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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

Children

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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

Children

आंसू

आंसू

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सलोनी बिटिया की फरमाइशों को विराम ही नहीं लग रहा था, ‘पापा ! चॉकलेट लाना, टॉफी लाना, बिस्किट लाना, सेब लाना और बड़ी -बड़ी आंखों वाली गुड़िया लाना जिसके सुनहरे बाल हों और लाल कलर की फ्रॉक पहने हो।’


समीर मौन स्वीकृति में सिर हिला -हिलाकर हामी भर रहा था, कि तभी पीछे से समीर की पत्नी आ गई।


‘सुनो ! थोड़ा जल्दी तैयार होकर निकल जाओ, नहीं तो कल की तरह आज भी काम नहीं मिलेगा। फिर कहां से पूरी करोगे बिटिया की फरमाइशें।’


 पत्नी की गंभीर बात सुनकर समीर ने जल्दी-जल्दी हाथ चलाकर नहाने -धोने का काम निपटाया और कपड़े पहनकर सलोनी से टाटा बाय-बाय करते हुए काम की तलाश में बाहर निकल गया।


 सलोनी बिटिया अपने पापा को तब तक देखती रही जब तक समीर लंबी सड़क पर आंखों से ओझल न हो गया। 


सलोनी की मां रसोई घर से उसके लिए कुछ खाने को लाई। अपनी बेटी की गोल - मटोल स्वच्छ भूरी आंखों में निश्छलता और अपनों के प्रति प्यार को देख, उसकी भावनाएं जागीं तो उसने अपनी बेटी को सीने से चिपका लिया। आंखों से आंसू स्वतः निकल गये। मन ही मन उसने ईश्वर से प्रार्थना की प्रभु ! आज मेरे पति को काम अवश्य मिल जाये। डबडबाई आंखों से वह खुद आंसू पोंछती तब तक सलोनी बिटिया ने अपनी मम्मी के आंसू पोंछ दिये।



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