Pushpa Joshi

Inspirational


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मन का सूना कोना

मन का सूना कोना

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नीरजा की नजर, बार-बार उसके सामने बैठे वृद्ध पर जाकर, ठहर जाती थी, जो अपने बैग में कुछ तलाश रहे थे। उन वृद्ध की आँखों में, उनके मस्तक की लकीरों में, उनकी भाव भंगिमा में, नीरजा ने कुछ ऐसा देखा कि नज़रें, वहाँ से हटने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसके हाथ में एक पुस्तक थी, जिसे वह पढ़ना चाह रही थी, मगर मन उन वृद्ध के बारे में ,सबकुछ जानने के लिये लालायित था। ये कौन हैं? कहाँ जा रहे हैं? इनके दिल में क्या चल रहा है? ऐसे अनेक प्रश्न उसके दिमाग में चल रहे थे, और उनके संभावित उत्तर भी। नीरजा ने कुछ पल के लिये, आँखें बन्द की, ट्रेन की सीटी बजी, और ट्रेन धीमी रफ्तार से, आगे बढ़ने लगी।

नीरजा एक लेखिका थी, जो भोपाल से मुम्बई १st AC कोच में सफर कर रही थी। उसने देखा, उन वृद्ध ने उस बैग से कुछ तस्वीरें निकाली, उन्हें ध्यान से देखा, कुछ मुस्कुराये,...फिर, कुछ दर्द की रेखाएँ उनके चेहरे पर नजर आई। उसमें से, एक तस्वीर को उन्होंने ध्यान से देखा। कुछ सहलाने केअन्दाज से, उस पर हाथ फेरा, और फिर चश्मा ठीक करके, बड़ी तल्लीनता के साथ, अपने मोबाइल से उसका फोटो खींचा, फिर उसे वाट्सएप्प पर भेज दिया।

नीरजा ध्यान से सब देख रही थी।...फिर उन्होंने बड़े इत्मिनान से, उस फोटो को सहेज कर, बैग में रखा। मोबाइल को उसके कवर में रखा। चश्मा उतारकर, आँखें पोछी। शायद आँखों की कोरों में, अश्रु की बूंदे आ गई थी, जिसे वे सबसे छुपाना चाहते थे। मगर, नीरजा की नज़रों में, वे बूंदे प्रश्नचिन्ह बनकर अटक गई थी।

तभी चाय वाला आ गया। वृद्ध ने चाय ली, नीरजा से भी पूछा -'बेटी! चाय पीओगी ?' नीरजा मना नहीं कर सकी, सहमति में सिर हिला दिया। वृद्ध के चेहरे पर, खुशी नजर आई। दोनों ने साथ में चाय पी। वृद्ध ने पूछा - 'बेटी ! क्या करती हो ? कहाँ जाना है ? 'नीरजा बोली - 'बाबा मैं एक लेखिका हूँ। मुम्बई में, साहित्यकारों का सम्मेलन है, वहीं जा रही हूँ।'

वृद्ध ने कहा - 'अच्छी बात है।' ....जब बातों का सिलसिला शुरु हुआ, तो नीरजा ने भी, अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिये पूछा - 'बाबा! अपने बारे मैं भी कुछ बताइये ना?'

वे बोले - 'बेटा ! मैं भोपाल के एक कॉलेज में प्रोफेसर था। रिटायर हो गया हूँ। मेरी उम्र ७८ साल है। यहाँ भोपाल में, अपने दोस्त के पोते की शादी में आया था। मेरा एक बेटा है शिवम, जो मुम्बई में एक बहुत बड़ा व्यापारी है। शिवम की माँ उसके बचपन में ही शान्त हो गई। उसकी परवरिश मैंने की है। उसे, सदाचार की शिक्षा दी। उसे कहा कि "बेटा अपने कार्य के प्रति वफादार रहो, एकनिष्ठ रहो।" मेरे बेटे ने मेरी सारी शिक्षा का पालन किया। सफलता की सीढ़ी चढ़ता गया, और आज कई कम्पनियों का मालिक है। आज उसके पास वक्त नहीं है। वह ईमानदार है, और पूर्ण रुप से अपने कार्य के प्रति समर्पित है, उसने शादी नहीं की। मुम्बई में बहुत अच्छा घर है, मेरी सुख-सुविधा का सारा सामान है। अच्छा खाना, पीना, सोना सारी व्यवस्था है। मुझे किसी चीज की कमी नहीं है। मेरा कार्य करने के लिये नौकर-चाकर हैं, मगर.......।'

