक्सर भूल जाती किसको पिलाया; किसे नहीं। दोनों की समानता के चलते उसने पहचान के लिए उनकी नन्हीं हथेली पर लाल और काला धागा बांध लिया था। पति को वैसे ही अपने बिजनेस व बाबूजी की जी हजूरी से फुर्सत नहीं मिलती थी। शिकायत करने पर स्मिता को जवाब मिला कौनसा तुमने मुझे दो बेटे दिये हैं ? किससे लिए घर आऊँ मेरा तो घर आने का मन भी नहीं करता।

ठगी सी स्मिता की दिनचर्या में समय नाम की कोई चीज शेष नहीं बची थी। कब सुबह  होती ?कब रात ? उसे पता ही नहीं चलता। रात में भी तीन - तीन घंटे में दूध बनाने, उनकी बॉटल उबालने में, कपड़े धोने में कब रात बीतती पता ही नहीं चलता। वह सुकून की नींद के लिए तरस गई थी। अपना कमर दर्द तो उसे अक्सर याद भी नहीं रहता। पूरे घर में केवल देवरानी बहुत खुश थी। हंस - हंसकर स्मिता से कहती बिल्कुल तुम पर गयी हैं गोरी- गोरी सी। आजकल तो बेटा - बेटी में कोई अंतर नहीं है। स्मिता का डायलॉग उसीको सुनाती। स्मिता ने मन में सोचा अंतर नहीं खाई है खाई और इस गहराई को पाटने में एक आहुति उसकी भी होगी। यदि आज उसके तीन बेटे होते तो क्या वह इस अवहेलना का शिकार होती कदापि नहीं; आज पूरे घर का सीन ही अलग होता। अब तक उसे किसी ने सादी बधाई तक नहीं दी थी। इससे पहले उसे पता ही नहीं था कि लोग उसकी इतनी चिंता भी करते हैं, ससुर ने तो अब तक दोनों बच्चों की शक्ल भी नहीं देखी थी। उसका बड़ा मन था कि घर में गाड़ी आई तो मिठाई बंटी थी। नामकरण न सही पर मिठाई तो बंट ही सकती थी पर घर में पसरी मनहूसियत उसे कोई कदम उठाने से डरा देती। यहां तक कि घर से दो कदम की दूरी पर बसे स्कूल में भी वह अपने स्टाफ में मिठाई नहीं भिजवा पाई।

 सास का उसकी बेटियों को लापरवाही से पकड़ना बिस्तर के एकदम किनारे रखना, अक्सर मालिश में जरूरत से ज्यादा जोर लगाना, नहलाते समय बच्चियों का भरसक रोना, आदि छोटी - छोटी बातें उसके मन में संदेह पैदा करने लगे कि कहीं इन्हें मारने की कोशिश तो नहीं की जा रही। हाय रे हालात, स्मिता तन और मन से पूरी तरह टूट चुकी थी। कभी - कभी तो वह दो पल की नींद में भी इतनी बदहवासी से पसीना पसीना हो कर उठती कि कोई उसकी बच्चियों को मारने के लिए दौड़ रहा है और वो छाती से चिपकाए भागी जा रही है उठ कर देखती दोनों के हिलते पेट उसे चैन की साँस लेने देते। जैसे पूरे घर ने उसका बॉयकॉट कर लिया हो। अपनी बड़ी बेटी उसे देवी सी प्रतीत होती जो सूखे कपड़े तार से उतारना मालिश का सामान तैयार रखना तौलिया लाना उ़नके पास बैठा रहना बातें करना; दवाई रैक से निकालना आदि उसे आसमानी फरिश्ते से कम न लगता।

आज स्मिता को ग्यारह दिन हो गये थे। शुद्धीकरण में बच्चियों का नाम भी रखवा लिया गया। पंडितजी ने पूछा बेटियों के नाम बोलो, वह हड़बड़ा उठी, मैंने तो कुछ सोचा ही नहीं ;अक्सर मन में सोचा करती ये दोनों एक दूसरे की परछाई हैं। फौरन बोली छाया साया। वे अपने साथ दोनों की जन्मपत्री भी बना कर लाए थे। बड़ी उंची मिशालें दे रहे थे पर किसी को इनमें रुची नही थी। पंडित जी ने पूजा संपन्न होने पर आशीर्वाद दिया "पुत्र वती भव," सुनते ही वह तिलमिला उठी यह आशीर्वाद अब मेरे किसी काम का नहीं कोई और आशीष दें पंडितजी स्मिता की धृष्टता जैसे बर्दाश्त नहीं कर पाए हों और मन ही मन कह बैठे हों -ठीक हुआ इसके साथ रस्सी जल गयी पर बल नहीं गया। 

