उपवास
उपवास
"अम्मा, जा रहे हम, शाम को आते हैं। ध्यान रखना अपना और समय से दवा ले लेना" घर की चौखट पार करते करते रवि एक साँस में पूरी बात कह गया। "काहे से तुम ही तो हो अम्मा के हमदरद, हम तो दुश्मन हैं उनकी; खुद ही खिलाना आ कर उन्हें अपने हाथ से, हम भी चले जाएंगे कहीं, तुम और अम्मा रहना साथ में " किरन दरवाजे के अन्दर से ही गुस्सा करते हुए बोली "अरे नहीं रे पगली! हम जानते नहीं क्या कि तुम अम्मा का कितना ध्यान रखती हो। हम तो एही लिए कह रहे ताकि उनको पता रहे कि उनका लड़का भी उनके लिए फिकर करता है ", रवि बात को बराबर करते हुए बोला "जाओ जाओ, हमें मत बताओ, सब समझते हैं हम। अब जाओ नहीं तो फिर से देर हो जाएगी" किरन इठलाते हुए बोली। "तुम्हारा मियां बीबी का हो गया हो तो हमें पानी दे जाओ, पियास के मारे जान सूखी जा रही, आज निरजला ही मारना हो तो वैसा ही बोल दो, राम भजन ही कर ले मरने से पहले", अम्मा ने कटाक्ष रूपी बाण से रवि और किरन की उस प्यार भरी नोक झोंक का संहार कर दिया। किरन भागती हुई अन्दर आई और अम्मा के लोटे में पानी भर दिया। "ये लेयो अम्मा, अब कुछ खा लो, फिर दवाई ले लो, उसके बाद चैन से राम भजन करना। " किरन अम्मा के सिरहाने से दवा का लिफाफा उठाते हुए बोली।
"आ गये रवि साहब, आइये आप का ही इन्तज़ार था", रवि घर में घुस पाता, इसके पहले ही आकाश के तीखे व्यंग ने उसका सीना छलनी कर दिया। "भइया जी.....वो...। "ये वो छोड़ो और मम्मी से लिस्ट और पैसे लेकर बाजार से सामान ले आओ। कल फंक्शन है और कोई तैयारी नहीं हुई अभी तक" आकाश कुछ रवि से और कुछ खुद में ही बड़बड़ाते हुए बोले। "कल क्या है भइया?" जिज्ञासावस रवि के मुंह से अनायास ही यह सवाल निकल आया। "जितना बोले हैं उतना करो, जादा CID मत बनो समझे" आकाश का जवाब वैसा ही था, जैसा अक्सर होता था। ऐसा नहीं था कि आकाश अपने मद में चूर रहने वालों में से था; पिता जी का जल्दी ही हाथ सर से उठ जाने के बाद अक्सर परिस्थितियाँ व्यक्ति को उम्र से पहले ही धीर गंभीर बना देती हैं। "आ गये रवि?", किचन से निकलते हुए निर्मला जी ने सहज भाव से बोला। "जी मम्मी जी, वो अम्मा की दवाई लानी थी, इसीलिए थोड़ा देर हो गयी", रवि ने बिना पूछे खुद ही सफाई दे दाली। "कोई बात नहीं, ये लिस्ट रखी है, बाज़ार से सामान ले आओ", निर्मला जी ने मेज की तरफ इशारा करते हुए कहा। "वो भइया कह रहे थे कि कोई प्रोग्राम है....?" रवि ने अपनी जिज्ञासा फिर से जाहिर की। "जो तुम्हारी भाभी जी हैं ना, उनके उपवास का पारायण है कल, उसके लिए ही कथा और प्रसाद वितरण का प्रोग्राम है", निर्मला जी ने थोड़ा व्यंगात्मक होते हुए कहा। "ओह! अच्छा, तभी भाभी जी नहीं दिख रही यहाँ, वरना आप को कहाँ ही किचन में घुसने देतीं हैं वो। " रवि ने मन्द मन्द मुस्काये हुए कहा। "हां हां, बड़ी कामकाजी हैं ना भाभी तुम्हारी, तीन लोगों के लिए खाना बनाने में तो आफत आती है उन्हें, हमारी तरह दिन दिन भर चूल्हा फूंकती तब देखते हम" शिकायती लहजे में निर्मला जी ने कहा। यही प्यार तो था जिसने इस घर को बांध कर रखा था, वरना आज के समय में पिता के