इस, मगर शब्द में छिपी तरलता को, वृद्ध की वाणी, और आँखों की नमी में, नीरजा ने महसूस किया। उसने वृद्ध की तरफ देखा। .....उन्होंने आगे कहना शुरु किया।

 'मुझे बेटे से कोई शिकायत नहीं है। वह तो वही कर रहा है, जो शिक्षा मैंने उसे दी है। मगर.....इस भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में, व्यस्तता के जंगल में, मेरा बेटा कहीं खो गया है। मैं उसे पाना चाहता हूँ।'

वृद्ध ने खिड़की के बाहर देखा.... कुछ देर, एकटक देखता रहा। नीरजा को लगा उनकी आँखें गहरी होती जा रही है।

फिर.....गर्दन अन्दर की तरफ करते हुए बोले - 'बेटा ! मेरे पास यादों का एक गहरा समुद्र है, उसमें से रोज एक मोती बीनता हूँ, और बेटे के पास भेज देता हूँ। इस उम्मीद में, कि शायद उसे कुछ याद आ जाए ,और वह कुछ पल के लिये ही सही, मेरे पास आ जाए।'

नीरजा, एकटक उनके चेहरे की ओर देख रही थी। वृद्ध भी नीरजा की स्थिति को समझ रहे थे। वे हँसे और बोले - 'यह जो तुम्हारा, जादू का पिटारा है ना, इसके माध्यम से रोज एक फोटो वाट्सएप्प पर भेज देता हूँ। ...हूँ, ना मैं कलाकार ?' यह कहते हुए उन्होंने नीरजा को अपने बेटे की तस्वीर बताई। फिर बोले- 'मुझे मालूम है,....बेटा, मोबाइल तो जरूर देखेगा।'

 नीरजा की समझ में नहीं आ रहा था, कि वह क्या कहे। उसके हाथ वन्दन की मुद्रा में जुड़े, शीष नीचे झुक गया।

किताब तो वह, कब से बन्द कर चुकी थी। उसके दिमाग में तो अब, नये विचारों ने जगह बना ली थी। उसने डायरी और पेन अपने पर्स से निकाले, और लिखना शुरू किया।

" एक पिता के हृदय का नाजुक कोना।" वह लिखती चली गई। पूरा लेख लिखने के बाद नीरजा ने डायरी बन्द की, पेन को सम्हाल कर रखा, और एक लम्बी साँस ली। फिर, कुछ देर खामोश रही।....नीरजा, खिड़की के बाहर देखती रही, और वृद्ध आँखें बन्द किये....शायद कुछ सोचते रहे।

तभी हलचल मची, स्टेशन आ गया था। वृद्ध को लेने, उनका, नौकर आ गया था। उसने नीरजा का सामान भी नीचे उतारा। वृद्ध ने पूछा - 'बेटी! तुम्हें कहाँ छुड़वा दूँ ?' नीरजा बोली - 'नहीं बाबा, मेरे साथ , मेरे कुछ साथी भी हैं, मैं चली जाऊँगी।'

नीरजा ने झुक कर प्रणाम किया। बाबा ने आशिर्वाद दिया। नीरजा, अपने साथियों के साथ होटल आ गई, जहाँ, उनके रूकने की व्यवस्था थी। कुछ विश्राम करने के बाद, सबने भोजन किया और अपने - अपने कमरों में चले गए।

कल होने वाले सम्मेलन के लिए, ...नीरजा बहुत उत्साहित थी। उसे उसकी पुस्तक "रिश्ते" के लिए पारितोषिक मिलने वाला था। सम्मेलन का विषय था - " आर्थिक विकास की दौड़ में मनुष्य की मानसिक, बौद्धिक, और शारीरिक क्षमता और विकास में उसकी भूमिका।" नीरजा ने उसके लिये बहुत तैयारी की थी।

