मौन वचन
मौन वचन
ना जाने, अचानक से इस दिल को कुछ हुआ है, किसी अनजान इंसान को जानने की कोशिश है हमारी…थोड़ा सा साथ चाहिए बस, नसीब का और उसका।
पहेली बार देखा है उसको आज, मद्धम सी होती हुई बारिश में, ठंडी सी चलती हुई हवा के साथ उसके वो भीगे हुए घुंघराले बाल, किसी काली घटा से कम नहीं थे…
रास्ते में बस यूँ ही नज़र टकरा गयी हमारी, एक मीठी सी मुस्कान थी उसके चेहरे पर… वह देखकर लगा जैसे बरसों से सूखे पड़े इस बंजर रण पर बरसात की पहली बूँद गिरी हो…
थोड़ी सी हिम्मत जुटा कर उससे बात हुई, आवाज़ भी उतनी ही हसीन थी जितनी वो हसीन थी… बस फिर तो क्या था… रात रात भर बातें होने लगी, उस रात के अंधकार में, अपने फ़ोन के प्रकाश को छिपा कर, कोई देख ना ले वो डर से, चद्दर के अंदर छिप कर बातें होती थी… फ़ोन पर बातें बढ़ी, एक दूसरे को थोड़ा थोड़ा पहचानने लगे थे अब…
थोड़े दिन बाद मिलने का समय तय किया, जवान खून है जनाब कब तक सिर्फ़ फ़ोन पर बात करके दिन गुज़ारते? और वो भी उससे, जिसे पहेली नज़र में ही देख कर प्यार हो गया है?
तय किए गए समय पर उसी जगह पर मिले, जहाँ एक दूसरे को पहली बार देखा था…
आज तो उस दिन से भी ज़्यादा खूबसूरत लग रही थी वो, गुलाबी रंग का top, नीले रंग का jeans… बंधे हुए बाल लेकिन उनमें से एक लट जैसे उससे बग़ावत कर चुकी थी, तेज चलती हवा में, लहराती वह लट परेशान कर रही थी उसको, मन किया जैसे उसकी लट को पकड़ कर, उसके बालों की वह clip में डाल दूँ, लेकिन वह लट, जब उसके लाल गालों को छूती थी तो, एक अलग सी मुस्कुराहट आती थी उसके चेहरे पर, वह पल में खोना नहीं चाहता था… मिले, बात हुई, मुलाक़ातें बढ़ी… एक दूसरे को थोड़ा सा ज़्यादा पसंद करने लगे…
एक दिन उसने सामने से मिलने के लिए कहा, मना करने की तो बात ही नहीं थी… हम मिले, इधर उधर की बात हुई, लेकिन उसका मन कुछ और कहना चाहता था, और होंठ कुछ और कह रहे थे… जैसे उसके शब्द ख़त्म होने लगे, मैंने मौक़ा देख कर, उसका हाथ थाम लिया… कुछ भी बोल नहीं पायी इसके बाद वह, ना मैं बोल पाया… आँखों ही आँखों में जैसे बातें हो गयी… कुछ पल की चुप्पी के बाद जब उसके पलकें, शर्माती हुई मुस्कान के साथ नीचे हुई… उस वक्त मैं ज़्यादा कुछ नहीं बस इतना बोल पाता की
'कभी कभी, शब्दों की भाषा समझने में तकलीफ़ होती है, लेकिन यह तो प्यार है, प्यार की तो मुख्य भाषा ही मौन है।'
बस… फिर क्या… ऐसे ही कुछ महीने निकल गए, दोनों ख़ुश थे… मिलते थे, खिलते थे, महकते थे… मुझे आज भी याद है, जब हम ढलती शाम के वक्त पिघलते हुए सूरज के सामने हाथ पकड़ कर बैठे थे, उसने मेरे कंधे पर अपना सर रखा, आँखें उसकी बहते हुए पानीपर टिकी हुई थी, और वो बोली…
"आज तक मैंने बहुत लोगों से, हाथ मिलाया है, बहुत से दोस्तों ने मेरा हाथ पकड़ा है… लेकिन जब मेरा हाथ तुम्हारे हाथ में होता है तो एक अलग ही अहसास होता है, पता है क्यूँ?"
"-नहीं"
"क्यूँ की जब तुम मेरा हाथ अपने हाथ में लेते हो, तो उसमें प्यार छलकता है, हाथ पकड़ने और हाथ थामने में फ़र्क़ होता है… अगर modern language में कहे तो इसको data transfer भी कह सकते हैं"
"कैसे"
"जैसे लोग usb से data transfer करते हैं, तुम मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर प्यार transfer करते रहना"
इतना सुनने के बाद मुझे नहीं पता कोई लड़का कुछ भी बोल सकता है या नहीं लेकिन मैं कुछ भी नहीं बोल पाया और उस पिघलते हुए सूरज को देखता रहा… इतना बोल ने बाद उसकी आँखें थोड़ी नम सी हो गयी थी… उसकी आँखों की नमी बर्दाश्त होती नहीं है मुझसे… तो इस वातावरण को थोड़ा सा हल्का करने के लिए मैंने उससे कहा की…
"देखो, अपनी आँखों से कहो की बातें करना बंध कर दो… या तो चश्मा पहन कर रखा करो तुम…"
-क्यूँ?
शायद मेरी कमजोरी पता चल गयी है तुम्हारी आँखों को, या तुम्हें… क्या मतलब? कुछ नहीं… बस अपनी इन आँखों से कह दो की इनकी यह नमी मुझे मंजूर नहीं है… तो इस नमी को सम्भाल कर रखा करो उस एक दिन के लिए…
इतना सुन कर उसके चेहरे की वो लाली, उस पिघलते सूरज से फैलते आकाश के रंगो से भी ज़्यादा खूबसूरत थी…
फिर, ज़िंदगी उसी बहते हुए पानी की तरह आगे बढ़ती रही…
दोनों खुद के कामों में व्यस्त हो गए… मिलना कम होने लगा, बातें कम होने लगी, लेकिन प्यार वैसे का वैसा ही था…
पर सम्बंध सिर्फ़ प्यार से नहीं चलता ना… शब्द किसी भी सम्बंध में एक पुल का काम करते है… शब्द ही तो है जो सम्बंध को जोड़े रखते है… वही ना रहे तो सम्बंध में तकलीफ़ आती है… थोड़ी सी तकलीफ़ आयी… आँखों में नमी दोनों के रही… बातें बंध हुई, धड़कन रूक सी गयी… एक लम्बा विरह… और इस विरह के बाद का मिलन, काले बादलों को चिर कर आते हुए इंद्रधनुष जैसा था, हम दोनों के लिए… मिलते ही गले से लगा लिया था,
और वो गले लगाना, एक मौन वचन था की, किसी भी परिस्थिति में, किसी भी मुश्किल की घड़ी में या ख़ुशी के पल में, एक दूसरे ka साथ कभी नहीं छोड़ेंगे… लड़ेंगे, मीठा सा झगड़ा भी करेंगे… लेकिन लेकिन अपने स्वार्थ के लिए सम्बंध का गला नहीं घोटेंगे… सप्तपदी के सात वचन ना निभा सके तो भी सह लेंगे, बस मतभेद में मन भेद नहीं आने देंगे…
और यही किए गए मौन वचनों ने हमारे सम्बंध को और भी ज़्यादा मजबूत बना दिया…

