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प्रेणना
प्रेणना
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© अंकिता सिंह

Drama Inspirational

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पूस की सीत में हल्के मटमैले रंग के मात्र एक कपड़े में लिपटी नवजात कन्या ही थी। सड़क के किनारे पड़ी हुई थी। उसे लोग घेरे हुए खड़े थे।तरह-तरह की बातें हो रही थी-

- के जाने कौन छोड़ गया इसे,

- किसी की नाजायज जनी होगी, तभी लोक लाज के भय से मरने को छोड़ दिया गया,

- हाँ लगता है बेटी के चलते इसे यहाँ लाकर पटक दिया गया,

- अरे देखो तो सही कपड़े की सूरत तो किसी अमीर की ही लगती है।

जैसी तमाम शंकाएँ जताई जा रही थी। पर किसी ने भी उस बच्ची को हाथ भी लगाने की हिमाकत तक नहीं की। बस एक के बाद एक लोग आते और दया दृष्टि डालते हुए आगे बढ़ जाते। किसी ने भी पुलिस को भी सूचना देना उचित न समझा।

इसी भीड़ का हिस्सा पल्लू रिक्शेवाला भी था। हर वक्त शराब के नशे में रहता है। उसका दुनिया में अपना कहने को इंसानों के बीच कोई न था। हाँ जानवर जरूर उसके सगे सम्बन्धी बन गए थे। पहले इधर उधर भटक कर कूड़ा-कबाड़ा उठाकर पेट भरने भर का जुगाड़ कर लेता। इसी बीच सरकार ने हाथ रिक्शा मुहैया करवायी। जिससे उसकी जिंदगी भी भली सी चलने लगी। पूरा दिन मेहनत करता, जो भी पैसे कमाता रोटी और दारू लाता। उसे देखते ही आस-पास के पालतू कुत्ते जमा हो जाते। प्यार से पल्लू उनपे हाथ फेरता और पहले रोटी कुत्तों को खिलाता फिर खुद खाता था। पूरी बोतल गटक उन्हीं से लिपट के सो जाता। बीसियों कुत्ते उसे घेर कर सोते, सड़क के किनारे एक दूसरे का सहारा बने।

पल्लू ने जब नवजात को करीब जाकर देखा, उसे चींटे घेरे हुए थे। उसने तुरन्त उसे उठाया, उसके शरीर से चींटे-चींटियों को झाड़ते हुए उसे अपनी गोद में भींच लिया। सर्द से नीली पड़ चुकी बच्ची स्नेह का स्पर्श पाते ही सामान्य होने लगी थी। पल्लू ने उसे पालने का फैसला लिया और उसे अपने साथ लाया। पहले तो लोग उसे बेवड़ा पागल कहकर नजरअंदाज करते रहे। किन्तु उसकी निःस्वार्थ सेवा के चलते ही, गुप्ता जी ने उसे अपनी दुकान के सामने बनी बरसाती में रात बिताने की अनुमति दे दी। ये कहकर कि कोई गन्दगी मत फैलाना और मेरे आने तक यहाँ साफ सफाई करके रखना।

दोनों तरफ से ढंकी बरसाती का मुहाना पल्लू अपने कम्बल से ढक देता था और बस रात बिताने का उसका आशियाँ तैयार। अब तो वह हर रोज रोटी के साथ दारू नहीं दूध लाने लगा। पूरा दिन बच्ची को साथ लेकर जाता। कभी पीठ में बांध कर रिक्शा चलाता तो कभी सवारी न होने पर उसे पीछे सुला लेता। प्यार से उसे मुन्नी बुलाता। इसी बीच समय के साथ पल्लू की परवरिश भी बढ़ चली। मुन्नी चार साल की हो गयी थी।

और जोर से बाबा, और जोर से चलाओ रिक्शा...दोनों हाथों को पंख बनाये खुद को उड़ता हुआ महसूस करती। बाबा जब मैं बड़ी होऊँगी तो बहुत जोर से आसमान में रिक्शा चलाऊंगी। और तुम्हें बैठा के आसमान की सैर करवाऊंगी। काले घुंघराले बालों के बीच गोरा सलोना चेहरा, गजब का आकर्षक लगता। जब रिक्शे पर मुन्नी की सवारी निकलती तो। यही दृश्य होता था लगभग रोज का।

पल्लू कभी-कभी स्कूली बच्चों की भी सवारी उठाता था। रिक्शे के आगे डण्डे पर लगी गद्दीदार सीट पर बैठी मुन्नी भी स्कूल जाने की जिद करती।

पल्लू ने पता किया तो उन स्कूलों का खर्चा उसकी आमदनी को मुंह चिढ़ाने लगता। लेकिन, कहते हैं न माँ सरस्वती की कृपा हैसियत देख कर नहीं आती। माँ का आशीष किसी सरकारी या गैर सरकारी स्कूलों का मोहताज नहीं। पल्लू को किसी ने बताया कि वह उसे सरकारी स्कूल में दाखिला दिलवा दे। अब पल्लू के पल्ले तो ये सब बातें पड़ने से रही। सो गुप्ता जी ही थे नैय्या के खेवैया। ले गए दाखिले के लिए मुन्नी को। सब तो ठीक था पर दाखिले के लिए नाम का होना भी आवश्यक था। पूछे जाने पर पल्लू ने "प्रेरणा" नाम बताया जो कि, उसके और स्वयं के जीवन की प्रेरणा थी। पल्लू को अंदाजा भी न था कि उसका दिया यह नाम जाने कितनी जिंदगियों को सार्थक करेगा। मुन्नी का दाखिला करवाते ही पल्लू को जैसे जीवन का उद्देश्य मिल गया हो, हाथ रिक्शा से ऑटो रिक्शा पर आ गया। इधर मुन्नी को पुस्तकों के पंख मिल चुके थे। उसने अपने हौसले और निपुणता के बल पर कक्षा दर कक्षा अव्वल ही उत्तीर्ण होती चली गयी।