जाने के बाद कौन सा बेटा विदेश का धन और विलासितापूर्ण जीवन छोड़ कर माँ का ध्यान रखने के लिए वापस आ जाता है। रवि को याद आ गया वो दिन जब वो पहली बार इस घर में दाखिल हुआ था। सडक किनारे ढाबे पर बर्तन धोते हुए रवि पर आकाश के पिता जी की नज़र अनायास ही ठहर गयी। "ए लड़के, इधर आओ!" "जी बाबू जी! "क्या नाम है तुम्हारा?" "जी रवि" "कहाँ रहते हो?" "जी दिन में यहाँ पर, रात में जहां जगह मिल जाए, सो जाते हैं ""पिताजी क्या करतें हैं?" "पिताजी नहीं रहे, अम्मा हैं, यही ढाबे पर खाना बनाती हैं " "स्कूल जाते हो?" "पहले जाते थे, फिर पैसा खतम हो गया तो अम्मा के साथ काम करने लगे" "हमारे साथ चलोगे? पैसा भी मिलेगा, और घर भी...." "अम्मा से पूछ के आते हैं", रवि ने बाबूजी के अगले सवाल का इन्तज़ार किये बिना कहा और भाग के ढाबे में घुस गया। अगले दिन रवि के जीवन का मानो सही मायनों में सूर्योदय हुआ हो। आकाश के पुराने कपड़े पहने आज वो खुद को किसी राजकुमार से कम तो नहीं ही समझ रहा था। "अम्मा, ये देखो, इसमें चार जेब हैं। जब पैसा मिलेगा ना, तब सारी जेबें भर जाएंगी " बालसुलभ मन, जिसने पैसे की तंगी के वीभत्स रूप को अपने सबसे कच्चे उम्र के पड़ाव पर इतने करीब से देखा हो, उसके लिए ऐसी महत्वाकांक्षा बिल्कुल भी गलत नहीं थी। कितना कुछ देखा है रवि ने भी इस दुनिया में, जिस उम्र में बच्चे अपने बाप के कन्धों पर बैठ कर सैर करते हैं, उस उम्र में तो खुद रवि के कन्धों पर ही खुद का और माँ के जीवन यापन का बोझ आ गया था। सड़क पर बिक रहे गुब्बारों को देखकर मुंह फेर लेना हो या फिर बर्फ के गोले को देखकर गला खराब हो जाने का बहाना बना कर खुद को बहलाना, फीस की वजह से स्कूल से निकाला जाना हो या फिर काम का पैसा दिये बिना भगाये जाना, रवि भी कम उम्र में ही दुनिया दारी के दांव पेंच सीख चुका था और यह भी समझ चुका था कि पैसा इन्सान की वो जरूरत है, जिसके बिना बाकी जरूरतें भी किसी काम की नहीं। अपमान, तिरस्कार, दुत्कारा, उपेक्षा... यह सब से फर्क पड़ना तो कब का बन्द हो गया था उसे; अब उसका उद्देश्य सिर्फ एक ही था, इतना पैसा कमाना कि उसके बच्चों को वो सब कभी न देखना पड़े, जिसे देखकर रवि बड़ा हुआ था। वो अपने बच्चों को को वो दुनिया दिखाना चाहता था जहां आकाश के पिताजी जैसे लोग रहते थे; जिनके होने से ये समाज थोड़ा ही सही, अच्छा लगता है। सोचते सोचते कब बाज़ार आ गया रवि को पता ही नहीं चला। दुकान पर सामान का पर्चा और झोला थमा कर वो बाकी के सामान खरीदने में लग गया। "मम्मी जी, सामान आ गया !" दरवाजे पर पहुँचते ही रवि ने आवाज़ लगाई। "आ गये; चलो रख दो यही किनारे " कुछ सुस्ताते हुए निर्मला जी बोलीं। "देख लीजिए, सब ठीक है ना, और ये लीजिए, 1200 रूपिया बचे हैं, बाकी हिसाब पर्चे पे लिखा है। " रवि ने मानों अपने सर से सबसे भारी बोझ उतार कर मेज पर रख दिया। " ज़रा याद कर के बताओ कि आख़िरी बार तुमसे किसने और कब हिसाब मांगा था?" शिकायती लहजे में निर्मला जी ने तंज कसा। "अरे नहीं मम्मी जी, वो मतलब नहीं था हमारा ; पता है केले वाला 30 रुपिया दर्जन से कम में