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लू लू का गुस्सा
लू लू का गुस्सा
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© Divik Ramesh

Children

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स्कूल से आते ही लू लू ने बैग को एक ओर दे मारा। ऐलान कर दिया - “कल से मैं स्कूल नहीं जाऊंगा। कभी नहीं जाऊंगा।"  माँ ने सुना तो हैरान रह गई। फिर संभली। सोचा  आज ज़रूर कुछ ऐसा हुआ है स्कूल में जिससे लू लू गुस्से में है।" मन में तो आया कि कह दे कि लू लू स्कूल तो जाना ही होगा। पर चुप रही। यही सोचकर कि गुस्से में लू लू कुछ नहीं सुनेगा। गुस्सा शान्त होगा तो पूछ लूंगी। बोली - "ठीक है स्कूल जाने के बारे में बाद में सोचेंगे लू लू। पहले हाथ-मुँह धो लो और खाना खा लो। भूख तो लगी है न? सब्जी भी तुम्हारे मन पसन्द की है। मसाले वाली भिन्डी और  टमाटर का सूप।"

 

खाने की बात सुनी तो लू लू को याद आया। उसने स्कूल में टिफिन तो खाया ही नहीं। गुस्से में जो था। मसाले वाली भिन्डी की बात सुनकर उसकी भूख और भी ज्यादा जाग गई थी। बोला - “माँ ! माँ ! जल्दी से खाना दो न। बहुत भूख लगी है। गुस्से में मैंने टिफिन ही नहीं खाया था।" थोड़ी चुप्पी के बाद लू लू ने पूछा - “माँ, गुस्से में हम टिफिन क्यों नहीं खाते?" उसका भोला सा प्रश्न सुनकर माँ को हँसी आ गई पर उसे बाहर नहीं आने दिया। गम्भीर ही बनी रही। बोली - “ क्योंकि टिफिन को भी गुस्सा आ रहा होता है। टिफिन तुम्हारा अच्छा दोस्त जो है। गुस्से में वह तुम्हारा साथ देता है। तुम्हें खाने के लिए याद ही नहीं कराता। गुस्से में भूख भी तो तुम्हारी दोस्त बन जाती है। वह भी तुम्हें याद नहीं कराती कि वह तुम्हें लगी है। समझे?" पता नहीं लू लू को समझ आया कि नहीं पर उसने दिखाया ऐसा जैसे सब समझ गया हो। वह अपने आप को बड़ा जो समझता था।

 

माँ ने खाना दिया तो वह उस पर झपट पड़ा। गुस्सा तो पता नहीं कहाँ रफ़ूचक्कर हो चुका था। वह मज़े-मज़े से खा रहा था। चटखारे ले ले कर। उसे मसाले वाली चीज़ें बहुत पसन्द आती हैं। चाहे थोड़ी-बहुत मिर्च भी क्यों न लग जाए। कभी-कभी तो उसका गला भी खराब हो जाता है। तभी न माँ कभी-कभी ही मसाला खाने देती है। पर उसका वश चले तो सारा मसाला एक ही  बार में चट कर जाए। पर वह क्या करे? उसकी माँ ने बताया जो है कि ज़्यादा मसाला खाने से वह बीमार पड़ सकता है। डॉक्टर से इंजेक्शन भी लगवाना पड़ सकता है। पर वह तो डॉक्टर के पास जाने से ही डरता है। पता नहीं क्यों? कभी-कभी वह सोचता है कि उसे सब कुछ क्यों नहीं पता? माँ को ही सब कुछ क्यों पता होता है। वह तो इतना ही जानता है कि मसाले के नाम सुनते  ही उसकी लार टपकने लगती है।

 

लू लू अब शान्त दिख रहा था। एकदम सामान्य। माँ ने सोचा यही समय ठीक है लू लू से स्कूल की बात पूछने का। सो प्यार से पूछा - “लू लू आज स्कूल में कुछ हुआ क्या? किसी ने कुछ बुरा कहा क्या?" लू लू को स्कूल की घटना फिर याद आ गई। उसके चेहरे पर तनाव उभरने लगा। पर पहले जितना गुस्सा नहीं आया। बोला - “हाँ माँ, स्कूल में कुछ बच्चे बहुत गन्दे हैं। मैं गन्दे बच्चों वाले स्कूल नहीं जाऊंगा!"

     

"पर हुआ क्या, बता भी तो?" - माँ ने प्यार से उसे अपनी ओर खींचते हुए पूछा।

"माँ, वे मुझे फटीचर फटीचर बुलाते हैं!"

"क्यों भला?"

