संगति का प्रभाव
संगति का प्रभाव
पिता – बेटा जल्दी करिए। सारा सामान रख लिया न। फोन, टिकट, कागज़ वगैरह। एक बार चेक कर लो।
ध्रुव – हाँ, पापा सब रख लिया।
पिता – निकल रहे हैं, मैडम।
माँ – हाँ, ठीक है! अपना ख्याल रखना बेटा। कोई भी दिक्कत आए तो दीदी और भैया को बताना और मन लगाकर पढ़ाई करना ।
ध्रुव ने सर हिलाया।
ध्रुव को कॉलेज पहुंचाने के लिए उसके पिता साथ जा रहे थे। 12वीं के बाद पहली बार ध्रुव घर से दूर पढ़ने जा रहा था। उसी कॉलेज में उसके बड़े भाई और बहन भी पढ़ते हैं। यह पांच सदस्यों का एक साधारण परिवार है जो कि एक छोटे से शहर में रहता है। पिता मनोहर सरकारी कार्यालय में अच्छे पद पर कार्यरत हैं और कुछ ही महीनों में रिटायर होने वाले हैं। माँ स्वाति बहुत सरल स्वभाव की महिला हैं जिन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा और जीवन को सही दिशा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बच्चों के लिए उनके माता-पिता किसी दोस्त से कम नहीं थे। अत्यधिक व्यस्तता होने के बावजूद पिता ने बच्चों के पालन-पोषण और उनके मानसिक विकास पर पूरा ध्यान दिया। केवल 10वीं पास स्वाति ने हर सुख सुविधा त्याग कर एक जागरूक महिला, अच्छी अभिभावक और अच्छी जीवन संगिनी होने का हर फर्ज़ पूरा किया। उन्होंने अपने बच्चों को दुनिया के झमेलों और दिखावों से हमेशा दूर रखा। स्वाति ने घर और बाहर के सारे कामों का जिम्मा उठा रखा था जैसे सब्जी लाना, राशन लाना, मकान और बिजली का बिल जमा करना, बीमार पड़ने पर बच्चों को अस्पताल ले जाने से लेकर बच्चों के स्कूल-कॉलेज की गतिविधियों पर पैनी नज़र रखना, उनकी संगत का ध्यान रखना, वगैरह । शुरू से ही माता पिता ने उन्हें सही ग़लत का फ़र्क़ समझाया। पति-पत्नी के बीच बहुत तालमेल था जिसके कारण उनका जीवन सरलता से बीत रहा था।
पुत्री आकांक्षा और उसका बड़ा भाई अक्षत बहुत समझदार और मेहनती थे। आकांक्षा स्नातक के आखिरी साल और अक्षत परास्नातक के आखिरी साल में था। दोनों कॉलेज के तौर तरीकों से वाकिफ़ हो चुके थे। वह दोनों आत्मविश्वास से भरपूर थे। वह अपने माँ बाप को जल्द से जल्द सहारा देना चाहते थे और सफल हो कर उनका हाथ बटांना चाहते थे। ध्रुव अभी-अभी घर से निकला था जिसके लिए माँ परेशान रहती थी क्योंकि वह नादान और चंचल था।
माँ – न जाने हास्टल में कैसे रहेगा, कैसे सारे काम खुद करेगा। इसे तो अपना काम करना और अपना ख्याल रखना भी नहीं आता।
मनोहर- अरे मैडम आप क्यूँ फ़िक्र करती हैं। धीरे-धीरे सब सीख जाएगा और आकांक्षा और अक्षत तो हैं ही उसकी देखभाल करने के लिए। बाहर जा कर बच्चे अपना ध्यान रखना सीख ही लेते हैं।
मनोहर अपने बच्चों को लेकर बहुत निश्चिंत था। ध्रुव का स्वभाव कुछ अलग था। वह बाहर के लोगों से जल्दी प्रभावित हो जाता था और उसमे आत्मविश्वास की भी कमी थी। बचपन से ही उसमें हीन भावना की एक झलक थी। कॉलेज में कुछ समय बिताने के बाद भी उसकी दोस्ती सिर्फ़ एक लड़के से हो पाई । वह लोगों से कम घुल-मिल पाता था। अकेलेपन में वह उदास महसूस करने लगा। धीरे-धीरे उसकी दोस्ती साथ में पढ़ने वाली एक लड़की स्नेहा से होनी लगी जो कि आगे चलकर उसे काफ़ी अच्छी लगने लगी थी। वह दोनों ज़्यादातर साथ में समय बिताते थे। ध्रुव की दोस्ती स्नेहा के बाकी दोस्तों से भी हो गयी। पढ़ाई से ध्रुव का ध्यान भटकने लगा। वह कॉलेज की चकाचौंध और मस्ती में पड़ गया। खराब संगति की वजह से उसके मन में कई नकारात्मक बातें पनपने लगीं। उसे अपने दोस्तों की बातें सही और माँ बाप की हिदायतें बेकार लगने लगी। घर वालों ने पढ़ाई में खराब रिजल्ट का पूछा तो उसने अध्यापकों और उनके पढ़ाने के तरीक़े को दोषी ठहरा दिया। ज्यादा दिन तक ध्रुव की दोस्ती चल न सकी। उन दोनों में छोटी-छोटी बातों पर बहस होने लगी। सामंजस्य की कमी के कारण दोनों कुछ ही महीनों में अलग हो गए। इससे ध्रुव को बहुत दुख हुआ। वह बहुत उदास हो गया । उसके दोस्त और सहपाठियों ने भी उसे ही को दोषी ठहराया जिससे वह हीन भावना से ग्रस्त हो गया। उसका आत्मविश्वास बहुत कम हो गया। उसने मन लगाकर पढ़ने की कोशिश की पर उसे कुछ भी समझ नहीं आता था। वह हमेशा स्नेहा को याद करता रहता था। उसकी परेशानी बढ़ती गयी। ज्यादा दिन ये बातें घर वालों से छिप न सकी। सभी ने उसे बहुत सरलता से समझाया। वह जानते थे डांटने से कोई लाभ नहीं है।
