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Shikha Ankur

Drama Others Abstract


4.3  

Shikha Ankur

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शापिंग

शापिंग

6 mins 95 6 mins 95

श्रद्धा के हाथ तेज़ी से रसोई समेट रहें हैं। श्रेयस् अभी ऑफ़िस को निकले हैं। बच्चे दो बजे से पहले स्कूल से नहीं आएंगे। नहा-धोकर ग्यारह बजे तक वह भी मार्केट के लिए निकल जाएगी। सोचा तो यह था कि श्रेयस् ऑफ़िस जाते हुए उसे मार्केट ड्राॅप कर देंगे पर सबेरे-सबेरे इतना काम होता है कि वह निपट ही नहीं पाई। श्रद्धा नहाते हुए सोच रही है, "आज यहाँ से रिक्शे से मार्केट जाएगी दाल, चावल, चीनी, नमकीन, बिस्किट, चायपत्ती, मसाले सभी तो खत्म हैं। बड़ा सारा सामान है। आज अकेले ही सही, मशहूर टिक्की वाले पर टिक्की ज़रूर खाएगी।" "भूख लगी है पर फिर से बरतन फैल जाएंगे.....चलो टिक्की तो वहाँ खानी ही है।" मन ही मन फ़ैसला करते हुए श्रद्धा तैयार होकर निकलती है। रिक्शा वाले उसकी ओर लपकते हैं। सब के सब बीस रुपये मांग रहे हैं। धूप सिर पर चढ़ आयी है। मार्केट है ही कितनी दूर...पन्द्रह से ज़्यादा नहीं..। " पैदल ही निकलती हूं वापसी में सामान होगा... तब तो रिक्शा करना ही होगा" श्रद्धा सोचकर आगे बढ़ती है। बीस-पच्चीस मिनट पैदल चल कर वह मार्केट पहुँचती है। आज बुध बाज़ार लगा है। इसमें ज़रूरत की छोटी-छोटी चीज़े मिल जाती हैं। यद्यपि बुध-बाज़ार थोड़ा लो स्टैंण्डर्ड ही माना जाता है, फिर भी श्रद्धा को पसन्द है बुध-बाज़ार में सड़क के किनारे कपड़ा बिछाकर बिकते सामान को देखना। बाज़ार में भीड़ है, लेकिन बहुत अधिक नहीं। बुध-बाज़ार में एक ओर स्टील के बर्तन बिक रहे हैं तो उसके सामने छोटे बच्चों के बेहद घटिया कपड़े बिक रहें हैं। एक कोने में एक बुढ़िया चार-छः नेलपाॅलिश, लिपस्टिक और बिन्दी लिए खाली बैठी है। एक ओर प्लास्टिक के सामान तो दूसरी ओर आर्टीफीशियल ज्वेलरी बिक रही है। एक स्थान पर 'सब सामान 50 रुपये' के बोर्ड के साथ अनेक प्रकार की वस्तुओं का ढेर लगा है। यह विविधता से भरा बाज़ार है। यहाँ बर्तन, कपड़ा, चप्पल, सौन्दर्य प्रसाधन, गृहसज्जा का सामान आदि सब उपलब्ध है। देखा जाए तो यह एक माॅल के समान ही है, किन्तु यहाँ वातानुकूलित शीशे की दमकती दुकानें नहीं हैं।

