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Mamta Sharma

Inspirational

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Mamta Sharma

Inspirational

लड़ाई

लड़ाई

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ऐसा नहीं था कि उसे यह मालूम नहीं था कि लड़ाइयां सड़क पर नहीं लड़ी जाती। ऐसा भी नहीं था कि वह किसी ख़ुशफ़हमी में था कि हर बार जब वह ऐसा कुछ करता है और आख़िरी बात या आख़िरी लफ्ज़ उसका होता है तो यह उसकी जीत होती है। दरअसल वह जो करता था उसे वह लड़ाई मानता ही नहीं था वह तो बस आदत से लाचार था; हर बार वह सोचता कि इस बार बिना बोले सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने काम पर ध्यान देकर वापस लौट आएगा, लेकिन हर बार वह कुछ ना कुछ कर ही आता था। ऐसा भी नहीं था कि इस लड़ाई में उसका साथ कोई देता नहीं था  अक्सर ही ऐसे लोग मिल जाते जो उसकी तरफ खड़े होते हैं। हाँ इतना ज़रूर था एक सवाल पर वह बुझ जाता था कि क्या ऐसे सड़कों पर उपदेश देने से किसी की भी सेहत पर कोई असर पड़ने वाला है।  उसे पता था कि लड़ाइयाँ  तो शासकों द्वारा लड़ी जाती है और जो जनता द्वारा लड़ी जाती हैं वे भी किसी दिन शासन के किसी पायदान पर जाकर विलीन हो जाया करती हैं।मगर यह सब कहने की बातें हैं जब वह रौ में होता तो ख़ुद को किसी बादशाह और वज़ीर से कम न समझता।

‘सुनिए -- वैसे तो ज़िंदगी सब अपने अपने ख़्याल से जीते हैं लेकिन फिर भी मेरे ख़्याल से आपको इन सब चीज़ों से दूर रहना चाहिए’ एक दिन अमला ने उससे कहा था। अमला का उससे कोई रिश्ता नहीं था वह उसकी कलीग थी। दरअसल उस दिन उसने दफ़्तर आते वक़्त अमला को लिफ्ट दी थी और संयोग ऐसा कि उसी वक़्त रास्ते में रोड रेज की एक घटना हो गयी थी।  दो गाड़ियों के मालिक बुरी तरह आपस में उलझे हुए थे उसने अमला के हाथ में हेलमेट थमाया और एक मिनट रुकने को कहकर दोनों को अलग करने में जुट गया वह क़ामयाब भी हो गया जैसा कि अक्सर वह हो जाया करता था।अमला को लगा कि ये समय की नज़ाकत को न समझ कर सुबह सवेरे दफ़्तर के समय ऐसे मामलों में ख़ुद को आख़िर क्यों उलझा रहा है। अमला को सही मायने में थोड़ी कोफ़्त भी हुई; कुछ पलों के लिए उसके मन में यह भी आया कि शायद वह अमला पर अपना प्रभाव ज़माने के लिए ऐसा कर रहा है। लेकिन फिर भी जब वह लौट कर आया तो अमला ने तारीफ़ की मगर उसे इससे कोई फ़र्क न पड़ा ; ऐसा लगा वह कोई निहायत ही रूटीन सा काम करके लौटा हो जैसे। मज़े की बात यह थी कि उसके बाद का ऑफिस तक का सफ़र, जो कोई पंद्रह मिनटों का था ---उन बातों को करते गुज़रा जो बिलकुल सामान्य थी उनका अभी अभी गुज़री उस घटना से कोई ताल्लुक न था। अमला के लिए  यह नया सा अनुभव था उसने अबतक यही देखा था कि लोग अव्वल तो राह चलते किसी से पंगा न लेते थे और अगर लेते भी तो उसे बड़ी तवज्जो दिया करते। उसके कईं दिनों बाद अमला एक दिन ऑफिस की कैंटीन में उसे आगाह करना न भूली थी। उसने कोई प्रत्युत्तर न दिया और एक निहायत ही गैरमामूली सी बात जवाब में कह दी थी।     

अमला के लिए ये भी एक अनुभव था जिसपर उसने सिर्फ कंधे उचका दिए थे । ऐसा भी न था कि हमेशा सब कुछ आसान हो जाया करता वह कई दफ़े ऐसे वाक्यातों के कारण कुछ अजीबोगरीब हालत में भी पड़ चुका था। मसलन एक दिन वह अपने पड़ोस में बच्चे को होमवर्क कराती माँ के चीख़ने चिल्लाने  की आवाज़ को सहन न कर पाया था। दरअसल वह कोई एक दिन की बात थी भी नहीं थी वह रोज़ रोज़ का क़िस्सा था और एक दिन उसने अपनी डायरी में इसके बाबत कुछ यूँ लिखा --

‘शायद वह बच्चे को पढ़ा लिखा कर बड़ा आदमी बनाना चाहती है इतना बड़ा कि वह आकाश को छू ले या उससे भी आगे जाकर सितारों को छू ले मगर शायद बच्चा ऐसा कुछ नहीं चाहता वह सिर्फ ज़मीन पर रहना चाहता है !!’