आकांक्षा- तू इतना मत सोच उसके बारे में। ये सब होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। लगाव तो किसी से भी हो सकता है। लोग आते हैं और चले जाते हैं। इससे जीवन नहीं रुकता। हर चीज का एक सही समय होता है। हर कोई हमें कुछ न कुछ सिखा कर जाता है।
ध्रुव – पर उसने मुझे क्यूँ छोड़ा। कोई मुझसे बात नहीं करता। न ही कोई मुझे पसंद करता है। मुझसे पढ़ाई भी नहीं होती। मैं तुम दोनों की तरह क्यूँ नहीं हूँ। तुम दोनों को तो हर कोई पसंद करता है घर में भी और बाहर भी।
आकांक्षा – ऐसी बात नहीं है कि तुझे कोई पसंद नहीं करता। सब तुमसे उतना ही प्यार करते हैं जितना कि मुझसे और अक्षत से। तू ये सब मत सोच और पढ़ाई पर ध्यान दे। कालेज में ये छोटी मोटी बातें होती रहती हैं। तू बस अच्छा सोच और खुश रहा कर। समझा?
ध्रुव – हाँ
ध्रुव खुद को दूसरों से कमतर समझने लगा। पढ़ने के बाद भी वह बेहतर नंबर नहीं ला पा रहा था। ध्रुव ने तनाव से बचने के लिए अवसाद की दवा लेने लगा। जिससे उसका सर भारी-भारी रहने लगा। वह पढ़ाई नहीं कर पा रहा था न ही खुश रह पा रहा था। बहुत समझाने के बाद भी उस पर कोई सकारात्मक असर न देख के उसके माता पिता और भाई-बहन सभी परेशान हो गए। ध्रुव की क्लास में एक लड़की आएरा ध्रुव की परेशानी औऱ उसके मन की व्यथा समझ रही थी कि किस तरह वो हर चीज से डरने लगा है और नकारात्मकता का शिकार हो गया है। आएरा कक्षा में सब की मदद करती थी। कभी-कभी ध्रुव भी उससे मदद मांग लेता था। वह हमेशा लोगों की हर तरह से मदद करने की कोशिश करती थी। उसने ध्रुव की मानसिकता को समझने की कोशिश की क्योंकी वह जानती थी ध्रुव दिल का बुरा नहीं है।
आएरा ने उससे बात की और सारी परेशानी पूछी। ध्रुव ने उसे सब बताया कि कैसे वह कॉलेज में बहुत अकेला महसूस करता था। उसका स्कूल में भी कोई खास दोस्त नहीं था। कैसे उसकी दोस्ती स्नेहा से हुई। जब पहली बार उसे स्नेहा से अटेंशन मिली तो उसे बहुत अच्छा लगा और वो उसके लिए पूरी तरह से समर्पित हो जाना चाहता था । वह उसकी हर बात मानता था और उस पर विश्वास करता था। स्नेहा भी उससे अच्छा बर्ताव करती थी। धीरे-धीरे स्नेहा ने ध्रुव के मन में उसके घर वालों के लिए काफी शिकायतें भर दी। जो दुनियावी सुख सुविधाएं ध्रुव के पास नहीं थी वह उनके लिए ध्रुव से प्रश्न करती थी कि ये तो बहुत छोटी बात है। सामान्यतः सभी के पास होता है जैसे महंगा मोबाइल फ़ोन, अच्छी घड़ी, ढेर सारे कपड़े और तमाम चीज़ें।
आएरा ने समझा कैसे ध्रुव को बहुत जल्दी लोगों से लगाव हो जाता है और उनकी बातों से प्रभावित हो जाता है। वह दुनिया के छल- कपट से वाकिफ़ न था।
आएरा ने ध्रुव की पढ़ाई में पूरी मदद की जिससे उसे बेहतर परिणाम मिले। वह उसे प्रेरणादायक किस्से सुनाती थी जिससे उसका आत्मविश्वास बढ़े। वह उसके अंदर हर चीज को लेकर एक सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना चाहती थी। यह एक चुनौतीपूर्ण काम था। धीर-धीरे ध्रुव के परिवार को भी उसकी हालत सुधरती दिखी। ध्रुव को अब अच्छा महसूस होने लगा था। वह अपनी हर बात आएरा को बताता। वह खुद को महत्व देना जान गया था। उसने समझा कैसे जीवन में हर चीज का सही समय होता है और सफल बनने के लिए जीवन में प्राथमिकताएं निश्चित करना कितना ज़रुरी है।
ध्रुव ने अपने माता-पिता से माफ़ी मांगी और मेहनत से पढ़ाई करने का वादा किया। इसके बाद ध्रुव ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और धीरे-धीरे सफ़लता की सीढ़ी चढ़ता चला गया। उसकी ज़िन्दगी में खुशियों ने अपना आशियाना बना लिया था। ध्रुव अब समझ गया था कि मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी सकारात्मक रहना ही सफ़लता की कुंजी है।