श्रद्धा बुध-बाज़ार में घूम रही है। उसे कई वस्तुएँ पसन्द आती हैं, किन्तु वस्तुओं की उपयोगिता और मूल्य में तुलना करने पर प्रायः सभी का मूल्य उपयोगिता से अधिक है। "यहाँ घटिया सामान मिलता है। श्रेयस् हमेशा यहाँ से सामान लेने पर नाराज़ होते हैं।" श्रद्धा सोचती है। उसे एक बिस्तर की चादर भी खरीदनी है किन्तु बुध-बाज़ार में एक भी चादर इस लायक नहीं। वह आगे बढ़ती है। "पहले किसी दुकान पर चादर देख लूं। फिर सामान के साथ देखी नहीं जाएगी.." उसने सोचा। बाम्बे डाइंग की दुकान पर वह ठिठकती है। "यहाँ तो सब बड़ा महंगा होगा...2000 रुपये से कम नहीं...इतने में दो चादर खरीद लूंगी.." ,श्रद्धा सोचते हुए आगे बढ़ती है। आगे एक दुकान है जिस पर बाहर ही चादरें लटकी हुई है, यह दुकान बाॅम्बे डाइंग से थोड़ा कम स्टैण्डर्ड है। वह बाहर टंगी चादरों को देखती है। तभी अन्दर से नौकर निकलकर उसे अन्दर आने का आग्रह करता है। श्रद्धा अभी पूरी तरह तय नहीं कर पाई है कि उसे आज 700-800 रुपये चादर पर खर्च करने चाहिए कि नहीं...। फिर भी इज़्ज़त का सवाल है, वह सिर हिलाते हुए दुकान में घुसती है। दुकानदार उसे चादर पर चादर दिखा रहा है, वह हर चादर पर कुछ न कुछ अन्य मांग कर रही है। अब तक 20-25 चादर दिखाई जा चुकी हैं। श्रद्धा सिर पर दबाव महसूस कर रही है। वह किसी तरह वहाँ से भागना चाहती है। दुकानदार बोहनी का उलाहना दे रहा है..। वह अन्ततः दाम आधा करके एक चादर को पसन्द करती है। चादर 700 रुपये की थी, वह 400 रुपये में देने को कहती है...दुकानदार अत्यन्त आत्मविश्वास के साथ फटाफट 500 रुपये की बात तय करके चादर पैक करने लगता है...श्रद्धा रोक नहीं पाती। वह खुद को कोस रही है, क्यों सुबह -सुबह बिना बात चादर देखने लगी..ऐसी कोई खास ज़रूरत भी नहीं थी...और न ही चादर कोई खास सुन्दर है...। फिर भी वह चेहरे पर भाव लाए बिना जल्दी-जल्दी कीमत चुकाकर बाहर भागती है। दुकान से बाहर आकर वह थोड़ी तनाव मुक्त हो गई है। "बिछकर सुन्दर लगेगी...फिर चादर का क्या है.. जितनी भी हों काम आ ही जाती हैं...," वह स्वयं को दिलासा देती है। श्रद्धा मन ही मन तय करती है कि अब वह सीधा सुपर मार्केट से ज़रूरी सामान खरीदेगी और कोई फ़िजूल खर्चा नहीं...। वह जल्दी-जल्दी दालें, चावल, चाय पत्ती, बिस्किट्स आदि सामान खरीदती है..। एक बज चुका है। दो बजे बच्चे आ जाएंगे। सुपर मार्केट से निकलते ही टिक्की की खुशबू उसकी नाक से टकराती है...। भूख बड़ी तेज़ लगी है। भूख तो है, पर एक तो पाँच सौ रूपये फालतू में खर्च हो चुके हैं, दूसरा समय भी एक बजकर 15 मिनट होने जा रहा है (यद्यपि अभी एक बजकर 5 मिनट हुई हैं) श्रद्धा सोच रही है कि खाऊं कि नहीं...। "यदि भीड़ हुई तो कैंसिल वरना जल्दी से खाकर निकल जाऊंगी", वह तय करती है। मन ही मन वह सोच रही है कि काश भीड़ हो और उसे बिना खाए ही निकलने का मौका मिल जाए। सुबह की 500 रुपये उसे कचोट रहे हैं । दोपहर का समय है। इक्का-दुक्का ग्राहक हैं। अभी टिक्की तवे पर डाली ही गयी हैं। " टिक्की में कितना टाइम लगेगा भैया?" श्रद्धा ने भोला बनते हुए पूछा। "15 मिनट कम से कम" जवाब मिला। श्रद्धा के सिर से बोझ उतर गया। वह वहाँ से तेज़ी से भागी। मन ही मन वह खुद को दिलासा दे रही है, "15 मिनट तो सिकेंगी,फिर वह प्लेट लगाएगा...गर्म-गर्म टिक्की खाने मे भी टाइम लगेगा...इतना टाइम कहाँ है....।" बाहर आकर रिक्शा वाले से श्रद्धा पूछती है, "भैया वसुन्धरा सैक्टर-3 चलोगे?" रिक्शा वाला 25 रुपये मांगता है। श्रद्धा बार-बार कहती है कि वह अभी वहाँ से 15 रुपये में आई है। लेकिन कोई भी रिक्शा वाला 25 रुपये से कम में तैयार नहीं होता। 15 रुपये की दूरी के लिए श्रद्धा को 25 रुपये देना गवारा नहीं। वह सोचती है, "सामान है ही कितना...5 किलो. भी नहीं होगा। चावल और दालें तो वह पैक करा आई है, श्रेयस् शाम को सुपर मार्केट से गाड़ी में रख लाएंगे...। यह दूध-ब्रेड, अण्डा, फल, सब्ज़ी तो 5 किलो. से कम ही हैं, पैदल ही निकल लेती हूं।  दोपहर का डेढ़ बजा है। श्रद्धा सामान का थैला लटकाए पैदल जा रही है...। चाल में तेज़ी है..बच्चे आते ही होंगे....सुबह जल्दी में थोड़ा बहुत खाकर जाते हैं...ऐसे में आते ही गर्म खाना तो चाहिए ही...। फ़्रिज़ में आटा रखा है, आलू उबला रखा है, मिंकू दाल नहीं खाता उसके लिए आलू छौंक देगी...थोड़े चावल बनाने होंगे, चिंकी ने सुबह दाल-चावल की फ़रमाईश की थी..। ढेरों काम श्रद्धा के दिमाग मे चल रहे हैं। चादर उसके दिमाग से निकल चुकी है। वह खुश है, उसने दोनों ओर से रिक्शा और टिक्की के रुपये बचा लिए...इतना यदि चादर के मूल्य से घटा दे तो चादर भी महंगी नहीं...श्रद्धा अब हल्का महसूस कर रही है।


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