सुबह ९ बजे सभागृह पहुँचना था। नीरजा और उसके साथी समय पर पहुँच गए। और भी कई राज्यों से, कई साहित्यकार आए थे। सभी का आपस में परिचय हुआ। सब अपने - अपने स्थान पर बैठ गए। मंच पर, कई गणमान्य जन विराजमान थे। मुख्य अतिथि के रूप में, प्रसिद्ध व्यापारी शिवम आहूजा को आमंत्रित किया गया। नीरजा ने चौंककर देखा। बड़ी सौम्य मूर्ति, सादा लिबास, ऊँचा कद, गेहुंआ रंग ,चेहरे पर ओज और गांभीर्य दिखाई दे रहा था। अतिथियों के स्वागत के बाद, सरस्वति वंदना से कार्यक्रम का आगाज हुआ। साहित्यकारों ने अपने - अपने विचार रखे। नीरजा का नंबर आया, वह बहुत तैयारी से आई थी, पर सब भूल गई। उसे याद रहा, तो उस लेख का कुछ भाग, जो उसने कल डायरी में लिखा था।

        उसने कहना शुरू किया - 'आज की भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में विकास की दौड़ में, सुख ऐश्वर्य पाने की होड़ में, हम अंधाधुंध भाग रहे हैं। एक मरीचिका है और कंचन मृग की चाह में हम भागे जा रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस दौड़ में हमारे पैरो ने किसी अपने को, रौंद दिया हो, कुचल दिया हो। एक पल ठहर कर देखो, सोचो, विचारों, फिर दौड़ो। सच्चा सुख कहाँ है? .....यह जानो। जिनके लिए, तुम दौड़ रहे हो, उनकी खुशी कहाँ है ? ......उसे, खोजो। ऐसा न हो कि इस दौड़ - धूप में, कुछ ऐसा खो दो, कि बाद में पछताना पड़े।

        ना टी.वी. ,ना कूलर, कार | 

        ना पकवानों, की दरकार।

        ना किमती ,वस्त्रों की चाह।

        मन का निर्मल ,सूना कोना।

        भर सकते हो, केवल तुम।

        कुछ पल अपने ,अपनों के संग।

        भर देते ,जीवन में रंग।

        मन का निर्मल ,सूना कोना

        भरते हैं ,ये लम्हें चंद।'

तालियों की गड़गड़ाहट। नीरजा की अन्तिम पंक्तियों ने, सबके दिल को छुआ।

नीरजा को पारितोषिक मिला। प्रमाण पत्र लेते समय, नीरजा की नज़रें, शिवम की नजरों से मिली.....वह कुछ कहना चाह रही थी, मगर सिर्फ धन्यवाद कहकर अपने स्थान पर बैठ गई।

कार्यक्रम के बाद सबने साथ में भोजन किया। भोजन के साथ, बातें चलती रही, कुछ साहित्य की, आधुनिक तकनीक की, राजनीति की।

नीरजा ने अवसर निकालकर, शिवम से पूछ ही लिया 'सर ! आप, इतने व्यस्त रहते हैं। आप वाट्स‌एप्प देखते हैं या नहीं ?'

शिवम को प्रश्न अटपटा सा लगा। फिर भी, मुस्कुराते हुए बोले - 'देखता तो हूँ, अभी कुछ दिनों से, व्यस्तता के कारण नहीं देख पाया।' उन्होंने नीरजा की तरफ कुछ.....इस तरह देखा ,मानो कुछ पूछना चाह रहें हो।

नीरजा ने कहा - 'सर, माफ करना। मगर, आज देखियेगा जरूर।'

जब सब लोग भोजन कर चुके, नीरजा ने, चुपके से शिवम की ओर देखा, वे मोबाइल में व्यस्त थे। तभी शिवम के पी. ए. ने आकर कहा - 'सर ! मिटिंग का समय हो गया है, चलें ?

शिवम ने पूरे विश्वास से कहा - 'नहीं।...आज सारे प्रोग्राम, रद्द कर दो। आज मुझे घर जाना है, अपने बाबा के पास।'

उसने, नीरजा को देखा, एक पल ठहरा..., नीरजा को धन्यवाद दिया, और अपनी गाड़ी में बैठकर घर की ओर चल दिया।

नीरजा को भी, भोपाल लौटना था, वह जाने की तैयारी कर रही थी। उसका मन इस कल्पना से ही प्रफुल्लित था, कि आज भर जाएगा। बाबा के 'मन का सूना कोना।'



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