मान ही नहीं रहा था; लेकिन हम भी पीछे लगे रहे और आखिरी में 30 वाला केला 25 में ले के ही आए" रवि की बात घुमाते हुए खुद की ही तारीफ में कसीदे पढ़ने शुरू कर दिए। "बातें बनाना कोई तुमसे सीखे " एक और मीठा तंज। "चलो अब सामान किचन में रख दो और पूजा घर की सफाई कर दो, और अच्छे से करना; और पूरा करना; बिना पूरी सफाई किये घर मत चले जाना, वरना आकाश का गुस्सा तुम जानते ही हो"। एक साथ इतने आदेश सुनकर एक पल को तो रवि कुछ असहज हो गया, लेकिन अगले ही पल आस्तीन मोड कर मिशन सफाई पर लग गया और जब पूरी सफाई कर के उठा, तो रात के 9 बज चुके थे। "मम्मी जी, सफाई पूरी हो गयी है, आप देख लो एक बार ""अच्छा!!ठीक है। तुम जाओ अभी, कल सुबह जल्दी आ जाना; बहुत सारे काम हैं करने के लिए ""जी मम्मी जी ""अच्छा सुनो, कल अम्मा और किरन को भी लेकर आना कथा के समय " निर्मला जी ने लगभग आदेश देते हुए कहा। रवि मौन सहमति देता हुआ घर से निकल गया; शायद इसीलिए क्योंकि उसे पता था कि अब घर की शान्ति कुछ समय के लिए भंग होने वाली थी। "क्या जरूरत थी पूरे घर को बुलाने की?", आकाश ने गुस्साते हुए मम्मी से पूछा। " सौ मेहमान आएंगे ही, दो और बढ़ जाएंगे तो कौन सी आफत आ जाएगी" निर्मला जी ने सीधे शब्दों में नपा तुला जवाब दे दिया। आकाश को रवि या उसके परिवार से कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन पता नहीं क्यों उसे रवि का अपनापन छलावा सा लगता था। यही वज़ह थी कि पूरे घर में सिर्फ आकाश का कमरा ही ऐसा था जहां रवि को बिना पूछे घुसने की अनुमति नहीं थी। इसे रवि की मजबूरी कह लें या सीधापन, लेकिन रवि भी सहज भाव से आकाश के तिरस्कार को सह लेता था। रात के नौ बज चुके थे। रवि ने धीरे से घर के किवाड़ को धक्का दिया तो वो चर्ररररर की आवाज़ के साथ खुल गया। हालांकि यह भी नया नहीं था उसके लिए। अम्मा आठ बजे तक दवा खा कर बिस्तर पकड़ लेती थीं और किरन घर के बचे हुए काम करने में व्यस्त हो जाती थी, इसलिए घर के किवाड़ उढ़का देती थी जिससे मवेशी घर में ना घुस जाएँ और रवि को भी अकारण बाहर ना खड़ा होना पड़े; लेकिन रोज़ में और आज में फर्क सिर्फ एक था - सन्नाटा! रोज़ इस समय तक घर के बर्तन बज रहे होते थे, या फिर पास के नल से बाल्टी भरने की आवाज़ आ रही होती थी, लेकिन आज ऐसा कुछ भी नहीं था। रवि ने धीरे से कमरे की लाइट जलाई, और जो नज़ारा देखा, उससे उसका दिल भर आया। चारपाई पर अम्मा गहरी नींद में सो रही थी, और उनके पैरों के पास बैठी बैठी सो रही थी किरन; पास पड़ी तेल की कटोरी देख कर ये जानना मुश्किल नहीं था कि अम्मा के पैर दबाते दबाते किरन की आंख लग गयी होगी। रवि ने किरन के चेहरे की तरफ देखा और अपलक देखता ही रह गया। कितनी मासूमियत थी उस चेहरे में; जैसे कोई छोटा सा बच्चा खेलते खेलते थक कर जहां जगह मिली वहीं सो गया हो। वो कैसे भूल सकता था वो दिन जब उसने पहली बार किरन को देखा था -"अम्मा ये वाली पहन लें ? अभी दीवाली में ही लिये थे, एक्कै दो बार पहने हैं अभी तक!!" " पहली तो ये के आदमी अपने करम से अच्छा बनता है, कपड़ों से नहीं, और दूसरी ये कि ये बुसट