"वो कहते हैं न कि सूरज में इतनी चमक है तो काले बादलों की क्या औकात उन्हें रोक लें" मुन्नी अब पूरी प्रेरणा बन चुकी थी। छात्रावास में उसे पढ़ाई का अच्छा परिवेश मिलता गया। अपनी योग्यता से उसने आगे के मार्ग को स्वयं ही बनाती गयी। पल्लू मिलने आता था हर सप्ताहांत। बाबा बस कुछ दिन और फिर मैं आपको, आपके अपने घर में रखूँगी। पल्लू को बातें काल्पनिक लगती। किंतु बेटी के हौसले पर यकीन जरूर था।

१२हवीं अव्वल आने के बाद गुरुजनों के मार्गदर्शन में एन.डी.ए. की परीक्षा भी उसने उत्तीर्ण कर ली। अब उसे लगभग दो वर्षों के लिए "महिला पायलट अफसर" के प्रशिक्षण हेतु शहर से बाहर जाना था। इस बीच उसने पल्लू को कुछ भी नहीं बताया। बस ये कहकर कि, "बाबा पढ़ाई का भार अधिक है, आप मिलने भी मत आना। मैं समयानुसार आपको मिलने आ जाया करूँगी।" फिर भी पल्लू हर सप्ताहांत अर्जी लगा जाता मिलने की। जहाँ से उसे सिर्फ निराशा ही मिलती।

दिन बीतता गया। एक दिन वह सवारी के इंतजार में खड़ा था। तभी पीछे वर्दीधारी एक नवयुवती आकर बैठी।

कहाँ चलना हैं मैडम? पल्लू ने मुड़कर पूछा तो ऑटो में बैठी नवयुवती को देखते ही सोचने लगा। बिल्कुल मेरी मुन्नी जैसी है। क्या कभी मेरी मुन्नी भी ऐसी बन पाएगी? अरे बाबा अब चलोगे भी या देखते ही रहोगे। नवयुवती की जानी पहचानी आवाज थी। पल्लू को अपने कानों औऱ आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। उसने पानी की बोतल उठायी और मुँह पर दे पानी के छींटे। पीना तो अरसे से छोड़ रखा है फिर ये नशा कैसा? बेटी के प्यार में ही बावला हो गया हूँ लगता है। पल्लू बड़बड़ाए जा रहा था...प्रेरणा ने झकझोर कर पल्लू को बुलाया बाबा और लिपट गयी। बोली, "बाबा मैं ही हूँ, आपकी मुन्नी| ये कोई सपना नहीं हकीकत है। और ये वर्दी मेरे और आपके हौसले की सिलाई से ही तो बनी है।।" पल्लू को कुछ समझ नहीं आ रहा था। बस इतना समझ पाया कि उसकी बिटिया किसी बड़े ओहदे पर आसीन है।

यहाँ से सीधा वह अपने छात्रावास गयी। जहाँ पर उसका भव्य स्वागत हुआ। सारे विद्यर्थियों के बीच वह एक प्रेरणा बनकर खड़ी थी। अब से जब तक वह शहर में रही, कभी महिला दिवस का, तो कभी महिला प्रशिक्षण केंद्र का कार्यक्रम हो - उसे सम्मानित करने को सभी आतुर थे। जहाँ भी जाती पल्लू को साए की तरह रखती। पहले पल्लू पीछे खुद चलती। अपनी कामयाबी का पूर्ण श्रेय अपने बाबा को समर्पित करती। पल्लू बस गदगद हो आँखों से भावनाओं को रोक न पाता था।

आज विदाई का समय था। प्रेरणा पल्लू को अपने साथ ले जा रही थी। गुप्ता जी ने अपनी दुकान पे पूरी रौनक लगा रखी थी।आस-पास के सभी लोग यह दृश्य देखने को आतुर थे कि, कैसे इस क्षेत्र की पहली महिला अफसर अपने रिक्शेवाले बाबा को कैसे आसमान की सैर करवाती है।

इधर पल्लू बार-बार अपनी ऑटो रिक्शा को स्पर्श किए जा रहा था मानो अपनी माँ से विलग हो रहा हो। उस जगह को अपलक देख रहा था जिसने एक अनाथ को जीने का सहारा दिया। प्रेरणा पल्लू की भवनाओं को बखूबी समझ रही थी। मुस्कुरा कर बोली, "बाबा चिंता न करो| आपके पहुँचने से पहले आपकी ऑटो वहाँ पहुँच जाएगी। और बाबा आपका जब भी मन करे यहाँ आ जाना। रात गुप्ता चाचू की दुकान में बिता कर चैन ले लेना।" मुस्कुराते हुए गुप्ता जी भी बोले, "धन्य हो गयी मेरी दुकान भी बिटिया, जो तुम जैसी साहसी प्रेरणा यहाँ पली बढ़ी।"

प्रेरणा ने भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए सभी से अलविदा लिया और निकल पड़ी अपनी नयी और गौरान्वित उड़ान के लिए। लगभग सभी गवाह थे इस क्षण के। चाहे वह विद्यालय हो, या शहर के लोग, या शायद वो भी जो उसे सड़क के किनारे उसे किसी कचरे की भाँति मरने के लिए छोड़ गए थे...

अनाथ देखभाल उड़ान

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