STORYMIRROR

Avinash Jha

Inspirational

4.5  

Avinash Jha

Inspirational

मिट्टी में साँस लेता स्त्री विमर्श

मिट्टी में साँस लेता स्त्री विमर्श

3 mins
45

पूर्णिया प्रांत की लाल-भूरी मिट्टी पर उतरते ही अनन्या के मन में एक अजीब-सा भाव उमड़ा; जैसे वह किसी परिचित जगह पर आई हो, पर पहचान खो चुकी हो। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्त्री विमर्श पर पीएचडी कर रही अनन्या बिहार मूल की थी, लेकिन गाँव अब उसके लिए स्मृति से ज़्यादा कुछ नहीं था। किताबों और सिद्धांतों के बीच रहते हुए उसने गाँव को एक संरचना की तरह समझा था— पिछड़ा, पितृसत्तात्मक, और स्त्रियों के लिए दमनकारी।

रिसर्च के लिए जब उसने पूर्णिया के एक गाँव ’मधुबनी टोला’ को चुना, तो भीतर कहीं यह धारणा पहले से तैयार थी कि यहाँ की स्त्रियाँ अपने अधिकारों से अनजान होंगी, और उसका काम उन्हें “आवाज़” देना होगा।

गाँव पहुँचते ही उसकी मुलाकात सरपंच की पत्नी सरस्वती देवी से हुई। सिर पर सधा हुआ पल्लू, पैरों में साधारण चप्पल और आँखों में अजीब-सी स्थिरता; जैसे बहुत कुछ देख लेने के बाद उपजा ठहराव। अनन्या ने औपचारिकता निभाते हुए नोटबुक खोली और सवाल दागे—

“आप लोग पंचायत में कितना बोल पाती हैं?”

“घर के फैसले कौन लेता है?”

सरस्वती देवी ने एक क्षण उसे देखा, फिर मुस्कराईं और कहा, “बिटिया,” “लिखने से पहले देखो भी।” यह उत्तर अनन्या को टालने जैसा लगा। उसे लगा, यही तो समस्या है, औरतें सवालों से बचती हैं।

अगले कुछ दिनों में अनन्या गाँव की अलग-अलग स्त्रियों से मिली। सीता, जो पाँचवीं पास थी, लेकिन स्वयं सहायता समूह की पूरी जिम्मेदारी संभालती थी। रुक्मिणी, जिसने पति की शराब की लत के खिलाफ़ अकेले खड़ा होना चुना था। और फूलमती अम्मा, जिनकी उम्र झुर्रियों में उतर आई थी, लेकिन गाँव के हर घरेलू झगड़े में आख़िरी फ़ैसला उन्हीं का माना जाता था।

अनन्या सब कुछ नोट करती रही— संघर्ष, सीमाएँ, चुप्पियाँ और बहुत कुछ।

एक दिन उसने सीता से सीधे पूछ लिया, “तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हारी ज़िंदगी बहुत सीमित है?”

सीता कुछ पल हँसती रही, जैसे सवाल का मतलब तौल रही हो। फिर बोली, “सीमित किसके लिए? आपके लिए या हमारे लिए? हम खेत भी सँभालते हैं, बच्चों की पढ़ाई भी, पैसे का हिसाब भी। हाँ, किताबों की भाषा नहीं जानते, पर ज़िंदगी की पढ़ाई खूब की है।”

यह जवाब अनन्या की नोटबुक में तो समा गया, लेकिन उसके भीतर कहीं अटक गया। धीरे-धीरे उसे दिखने लगा कि जिन स्त्रियों को वह ‘कमतर’ मान रही थी, वे अपने तरीक़े से प्रतिरोध कर रही थीं। वे नारे नहीं लगाती थीं, पर हालात से समझौता भी नहीं करती थीं। पति की मार के ख़िलाफ़ चुपचाप मायके चले जाना, दहेज की माँग बढ़ने पर बेटी की शादी से इंकार कर देना या पंचायत में एक साथ खड़े होकर बात कहना; ये उनके छोटे, पर निर्णायक आंदोलन थे।

एक शाम सरस्वती देवी ने उससे कहा, “बिटिया, तुम शहर में पढ़ी हो, हमें सिखाने आई हो, पर याद रखना, हर औरत की लड़ाई एक-सी नहीं होती। तुम्हारी किताबों में जो लिखा है, वह हमारी ज़िंदगी का बस एक हिस्सा है, पूरा सच नहीं।”

उस रात अनन्या देर तक सो नहीं पाई। उसकी नोटबुक के पन्ने भरे थे, लेकिन मन में जैसे कुछ टूट रहा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि स्त्री विमर्श केवल विश्वविद्यालयों, सेमिनारों और भाषणों तक सीमित नहीं है। वह तो यहाँ इस मिट्टी में साँस ले रहा है; बिना बड़े शब्दों के, बिना घोषणाओं के।

पूर्णिया से लौटते समय अनन्या के भीतर एक नई विनम्रता थी। अब गाँव की स्त्रियाँ उसके लिए रिसर्च का ‘डेटा’ नहीं रहीं, बल्कि वे स्त्रियाँ बन गई थीं, जिनसे उसने चुपचाप बहुत कुछ सीखा था।

उसकी आँखें खुल चुकी थीं और वह समझ चुकी थीं कि स्त्री विमर्श केवल बोलने की आज़ादी नहीं, बल्कि परिस्थितियों के बीच जीने और अपने लिए रास्ता बनाने की समझ भी है।



Rate this content
Log in

Similar hindi story from Inspirational