तीन साल पहले बनवाये थे तुम, तब से हर सादी समारोह में एही बुसट चमक के चल देते हो!" अम्मा के शब्द निश्चय ही कठोर थे, लेकिन सोलह आने सच भी थे। आदमी के कर्म ही उसको अच्छा या बुरा बनाते हैं; लेकिन बात जब शादी के लिये लड़की देखने की हो तो कोई भी बन ठन कर ही जाना चाहेगा ना। आखिरकार पहली बार लड़की देखने जाने की बात ही अलग होती है। रवि ने अम्मा के परम ग्यान को कुछ समय के लिए ताक पर रखा और अपनी समझ से सबसे ज्यादा बन संवर के तैयार हो गया। कोई आधा घण्टे का सफर था लड़की वालों के घर तक का...और रवि के लिए ये आधे घण्टे, उसकी जिंदगी के सबसे लम्बे आधे घंटे थे " लेओ बाबू, पानी पियो " रवि की होने वाली सास ने सप्रेम रवि को पेठे के साथ पानी दिया। " देखिये बहन जी, खाना पीना होता ही रहेगा, आप बस बिटिया को बुलाइये। ऊ का है ना, कि समय ज्यादा हो गया तो वापसी का साधन भी नहीं मिलेगा ", रवि पहला पेठा मुंह मे रख पाता इसके पहले ही अम्मा ने आगे के पेठे की सम्भावना ही खत्म कर दी; लेकिन जो हाथ में है उसका क्या?? कुछ देर उधेड़ बुन में रहने के बाद रवि ने प्रसाद मान कर उसे ग्रहण कर ही लिया। पानी का गिलास उठाने को जैसे ही वह बढा तो सहसा अम्मा की आखों से उसकी आँखे मिली, जो मानो यही कह रही थी कि " ज्यादा गला सूख रहा तुम्हारा, घर चलो, बताते हैं तुम्हे। " एक पल को तो रवि को अपराध बोध हुआ, लेकिन पेठे की मिठास अपना काम कर चुकी थी; पानी पीना अब इच्छा नहीं मजबूरी बन चुकी थी; इसलिए अम्मा के इशारों के एक और बार दरकिनार कर के उसने पानी के गिलास को मुंह लगा लिया। "उह्हु उह्हु...." अचानक रवि की खाँसी ने सबका ध्यान खींचा। "क्या हुआ बाबू?""कुछ नहीं!"रवि के शब्दों से ध्यान हटाकर जब अम्मा ने उसकी नजरों का पीछा किया तब उन्हें पूरा माजरा समझ आ गया। परदे के उस तरफ झिझकी सकुचाई वो खड़ी थी। हल्के पीले रंग के सलवार कुर्ते और दुपट्टे में लिपटी, गेहुआं रंग, गले में छोटा सा लॉकेट, हाथों में हरे कांच की चूडियां माथे पर नन्ही सी काली बिन्दी, कुदरती सुर्ख लाल होंठ, कानों में बालियां और नाक में छोटी सी नथ पहने, किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी वो। "आओ बिटिया, बैठो!" अम्मा ने अपने अनुभव से स्थिति को सामान्य करते हुए कहा। "क्या नाम है तुम्हारा?" अम्मा ने उसके बैठते ही पहला सवाल दागा। "ज्जी किरन !!""किरन!!", नाम काफी था रवि के लिए अपनी आगे की जिन्दगी के सपने देखने के लिए। पहली नज़र का प्यार अगर यह नहीं था, तो ईश्वर जाने क्या था। "अरे! आ गये आप, जगाए काहे नहीं? "रवि की तन्द्रा तब टूटी जब किरन की नींद। "तुम सोते हुए इत्ती प्यारी लग रही थी, मनै नहीं किया जगाने का", रवि इस सवाल के लिए पहले से तैयार था" मतलब हम जागते हुए प्यारे नहीं लगते?? " रवि को छेड़ने के लिए किरन शिकायती लहजे में बोली। रवि इस हमले के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था; हड़बड़ाकर बोला " नहीं नहीं! ये मतलब नहीं था हमारा" "जाओ जाओ, सब जानते हैं हम, हाथ मुंह धो लो, खाना लगाए दे रहे हम" किसी भी सफाई की सम्भावना को सिरे