"कहते हैं। कि तू फटीचर, तेरा घर फटीचर। तभी तो तू रोज़ रिक्शा में लद कर आता है। हमें देख हमें तो हमारे ड्राइवर कार में छोड़कर जाते हैं।"

     

माँ अब सब समझ गई थी। लू लू का गुस्सा भी उसे ठीक लगा था। उसने सोचा कि ज़रूर वे नासमझ  बच्चे होंगे। पैसों का रौब दिखाने वाले। शायद उन्हें उनके माता-पिता अच्छे और ठीक संस्कार नहीं दे सके होंगे। बोली - “देखो लू लू, तुमने ऐसे बच्चों को ठीक ही गन्दा कहा। पर ऐसे बच्चे कुछ ही होते हैं, सब नहीं। कार में आने वाले कुछ ऐसे बच्चे भी तो होंगे जो वैसा गन्दा व्यवहार नहीं करते।"

 

लू लू ने थोड़ी देर सोचा। फिर बोला - “हाँ माँ। सोनू भी तो कार में आता है। वह तो मेरा बहुत अच्छा दोस्त है। और राजू भी कार में आता है। उसने भी मुझे कभी फटीचर नहीं कहा। जब मैं रो रहा था और गुस्से में था तो उन दोनों ने  ही तो मुझे  फटीचर कहने वाले बच्चों को गन्दा कहा था। वे तो मुझे बहुत प्यार करते हैं। हम साथ-साथ ही तो खेलते हैं।"

 

"देखा, तुमने सोचा तो पता चला कि सब बच्चे एक जैसे नहीं होते। अच्छे भी होते हैं। और गन्दे भी। पर में तो कहूंगी कि गन्दे बच्चे भी गन्दे नहीं होते। वे नासमझ होते हैं। उन्हें गन्दा या नासमझ उनके बड़े ही बनाते हैं। इसलिए उनका दोष अधिक नहीं होता। कोई उन्हें ठीक से समझाए तो वे भी अच्छे बन सकते हैं। अच्छा यह तो बता कि जब उन बच्चों ने तुम्हें फटीचर कहा तो तुमने क्या किया?" - माँ ने पूछा।

 

"मुझे बहुत गुस्सा आया माँ! रोना भी आया, बस!"

"इसीलिए न कि तुम्हें  लगा कि तुम फटीचर हो क्योंकि तुम रिक्शा से आते-जाते हो।"

 "हाँ माँ!"

"बेटे रिक्शा से तुम इसलिए जाते हो क्योंकि हमारे पास कार खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं।और यह सच्चाई है।

" लेकिन माँ ....."

" पर बेटे रिक्शा पर जाने से हम फटीचर हो गए, यह उन की सोच है। बहुत से ऐसे बच्चे भी हैं। जिनके माँ-बाप के पास उनसे भी ज़्यादा पैसे हैं। और, और भी ज़्यादा बड़ी कारें हैं। वे और भी मंहगे स्कूलों में जाते हैं। तब तो उनकी तुलना में ये बच्चे भी फटीचर हुए। क्यों ?"

     

लू लू को बात कुछ समझ में आने लगी थी। चाहे पूरी तरह नहीं। माँ ने आगे कहा - “देखो लू लू, अगर किसी के माँ-बाप के पास ज़्यादा पैसे हैं। या कम इसमें उनके बच्चों का कोई दोष नहीं होता। इसलिए बच्चों को ऐसी बातों पर नहीं बल्कि अपने काम पर अधिक ध्यान देना चाहिए। मैं तो यही समझती हूं। अब तुम क्या समझते हो यह तो तुम ही जानो।"

 

"हाँ माँ, ऐसे तो मैंने सोचा ही नहीं था।"

"तो बताओ तुम स्कूल में क्या करने जाते हो? रिक्शा दिखाने या कुछ और करने?"

"स्कूल तो मैं पढ़ने जाता हूं माँ!"

"और वे बच्चे जो कार से आते हैं?"

"वे भी पढ़ने ही जाते हैं, माँ!"

"ठीक। तो बेटे स्कूल में बच्चों का काम अधिक से अधिक पढ़ना होता है। अच्छे से पढ़ना। ध्यान से पढ़ना।"

"हाँ माँ।"

 

माँ को खुशी थी कि उसका लू लू बहुत समझदार बच्चा है। ठीक बात को झट से समझ लेता है। धीरे से कहा - “तो बेटा स्कूल में सबसे अच्छा वही बच्चा कहलाता है जो सबसे अधिक ध्यान से पढ़ता है। अगर किसी को फटीचर कहना ही पड़े तो उसको कहो जो अपने काम पर ध्यान नहीं देता। नहीं तो कहने की जरूरत भी क्या है।"

 

"हाँ माँ!"

"तो तुम स्कूल में क्या करते हो?"

"ध्यान से पढ़ता हूं। तभी तो मुझे किसी भी विषय से डर नहीं लगता। टीचर भी तो कितना प्यार  करती है।"

"और हम भी।"

"हाँ माँ आप भी, पापा भी और दीदी भी।"

"सब तुम्हें प्यार करते हैं। तो बहुत मज़ा आता है न?"

"हाँ माँ, बहुत मज़ा आता है।"

"तो क्या तुम चाहोगे कि तुम्हारा यह मज़ा कम हो जाए?"

"नहीं माँ।"

"पर यह मज़ा तो तभी आएगा न जब तुम स्कूल जाओगे?"

"हाँ माँ!"

"तो कल स्कूल जाओगे कि नहीं?"

"हाँ माँ!"

 

पर ’हाँ करते करते लू लू की आँखों में शरारत उतर आयी थी। बोला - “माँ, आप बड़ी चालाक हो, नहीं नहीं समझदार हो।"

 

माँ ने लू लू को गले लगा लिया। लू लू इतना खुश था, इतना खुश था कि कितना खुश था उसे समझ ही नहीं आ रहा था।

 

बालकथा

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