तुम करती ही क्या हो
तुम करती ही क्या हो
सुबह पांच बजे अलार्म बजा, शिखा आज बेमन से उठी| अंग-अंग दर्द कर रहा था, दो मिनट और लेट जाती हूं| उसमें ही दस मिनट निकल गये| आखिर सवा पांच तो उठना ही पड़ा। अलसाई आंखों को खोला और बाथरूम में जाकर मुंह धो आई। फिर फटाफट किचन में गई, एक बर्नर पर पानी चढ़ाया, सास को गर्म पानी दिया फिर आराम से रखी सब्जियों को फ्रिज से निकाला। क्या बनाऊं, कल इसके लिए सोच नहीं पाई थी| कल अचानक से पास में रह रहा बुआ सास का परिवार आ गया, डिनर भी यहीं था| रात को वो देर तक बैठे फिर उनके जाने में देर हो गई और सुबह आंख खुलने में।
आलू, टमाटर, टिंडे, तुरई सब छोड़कर भिंडी बना लेती हूं। ये सोचते ही लग गई भिंडी काटने में, सास आराम से गर्म पानी घूंट घूंट कर पी रही थी। मन में तो आया कह दे, मांजी आप सब्जी काट दें तो मेरी मदद हो जायेगी| पर हिम्मत नहीं हुई, रोज सोचती है पर कह नहीं पाती। शादी को दस साल होने को जा रहे हैं, पर आज तक कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। शिखा के आते ही सास ने किचन से सन्यास ले लिया।
फटाफट शिखा ने भिंडी काटकर छौंक दी, इतने में बच्चों को उठाने का वक्त हो गया। एक तरफ सब्जी, दूसरे बर्नर पर चाय, तीसरे पर दूध चढ़ाकर बच्चों को उठाने चल दी। छोटे बच्चों को उठाओ, सहलाओ, लाड़ लड़ाओ, गोदी में बिठाकर पुचकारो तब जाकर उठते हैं| उसमें भी दस से पन्द्रह मिनट लग जाते हैं।
"मम्मी आज दूध नहीं पीना, आप पिला दो तो पी लूंगी।"
मन तो करता है अपने बच्चों को अपने हाथों से खिलाऊं, पर उसी वक्त गैस पर रखी सब्जी हिलानी थी, नहीं तो जल जाती। "छोटी अपने आप पियो मुझे और भी काम हैं।" शिखा ने यूं ही बनावटी गुस्से में कहा।
कभी कभी लगता है मैं अपने बच्चों को टाइम नहीं दे पाती, अब क्या करूं?
शिखा ने फटाफट परांठे सेंके और दोनों बच्चों को तैयार करके टिफिन पैक कर दिया| "अरे! मम्मी पानी की बोतल?"
"हां वो तो यही रह गई।" हड़बड़ी में शिखा ने वो भी भरी। दो मिनट भी देर हो जाये तो बस रूकती नहीं है, फिर बच्चो को स्कूटी से इतना दूर छोड़ने जाओं।
"शिखा चाय" ससुर जी अखबार का पन्ना पलटते हुए बोले। अभी बच्चों को बस स्टॉप पर छोड़ कर आती हूं। जैसे तैसे चाय दी और बैग लेकर दौड़ी।
बच्चों को बस में बैठाकर बोझिल कदमों से घर आते हुए पार्क में टहल रही औरतों को देखकर उसका भी मन हुआ कि वो भी सुबह की ताज़ा हवा में टहले पर अभी उसे विशाल का टिफिन पैक करना था, नाश्ता बनाना था। घर आकर उसने रोज की तरह सास, ससुर, पति के लिए नाश्ता बनाया, फिर सारे बिस्तर समेटे, यहां-वहां पड़े कपड़े उठाये, वाशिंग मशीन में कपड़े लगाये| किचन के दूध, दही के बर्तनों को खाली किया।
उसने तसल्ली से बैठकर चाय भी नहीं पी कि तभी खबर मिली कि आज मेड नहीं आयेगी, उसके पांव में चोट लगी है। घर का काम निपटाने में वक्त लग गया, लंच बनाया, लंच का काम निपटा था कि बच्चों को लाने का वक्त हो गया, छोटी एक बजे स्कूल से आती है। उसे लेकर आई, उसका खाना पीना किया, कपड़े बदले, बड़ी मुश्किल से उसे सुलाया था कि तभी बड़े बेटे को लाने का टाइम हो गया। शिखा का मन कर रहा था कि वो भी एक झपकी ले ले, पर फिर स्कूटी स्टार्ट की और बेटे को तीन बजे बस स्टॉप से लेकर आई। दोनों बच्चों के आने का अलग वक्त है, दो बार चक्कर हो जाते हैं।
ससुर जी टीवी देख रहे थे, वो भी ला सकते थे, पर ये भी शिखा का काम था।
सोनू की स्कूल की बातें सुनने में लीन थी, उसे खाना दिया था कि छोटी शोर शराबे से उठ गई। फिर उसे बहलाने में लग गई। शिखा, चार बज गए, चाय का टाइम हो गया, बना दो। शिखा की सास पलंग पर करवट बदलते हुए बोली।
शिखा तेज कदमों से किचन में दौड़ी और चाय चढ़ा दी। अपनी भी चाय का कप लेकर कमरे में आई। दोनों बच्चों की डायरी चैक की, उन्हें होमवर्क करवाया, छोटी का डिक्टेशन था, उसे स्पेलिंग याद करवाई, सोनू के कल मैथ्स का टेस्ट था, उसे समझाया। इसी में छह बज गये, सास-ससुर जल्दी खाना खा लेते हैं, एक बर्नर पर सब्जी चढ़ाई तो दूसरे पर बच्चों के लिए दूध। सीटी बजते ही आटा मला, बच्चों को दूध देकर तैयार किया और दोनों को ड्राइंग क्लास छोड़कर आई।
आकर सास-ससुर को खाना खिलाया फिर बच्चों को लाने का वक्त हो गया। शाम को पार्क में चहलकदमी करती औरतों को देखकर उसका भी मन करता वो भी कुछ देर यहां रूके, सबसे बात करे।
विशाल के ऑफिस से आने का वक्त हो जाता है, जाते ही चाय चढ़ा दी| तभी विशाल के चिल्लाने की आवाज आई, शिखा मेरा टॉवल कहां है? कितनी बार बोला है मुझे बाथरूम में चाहिए, मुंह हाथ धोने के बाद चाहिए होता है। वो मैंने धो दिया था, बाहर सूख रहा है अभी लाती हूं| शिखा जैसे ही टॉवल लेकर आई।
विशाल के मम्मी-पापा कह रहे थे कि "पता नहीं सारा दिन करती क्या है? घर में ही तो रहती है" ये सुनकर शिखा कड़वे घूंट पीकर रह गई।
पाठकों , सदा से औरतों के घरेलू कामों को कम आंका जाता रहा है| वो कितना भी कर लें, सुबह से रात तक लगी रहती हैं ,घर के लिए अपनी नींद, चैन, सेहत, करियर तक त्याग देती हैं, फिर भी यही सुनने को मिलता है कि घर पर ही तो रहती है, कुछ नहीं करती।
