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Satish Lakhotiya

Abstract

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Satish Lakhotiya

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चाँद की महिमा

चाँद की महिमा

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कल्पना के अथाह सागर में

पाया मैंने अपने आप को

झिलमिल सितारों के बीच

पलक न झपकी मेरी

दिव्य प्रकाशमय 

उजाले ही उजालों के बीच।


 एहसास हुआ मैं पहुंचा 

 चंद्रलोक के द्वार

 किया स्वागत सितारों रूपी दूतों ने

 दिल हुआ खुशी से बाग बाग

हुए जब चंद्र देव के दर्शन

क्या कहूं मैं आपको

 उस अद्भुत दृश्य का

 वर्णन क्या बताऊं आपकाे।


निर्मल , मोहक लुभावना चॉंद 

झिलमिल सितारों के संग

नील गगन दे रहा स्वीकृति

चंद्रदेव है हमारे ही संग।


 करकर दंडवत प्रणाम मैने 

 चंद्रदेव से कहा

 आया प्रभु पृथ्वी लोक से मैं

आपके सुंदर मोहक रूप के दर्शन को

 क्या मैं आ सकता आप के निकट

 और आप को निहारने को।


 कहा देव ने पहले

 करो मेरी एक इच्छा पूरी

 पृथ्वी वासी हो तुम

 करो महिमा का बखान तुम मेरी 

प्रभु बचपन में सुनते थे हम मां से 


चंदामामा की कहानियां

 सुनते सुनाते खिलाती थी मां

 पेट भर रोटियां

आसमान में निहारते आपको

आ जाती थी मीठी नींद 

 सुंदर सलोना मुखड़ा आपका

 लगता था हमारे ही सामीप्य।


व्रत उपवास रखती देवियां

बाट जाेहती आपकी

बिन आपके दर्शन के

व्रत ना छूटे

ऐसी महिमा है आप की।


 शरद पूर्णिमा के पावन दिन का

 रहता सभी को इंतजार

गोलाकार में होते आपके दर्शन

 अद्भुत अलौकिक दिखते हाे आप ।।


दूध का भोग लगाकर

 करते आप की महिमा का गान

 उत्सव जैसा रहता नजारा

और क्या सुनना चाहाेगे

आप की महिमा का बखान।


 कल्पनाओं से जब मैं

आया धरातल पर

पाया अपने आपको

आरामदेह बिस्तर पर

सामने पाया श्रीमती को

आक्रमक तेवर लेकर


बोला मैं क्यों चिल्ला रही हो भाग्यवान

बैठाे मेरे पास बताता हूं तुम्हें

चंद्रलोक की सैर करके आया हूं मैं

चैन की सांस तो लेने दे भाग्यवान 

अभी न कर तु मुझे 

तंग और परेशान।


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