 सास अब आजाद हो गई थी। किसी तरह उन्होंने दस दिन खाना बनाया था। शाम से ही अगले दिन शादी मे जाने तैयारी में पूरा घर व्यस्त था। किसी ने यह नहीं सोचा कि स्मिता इन दो बच्चों को अकेले कैसे संभालेगी ? अभी तो तेरहवां दिन ही है सभी अपने साज संवर में व्यस्त थे। बड़ी बेटी के उत्साह को देखकर उसे भी नहीं रोका। 

 आज खाली घर भी उसे भरा हुआ लग रहा था। अपने कमर दर्द की ओर उसका ध्यान गया। उसे लगा कि उसका बदन बाहर से ठंडा हो गया है पर भीतर से जैसे सुइयां चुभ रही हैं वो आराम करना चाहती थी।

यह उसकी चाहत थी या जरूरत खैर समय ने दोनों के लिए इजाजत नहीं दी। आखिरकार पौने चार बजे उसे दिन का खाना नसीब हुआ। घर और बच्चों के जरूरी काम के चलते वह बच्चियों को सुला नहीं पाई थी थककर वे खुद ही सो गईं। उनको निहारते- निहारते स्मिता को याद आया जब वह गर्भवती थी तो -"आओगे जब तुम साजना अंगना फूल खिलेंगे, बरसेगा सावन झूम- झूम कर; दो दिल ऐसे मिलेंगे। गीत को बार- बार सुना करती थी पर ऐसा कुछ नहीं हुआ वह रो पड़ी। बेहद फूट - फूट कर, वह चीख रही थी घर भर के मरे हुए अरमानों पर।

उसके आंसू की एक- एक बूंद बयान दे रही थी- मेरा मेरी प्यारी बेटियों का कोई दोष नहीं। इनको भी जीने का उतना ही ह़क है। ये चंद रिश्ते दार समाज ये दुनिया कौन होती है इनसे इनके हिस्से का आसमान छीननेवाले ? दया, लाचारी, नफरत, उपहार स्वरूप देनेवाली ,कोई नहीं कोई नहीं ? घृणा करती है वो एसे समाज से जहाँ एक स्त्री; स्त्री की असली दुश्मन है। पुरूष अपने आप को जिस तख्त पर खड़ा सर्वोच्च समझता है, धिक्कारती है वो उसकी खोखली श्रेष्ठता को इस निराशा का शिकार वो अपनी बेटियों को नहीं होने देगी। उनकी स्वतंत्र; उन्मुक्त उड़ान के लिए उनकी यह माँ हमेशा उनके पंखों में हौसले की ताकत देगी।

स्मिता चुप ही नहीं हो पा रही थी बच्चे भी उठ गए उन्होंने भी माँ का साथ दिया अब तीनों रो रहे थे। रोते रहे बड़ी देर तक रोते रहे। एक-दूसरे को समझते हुए.. .....स्मिता ने उन्हें हृदय से लगा लिया। आखिर घर में इतना अंधेरा क्यों है ? रोते कलपते सांय के आठ बज चुके थे। उसके भीतर का सारा लावा फूट चुका था, वो बेहद हल्का महसूस कर रही थी। स्मिता को भान हुआ आज उसकी छाया और साया को तेरह दिन हो गये। क्या हुआ ? अगर ससुर ने अब तक उसके बेटियों की शक्ल नहीं देखी; उनके पिता को उनसे मतलब नहीं; अब तो वह खुद नहीं चाहती की किसी भी निराश या मनहूस की उसके बच्चों पर नजर भी पड़े। वह अकेले ही काफी है उनकी उड़ान के लिए। वैसे भी घरवालों की चाहत, समाज के दोहरे मानदंड, स्त्री-पुरूष असमानता की आज वो तेरहवीं मना चुकी थी।।

असमानता समाज बेटी

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