STORYMIRROR

Sardip pawara

Fantasy

4.5  

Sardip pawara

Fantasy

मोक्ष 'सपनों की आखिरी उड़ान '

मोक्ष 'सपनों की आखिरी उड़ान '

5 mins
6

मोक्ष 

सपनों की आखिरी उड़ान


एक छोटे से गांव में रहने वाली लड़की, जिसकी दुनिया सतरंगी सपनों से भरी थी और आँखों में आसमान छूने की एक अजीब सी जिद थी। शायद नियति ने जन्म से ही उसके भाग्य में यह सफर लिख दिया था, तभी तो उसके माता-पिता ने बड़े प्यार से उसका नाम 'मोक्षिका' रखा था। विधाता को शायद पहले से पता था कि मरने के बाद भी, इस मासूम को अपने सच्चे मोक्ष के लिए दर-ब-दर भटकना पड़ेगा।


मोक्षिका खुश थी। उसके हाथों में उसकी मेहनत की निशानी, उसकी M.A. की डिग्री थी। वह खुशी-खुशी अपने घर लौटी, लेकिन घर का नज़ारा कुछ और ही था। उसकी माँ ज़मीन पर बैठी फूट-फूट कर रो रही थी, और उसके पापा कोने में सिर झुकाए खामोश बैठे अपने आँसू छिपाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे।


"माँ, आप रो क्यों रही हो? देखो, मैं M.A. की डिग्री लेकर हॉस्टल से घर आ गई हूँ! पापा आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे?" मोक्षिका ने उलझन में पूछा। 


पापा रूंधे हुए गले से पास आए और बोले, "पापा यहीं हैं मेरी बच्ची... पर तू इतनी जल्दी हमारा हाथ छोड़कर कैसे जा सकती है?" 


तभी माँ ने उसे रोते हुए अपनी बाहों में भर लिया, "मेरी बच्ची! तेरा बहुत बड़ा एक्सीडेंट हुआ था। तू मर चुकी है... ये बस तेरी आत्मा है, जो अपने प्यार के लिए यहाँ भटक रही है।"


यह सुनते ही मोक्षिका के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। आसमान छूने वाले उसके सारे सपने पल भर में कांच की तरह टूट कर बिखर गए। वह पीछे हटी, "नहीं... ऐसा नहीं हो सकता! मेरी ज़िंदगी, मेरे सपने... सब खत्म?" वह फूट-फूट कर रोने लगी। 


तभी अचानक आसमान में ज़ोर से बिजली कड़की। एक भारी और डरावनी आवाज़ गूंजी, "बालिके! तुम्हारा समय खत्म हो गया है... अब चलो!" अगले ही पल कमरे में अंधेरा छा गया और मोक्षिका हमेशा के लिए वहाँ से गायब हो गई।



जब मोक्षिका ने अपनी आँखें खोलीं, तो वह एक अजीब सी चमचमाती जगह पर थी। सामने एक बड़ा सा डेस्क था जिस पर लिखा था— 'यमलोक स्वागत कक्ष'। वहाँ चित्रगुप्त बैठे थे, जो अपने बार-बार हैंग होते हुए लैपटॉप पर तेज़ी से कुछ टाइप कर रहे थे और खासे चिढ़े हुए लग रहे थे।


मोक्षिका ने डरते हुए अपनी डिग्री सीने से लगा ली और सुबकते हुए बोली, "मुझे कहाँ ले आए? मुझे मेरी माँ के पास जाना है!" 


चित्रगुप्त ने अपना चश्मा ठीक किया और बिना उसकी तरफ देखे बोले, "हे देवी! कृपया शांत हो जाइए। आपके आँसू सीधे मेरे कीबोर्ड पर गिर रहे हैं, जिससे सिस्टम शॉर्ट-सर्किट हो सकता है। और वैसे भी, अब 'नो रिटर्न पॉलिसी' लागू हो चुकी है। चुपचाप वहाँ लगी मशीन से अपना टोकन नंबर ले लीजिए। आपका नंबर 402 है। जब तक नंबर न आए, प्रतीक्षालय (Waiting Area) में बैठें।"


हैरान-परेशान मोक्षिका रोते हुए वेटिंग एरिया में पहुँची। वहाँ उसकी ही उम्र की कुछ लड़कियां मज़े से गपशप कर रही थीं। 


"अरे नई लड़की! तू रो क्यों रही है यार?" एक लड़की ने पूछा। 


मोक्षिका ने हैरानी से कहा, "मैं मर गई हूँ! मेरे सपने टूट गए, और तुम लोग यहाँ आराम से बैठी हो? तुम्हें डर नहीं लग रहा?" 


