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आस्था के दुश्मन
आस्था के दुश्मन
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© Arif Khan

Inspirational

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ये त्रासदी, ये सैलाब, ये किस्सा, नया नहीं है,
आवाम के दर्द का ये हिस्सा, नया नहीं है.
बन्द कमरों में चीखें कभी महसूस नहीं होती,
अनजान बने रहना सियासत का, नया नहीं है।
बनकर रहनुमा रहते है अब तो वहसी भी,
आस्था के नाम पर ये धंधा, नया नहीं  है।
शहर जलेगा, घर जलेगा तो मौते भी होगी,
अंधविश्वासी लोगों का ये पैंतरा, नया नहीं है।
पूजते थे उसे लोग करोड़ों की तादाद में,
मगर गुनाहों से उसका नाता, नया नहीं है।
इक कलम थी कि बिकने जो तैयार नहीं है ,
तो फिर लिखा उसने जो फैसला, नया नहीं है,
हर शख़्स में आ गयी है अय्यारी अब तो,
गुनाहगारों का अब देवता बनना,नया नहीं है ।

सियासत आस्था अन्धभक्ति राजनीति

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