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Blackbeauti Archana

Fantasy

4  

Blackbeauti Archana

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सब्जिया वाली

सब्जिया वाली

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"हे आज सब्जिया वाली नहीं आई है"
"अरे हाँ ... सच में नहीं आई..."
"कुछ हुआ है क्या...? क्यों नहीं आई वो"
"अरे होगा क्या...? कहीं दूसरा धंधा तो नहीं चालू कर दिया"
"कर दिया होगा तो क्या... उसके भी ग्राहक हम ही बनेंगे"
"और नहीं तो क्या वो जो बेचेगी हम सब खरीदेंगे"

सारे मर्द एक झुण्ड बनाकर मसखरी करके सब्जिया वाली के नाम पर हँस रहे हैं। सब्जिया वाली एक पचास साल की विधवा है। जो मर्दों के बनाए इस समाज में सब्जी बेंचकर अपना पेट पालती है।

चार भाइयों की अकेली बहन थी फूलमती उर्फ फूला। नाम के अनुसार ही एकलौती होने के कारण फूलों की तरह ही पाली गई थी। गरीबी होने के बाद भी जब विवाह होने को हुआ तो माँ बाप भाई को कोई पसंद ही नहीं आता। एकलौती बहन है तो कम से कम ऐसे घर व्याह किया जाय कि ससुराल में भी फूलों की तरह ही ख्याल रखा जाय।

जब दिनेश कुमार से शादी हुई तो सबकी खुशी सातवें आसमान पर थी। दिनेश कुमार के पास सबकुछ था जो फूलमती के लिए उसके माँ बाप भाई चाहते थे। फूला की इच्छा भी इन लोगों से अलग नहीं थी। फूला को पाकर दिनेश कुमार भी कम खुश नहीं हुए। क्योंकि जाते ही उसने घर गृहस्थी सम्भाल ली। सास ससुर और दिनेश कुमार उसकी दुनिया हो गए।

दिन जाते समय नहीं लगा अब फूला तीन बच्चों की माँ बन चुकी थी जिनमें से दो अल्पायु रहे। तीसरा के लिए झाड़फूक सोखा ओझा मान मनौती सब हुआ तब जाकर पवन की जान बची। पवन की जान तो बची लेकिन दिनेश कुमार को न जाने किस बिमारी ने घेर लिया। कितनी दवा हुई। दवाई के लिए खेत पहले रेहन रखाए फिर एक एक करके बिक गए। लेकिन दिनेश कुमार का स्वास्थ्य फिर ना सुधरा। पवन के पाँच साल होते होते दिनेश इस दुनिया और फूलमती से अलविदा ले लिए।

बेटे की मौत से सास ससुर की कमर टूट गई। पवन अभी छोटा है खेत सारे बिक गए और सारी जिममेदारी फूलमती पर आ गई।

फूला को कभी दिनेश ने घर से बाहर कदम नहीं रखने दिया था उसे अब स्थिति ऐसी थी कि खुद कमा कर परिवार पालना था। दूसरी शादी की बात ही नहीं हुई। अगर उसकी जगह पर उसका पति होता तो साल बीतते बीतते दूसरी दुल्हन आ जाती लेकिन वो दूसरी जगह नहीं जा सकती थी क्यों कि पाँच साल का एक बेटा है बूढे़ सास ससुर अब उसके सहारे थे। दुनिया समाज क्या कहता कितनी गालियाँ पड़ती कितनी बदनामी होती.... आह किसी के मन में ख्याल ही नहीं आया। आया भी तो बस इतना कि अगर पवन नहीं होता तो.....।

खेत तो सारे दिनेश कुमार के इलाज के समय ही बिक गए थे इसलिए मजदूरी करने के सिवाय कोई चारा ना बचा फूला के पास। जो चार भाई लाडों पाले थे वो अब अपने अपने पत्नियों के आधीन हो गए... अगर मदद भी करते तो क्या करते उसके घर का खर्च चलाते... कभी नहींं। माँ बाप की अब चलती नहीं थी कि बेटी की मदद कर सकें।

मजदूर वर्ग होने के बावजूद फूलमती कभी मजदूरी नहीं की थी भाई कहते -"हम चार त काफी हैं तोके का जरूरत है मजदूरी करेके"। जो अब मजदूर बनी तो काम होता ही नहीं। कितना भी कोशिश करती। फिर भी सोची ऐसे ही करते करते आदत हो जाएगी। लेकिन हमारे समाज में अकेली औरत होना सबसे बड़ी बाधा है पुरुष वर्ग को लगता है कि अब तो यह सार्वजनिक प्रापर्टी बन गई है। ये तो अब उपलब्ध है। अकेले ज़िन्दगी कैसे काटेगी कोई न कोई जरूर होगा। किसी से बात कर लिया तो चरित्रहीन हो गई कि अरे वो तो फलनवाँ के राखे है। अगर किसी से ना बोले तो अरे बस देखावटी है जानत नाहीं हो घूँघट में साँप बियात है।