दूसरी लड़की ज़ोर से हंसी, "डर कैसा? धरती पर भी तो हॉस्टल में ही रहते थे, बस समझ ले ये यमलोक का 'गर्ल्स हॉस्टल' है। हम हॉस्टल वाली लड़कियां हैं, हम कहीं भी 'adjust' हो जाते हैं। बस यहाँ का वाई-फाई थोड़ा स्लो है!" यह सुनकर मोक्षिका के आंसू अचानक रुक गए और वह अचरज से उन्हें देखने लगी।



तभी पीछे से एक भारी संगीत बजा। एक बड़ा सा दरवाज़ा खुला और काले चश्मे में यमराज की एंट्री हुई। उनका अंदाज़ किसी कॉर्पोरेट बॉस जैसा था। आते ही उन्होंने चश्मा नीचे खिसकाते हुए कहा, "Hey guys! How are you all? चित्रगुप्त, आज का टारगेट पूरा हुआ या नहीं?"


मोक्षिका गुस्से और दुख से आगे बढ़ी, "आप यमराज हैं? मैंने कोई पाप नहीं किया, फिर मुझे इतनी जल्दी क्यों मार दिया? मुझे आसमान छूना था!"


यमराज अचानक शांत और गंभीर हो गए। उन्होंने मोक्षिका की तरफ देखा और बोले, "पुत्री शांत हो जाओ। तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हारा नाम 'मोक्षिका' बिल्कुल सही रखा था। आसमान छूने के लिए सिर्फ डिग्री की नहीं, हौसले की ज़रूरत होती है। असली 'मोक्ष' तो तब है, जब तुम्हारे अपनों की आँखों के आँसू हमेशा के लिए थम जाएँ।"


"तो मैं क्या करूँ? मेरी माँ मेरे लिए तड़प रही है," मोक्षिका ने बेबसी से कहा।


"मैं तुम्हें एक विशेष वरदान देता हूँ। तुम आज रात अपने माता-पिता के सपनों में जा सकती हो। उन्हें वो आखिरी विदाई दे सकती हो, जिसके लिए तुम्हारी आत्मा तड़प रही है।"




उसी रात, मोक्षिका एक सुनहरी रौशनी के रूप में अपने घर पहुँची। उसके माता-पिता गहरी नींद में सो रहे थे। वह मुस्कुराते हुए उनके सपनों में गई।


"माँ! पापा! देखिए मैं आ गई। मैं बिल्कुल ठीक हूँ," मोक्षिका ने चहकते हुए कहा।


सपने में ही उसकी माँ के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान आ गई, "मेरी बच्ची... तू खुश तो है ना?"


"हाँ माँ! मुझे यहाँ नई दोस्त मिल गई हैं। और पता है, यहाँ के महाराज (यमराज) भी बिल्कुल 'cool' हैं! आप मेरे लिए रोना बंद कर दीजिए माँ... और पापा, आप भी मत रोइए, क्योंकि जब आप दोनों रोते हैं, तो मेरे पंख भीग जाते हैं और मैं आसमान नहीं छू पाती।"


पापा ने सपने में ही गर्व से मुस्कुराते हुए कहा, "तू तो हमेशा से हमारी बहादुर बच्ची रही है! हम नहीं रोएंगे बेटा... जा, खुले आसमान में उड़ जा। हमारा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।"


माता-पिता ने उसे आंसुओं और मुस्कान के साथ विदा किया। 


अगली सुबह जब मोक्षिका के माता-पिता सोकर उठे, तो उनके चेहरों पर बरसों की पीड़ा नहीं, बल्कि एक अजीब सी शांति थी। वहीं दूसरी ओर, यमलोक में मोक्षिका ने पलटी मारकर यमराज, चित्रगुप्त और अपनी नई हॉस्टल वाली सहेलियों को हाथ हिलाकर 'बाय' कहा, और एक चमकते हुए सुनहरे प्रकाश की ओर बढ़ गई। 


अंततः, मोक्षिका ने अप

ने सपनों की आखिरी उड़ान भर ली थी... अपने सच्चे मोक्ष की ओर।


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Fantasy