मोची
मोची
वह चौराहे के कोने पर एक छतरी लगाकर बैठता था ।आंखों पर चश्मा, कमर झुकी बालों में सफेदी ।उस चौराहे के अंदर की तरफ जो सड़क जा रही थी वहाँ एक बड़ा सा पार्क था, जहाँ शाम होते रौनक आ जाती थी ।कई बुजुर्ग शाम में टहलने और अपने मित्रों से मिलने आते थे।बच्चों की टोली रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे अपने दोस्तों के साथ खेलते थे। मैं भी शाम में उस पार्क में जाया करती थी।
जो भी उस चौराहे से गुजरता था वो बूढी आंखें बड़ी उत्सुकता से उनकी तरफ देखती थी ।उन्हें देख मुझे हमेशा ख्याल आता कि इस छोटे से काम से इनका गुजारा कैसे चलता होगा और फिर आजकल तो लोग पुराने चप्पल जूते टूटते ही नए खरीद लेते हैं। अब वह समय कहाँ रहा जब पुराने चप्पलों और जूतों की मरम्मद करवा कर पहना जाता था। अक्सर देखती थी कि वह खाली ही बैठा रहता ।बहुत कम काम रहते उसके पास। इंतजार में टकटकी लगाये उसकी वो आँखों की जोड़ी मानो उस दिन मेरे चेहरे पर चिपक गई थी ।घर आकर बार-बार उसी का ख्याल आ रहा था। मैंने अपने घर के जूते चप्पलों को खंगालना शुरू किया पर सब ठीक-ठाक ही लग रहे थे ।अब क्या मरम्मत करवाऊं उससे। यह सोच मैंने अपने बेटे रवि को आवाज लगाई। उसके आते ही मैंने पूछा- "तुम्हारे पुराने कोई जूते चप्पल हैं ,जिन्हें मरम्मत करवा कर फिर नए बनाए जा सकते हैं "।
उसने हँसते हुए कहा -"क्या माँ ,आज कैसी उटपटांग बातें पूछ रही हो,अब कोई जूते कहाँ मरम्मद करवाता है ।आपने देखा नहीं बाजार में जूते चप्पलों की सेल लगी रहती है। एक जोड़ी जूते पर एक जोड़ी फ्री दे रहे हैं तो भला पुराने जूतों की मरम्मत क्यों"? मुझे उसके तर्क भी कुछ हद तक सही ही लगे ।सचमुच आजकल बाजार में नित्य नए सेल की वजह से ऐसे लोगों की रोजी-रोटी छीनती जा रही है। मन में चल रहे उथल- पुथल को शांत करने के ख्याल से मैंने अपना पुराना हैंडबैग निकाला। जिसका एक बेल्ट निकल गया था। पति के एक पुराने जूते निकालें जिसे पॉलिश की जरूरत थी। दूसरे दिन मैं इन सामान को ले मोची के पास गई ।मुझे अपनी तरफ आते और हाथ में सामान देख उसकी बुझी बुझी आँखों में चमक सी आ गई। पास जाकर मैंने बैग और जूते देते हुए मरम्मत की बात कही।
उसने खुश होकर कहा- "आप तो रोज ही इस पार्क में आते हो, कल जब आप आएंगे तो आपको यह दोनों सामान तैयार मिलेगा"। दूसरे दिन जब मैं उसके पास गई उसने बड़े प्यार से दोनों को एक पैकेट में रख मुझे दिया। मैंने पूछा- "कितने पैसे हुए"?
"पंद्रह रुपये "-कहते हुए वह झेंप गया मानो ज्यादा पैसे मांग लिए हो ।मैंने उसे पैसे देते हुए सोचा इतनी महंगाई के समय भी इसने कितने कम पैसे लिए।
मैंने पूछा- "इतने कम पैसों से आपका गुजारा कैसे होता है" ?
उन्होंने कहा -"बेटी, यह काम तो मेरा पुश्तैनी है ।मेरे बाबूजी और उनके बाबूजी सदियों से यही काम करते आए हैं ।अब इस उम्र में और कोई काम तो कर नही सकता और फिर सदियों से चली आ रही इस परंपरा को किसी को आगे चलाना भी तो है। हाँ, मेरा बेटा इस काम को करने को तैयार नहीं है। वह तो नौकरी करता है और अपने परिवार के साथ अलग रहता है। मैं और मेरी पत्नी का गुजारा इस काम से चल जाता है। पूरी जिंदगी तो गुजर गई अब यह जो थोड़ी बहुत बची है मालिक ने चाहा तो ऐसे ही गुजर जाएगी।
उनकी बातें सुन उनके प्रति मन श्रद्धा से भर गयाऔर मैं सोचने लगी हर दिन एक नए ग्राहक की तलाश या यूं कहूं तो इंतजार के साथ ही उसकी सुबह की शुरुआत होती है।