तरह तरह की बातें होने लगीं। कुछ लोग जिन्हें वासना ने जकड़ा तो ऑफर भी दे दिए कि हम तोहार खर्चा उठाइब बस हमार कहल मान ला। फूलमती पहले तो घबराई कि अब का करीं। पहले डर से काँपने लगती थी मुँह में घिग्घी बँध जाती थी कोई जवाब नहीं दे पाती। फिर धीरे धीरे वो भी ढीठ होने लगी। जवाब देने लगी। सतीत्व को बचाकर रखा लेकिन बातों में चरित्रहीन होने लगी।

एक दिन अपने नइहर से लौट रही थी तो एक औरत को सब्जी बेचते देखी। वो औरत बड़ी चालाकी से बात कर रही थी। पुरुष समाज घेरे खड़ा था। शब्दों में कटाक्ष लिए सौदा खरीदा जा रहा था। कुछ देर वो खड़ी उसे देखती रही। जब सौदा देखते ही देखते बिक गया तो फूलमती उससे बात करने पहुँची। औरत ने बताया -"का करीं मरद है सराब पियत है बच्चे हैं छोटे हैं सास ससुर देवर जेठानी ने अलगा दिया है तो का करैं। ई मरद जाति ना बहुत कमाल कै होति है शरीर से खेल भले न सकैं लेकिन बातन से खेलि के पूरा मजा ले लेत हैं। ऊ देखा उहाँ... उहाँ भी एक औरत है किसी से बोलती नाहीं शांत चुप चाप बैठी रहति है जो ओकरे पास जात है ओही के सौदा बेचति है अउर देखो अबहीं तक बैठी है। जानत हो बहिन मरद जात कै कमजोरी को अगर आपन ताकत बनावा न त ई दुनिया में औरतन के खातिर कवनों काम मोश्किल नाहीं है। हमहूँ उहै करत हैं जवन ई मरद जात करत है लेकिन बिडम्बना देखा हम आपन समाज में खूबै बदनाम हैं। ... तो का हमार घर त चलत है ना...।"

फूलमती को सब समझ आ गया कि मेहनत मजदूरी करने से अच्छा है कि यही सब्जी ही बेची जाय। लेकिन जो मरद जाति मजदूरी करत मिलत रहैं ऊ इहाँ भी मिलिहैंं।

कुछ पैसे बचाए थे और कुछ नइहर से मिले थे। घर पहुँचते ही सब निकाल कर इकट्ठा की तो सब दो हजार से भी कम थे। इतने ही पैसे हैं अगर सब लगा दिया तो... अगर बेंच ना पाई तो...?

लेकिन आज तो रिस्क लेना ही था। सुबह सुबह घर से निकली सब्जी मण्डी गई वहाँ से जो मुख्य मुख्य सब्जियाँ जैसे आलू प्याज धनिया मिर्चा अदरक और कुछ हरी सब्जियाँ खरीदी। एक तराजू बटखरा खरीदी। राशन की दुकान से बड़ी सी मजबूत बोरी ली जिसे बिछा सके।

जब दुकान सजाने की बारी आई तो कहीं जगह ही नहीं मिल रही थी। जहाँ भी दुकान लगाती कोई ना कोई हटा देता। एक पान मसाला की गोमती थी जहाँ हमेशा भीड़ लगी रहती थी वहाँ बिछाती है बोरी और उस औरत की बातें याद करती है। पान वाले से एक बीरा पान लेकर मुँह में रखती है और एक ही आवाज पर भीड़ लग जाती है। आधे घण्टे के अंदर सारी सब्जी बिक जाती है। और मुनाफा डबल से भी ज्यादा होता है।

अब तो दुकान चल गई फूलमती धीरे धीरे सब्जिया वाली हो गई। दुकान धीरे धीरे बड़ी हो गई। इसी सब्जी से उसने पवन को पढ़ाया घर बनवाया कुछ खेत भी खरीदा जिसमें कुछ सब्जियाँ वो घर पर ही उगाती थी।

समय बदला बेटे की शादी हो गई। अब सब्जिया वाली की पहचान थी वही जो हमेशा पान खाती है और पुरुष ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए साड़ी घुटने से ऊपर रखती है जो ग्राहकों को ऐसे लुभाती है कि सब्जी देखने के बजाय उसकी बातों से प्रभावित होकर सब सब्जी खरीद लेते हैं।

सब्जिया वाली अब पचास के पार हो गई है लेकिन पहचान आज भी वही है। चेहरे पर मुस्कान मुँह में पान। लेकिन अंदर के दर्द को किसे जानना। जिस बेटे के लिए रंड़ापा खेया वह अपनी औरत के आते ही माँ से झगड़ा करने लगा। पत्नी के कहने से माँ से बात चीत करना बंद कर दिया। चूल्हा अलग कर लिया फिर घर भी अलग कर लिया। सास ससुर कबके स्वर्ग सिधार गए। रह गई तो बस अकेले सब्जिया वाली। लेकिन सौदे के समय चेहरे पर सिकन तक नहीं आती।

दस दिन के लगभग हो गए हैं आज कल सब्जिया वाली नहीं दिख रही थी। उसके ग्राहकोंं को जिज्ञासा हुई कि कहीं उसने अपना धन्धा तो नहीं बदल लिया....।


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