से खारिज करते हुए किरन खाना लगाने बैठ गयी। "कल पूजन है मम्मी जी के यहाँ, देर होगा आने में। " खाना खाते खाते रवि ने किरन को विस्तार में पूरी बात बता दी। "हम और अम्मा का करेंगे आ के, आप आते हुए प्रसाद ले आना, और पूजा में हमारी तरफ से एक सौ एक रूपिया चढ़ा देना" किरन ने रवि के मन की बात भांपते हुए कहा। आकाश के रवि के प्रति व्यवहार से वो भी अनजान नहीं थी। "एक सौ एक जादा नहीं है "भगवान ने नाम पे जा रहा है, जादा मत सोचिए। उन्हीं की किरपा से हमारा सब काम चल रहा है " किरन की ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ने रवि को निरूत्तर कर दिया। अगली सुबह रवि जल्दी घर से निकल गया। दिन भर पूजा चली, शाम को खाना पीना शुरू हुआ जो देर रात तक चला। जब सारा काम निपट गया, तब रवि की नज़र घड़ी पर गयी; ग्यारह बज चुके थे। "मम्मी जी, हम जाएँ अब?" रवि ने अनुमति लेते हुए कहा। "हां जाओ, और खाना बांध दिया है, घर लेते जाना। " निर्मला जी ने मेज की तरफ इशारा करते हुए कहा। "लेकिन ....?""प्रसाद को न नहीं करते; " रवि के सवाल को बीच में ही काटते हुए निर्मला जी कहा। "जी ठीक है। "रात बारह बजे के करीब रवि घर पहुंचा। किवाड़ आज उढके होने के बजाय खुले हुए थे। ये अच्छा संकेत बिल्कुल नहीं था। घबराते हुए रवि अन्दर घुसा और अन्दर का नजारा देख कर स्तब्ध रह गया; खाने का झोला उसके हाथ से फिसल कर वहीं देहरी पर गिर पड़ा। आज किरन लेटी हुई थी और अम्मा उसके सिरहाने बैठी उसके सर पर पट्टी रख रहीं थी। "क्ययया हुआ अम्मा??" रवि घबराते हुए बोला "कुछ नहीं! वो थोड़ी सी कमजोरी लग रही थी, और कुछ नहीं " अम्मा कुछ कहती इसके पहले ही किरन बोल पड़ी। "चुप रह! दुष्ट कहीं की; आज सुबह से उपवास पर थी ये; बिना किसी को बताये खाली पेट सारा काम किया, उसके बाद नंगे पैर देवी पूजन के लिये गयी थी, चार मील दूर। लौट कर घर आते हुए चक्कर खा कर गिर पड़ी। ये तो भला हो साथ वाली ममता का जो इन्हें सही सलामत घर छोड़ गयी, वरना इस उमर में हमसे तो चला भी ना जाता, कहाँ ढूंढते तुम्हे?" अम्मा के स्वरों में प्रेम, गुस्सा, फिक्र, सबकुछ एक साथ देखकर किरन की आंखों का बांध टूट पड़ा। उधर अम्मा भी रोने लगीं रवि अभी भी सकते में था। "उपवास था तो आलू या फल तो खा ही सकती थी ना, क्यों नहीं खाई?" खुद को थोड़ा समेटते हुए रवि ने पूछा। "सब हम खा लेते तो कल सब लोग क्या खाते?" किरन धीरे से बोली। "ले आते हम कल सुबह!" रवि का प्रत्युत्तर तैयार था। "तनख्वाह में अभी चार दिन हैं, आखिरी बचे सौ रूपये आप पूजा में दे दिये, दुकानदार का पुराना हिसाब ही बकाया है, वो भी उधार नहीं देगा; कहाँ से ले आते कल?? अब आँखें भिगोने की बारी रवि की थी। जहां वो दो घण्टे पहले तक था, वहां खाना इतना था कि फेंकने कि नौबत थी, और यहाँ !!आज उसके मन में ईश्वर के लिए बहुत सवाल थे, जिनमें से किसी एक का भी जवाब इस पूरी दुनिया में किसी के पास नहीं था। तभी अचानक दरवाजे पर आहट हुई। रवि मुड़ा और देखा कि प्रसाद वाले झोले में गाय मुंह डाले हुए है, और अनायास ही उसके मुंह से निकला - "जय राम जी की !!"