जब भी वह शाम के वक़्त दफ़्तर से लौटकर नहाने या वैसा ही कुछ करने की तैयारी कर रहा होता माँ और बच्चे की आवाज़ें आ रही होतीं,जो दरअसल चीख़ें हुआ करती।  कभी बच्चे से पहाड़े तो कभी कवितायें रटने को कहा जाता। वह उसे बताना चाहता कि पहाड़े तो फिर भी रटे जा सकते हैं लेकिन कवितायें सिर्फ कही जाती है और फिर वे धीरे से दिल ओ दिमाग में उतार ली जाती है अगर उन्हें रटा जाए तो वे बदरंग हो जायेंगी !! बहरहाल ऐसा कईं दिनों  तक सुनते रहने के बाद एक दिन उसने बिना कोई फैसला लिए ही जाकर उनका दरवाज़ा खटखटा दिया था--

‘जी कहिये’ उधर से आवाज़ आयी --

‘मुझे नहीं कहना आपको है’

‘मतलब’

‘मतलब साफ़ है आप बच्चे को प्यार से भी होमवर्क करा सकती हैं’

‘मैं समझी नहीं’

‘इसमें नहीं समझने वाली कोई बात नहीं जब आप इत्ती सी बात नहीं समझ सकती तो बच्चे से आप कैसे एक्सपेक्ट करती है कुछ भी समझना’

‘देखिये मैं अपने घर में क्या करती हूँ क्या नहीं इससे आपको परेशान होने की कोई वजह नहीं’

‘ आपको नहीं पता शायद कि बच्चे के अधिकारों में एक अधिकार राइट टू लिव विथ डिग्निटी भी है---’

‘क्या --’

और उसके बाद उसके मुँह पर ही दरवाज़ा बंद हो गया था। 

ऐसे हादसों के बाद वह एक बार यह सोचा करता कि बिना पावर के बातों का शायद कोई वजूद नहीं होता और यह भी कि दुनियाँ नैतिक-अनैतिक मानवीय- अमानवीय नियम- अधिनियम के खांचों में नहीं बल्कि सिर्फ दो ही खांचों में बँटी हुई है पावरफुल और पॉवरलेस!! और उसके पास कोई ऐसा शक्ति नहीं है जिससे वह ऐसी लड़ाइयों या बहस में कैटलिस्ट की भूमिका अदा कर सके; उसे लगा ये लड़ाइयां ऐसे ही लड़ी जाती रहेंगी और हर ऐसी लड़ाई में जो ताक़तवर होगा वही जीतेगा--और फिर जीतने के बाद सब कुछ सही हो जाता है।   

तो फिर उसे क्या करना चाहिए उसे !! लेकिन ये ख़्याल कभी बहुत देर उसके दिमाग में रहे ही नहीं; वे जिस रफ़्तार से आते उसी रफ़्तार से काफ़ूर हो जाते और फिर वह ख़ुद को ऐसी ही किसी जगह दो लोगों के दरम्यान खड़ा हुआ पाता। 

उसे कईं दफे धोखा भी हुआ मसलन एक बार एक फ़ूड वैन के पास शाम के समय एग रोल खाते हुए उसने एक बच्ची को जब हाथ पसारे खड़ा पाया;वैसे पसरे हुए हाथ किसी प्रकार की करुणा नहीं पैदा कर रहे थे और उसे लगा की शायद इसी वजह से वहां खड़ा हर व्यक्ति बड़े इत्मीनान के साथ अपनी अपनी पसंद और ज़रुरत के हिसाब से कुछ न कुछ खा रहा था और अपने अपने तरीके से शाम के मज़े ले रहा था लेकिन उस बच्ची की तरफ ध्यान नहीं दे रहा था । उसे लगा कि ऐसा भी कैसे हो सकता है कि यहां खड़ा हर व्यक्ति इतना तटस्थ  हो --वाकई उस बच्ची के पसरे हुए हाथ इतने आम से लग रहे थे कि वे पसरे होने का अर्थ खो बैठे थे। लोगों की भीड़ में बच्ची लगभग घिरी हुई सी थी और बच्ची का कद भीड़ की कमर जितना था । उसे लगा जैसे उसका वहां लोगों से घिरा होना या फिर हाथ पसारना -- यही मुकम्मल रूटीन है। उसने बच्ची को कुछ दिया नहीं था लेकिन अपने पास बुलाकर उसके घर और परिवार के बारे में पूछना चाहा था कि तभी पलक झपकते दो लड़के बाइक में उसके बिलकुल क़रीब आकर खड़े हो गए थे। उस दिन उसे लगा था की इस दुनियां में हर चीज़ भी पूरी वजह के साथ खड़ी है कोई भी चीज़ बिला वजह नहीं है सड़क पर पड़ा आदमी भी उतना ही हक़ लिए हुए है जितना सड़क पर खड़ा आदमी लिए हुए है कोई भी चीज़ कहीं भी अकारण नहीं है और इसलिए उसे मान लेना चाहिए की हर चीज़ अपनी अपनी जगह फिक्स है कोई भी बिना वजह कहीं नहीं है।

बहरहाल इन मामलों में उसपर अंग्रेजी की कहावत लागू होती ओल्ड हैबिट्स डाय हार्ड !!

पिछले एक हफ्ते से वह    अस्पताल के अपने हवादार कमरे के बेड पर पड़े पड़े बहुत कुछ नहीं सोच रहा था उसकी ज़िंदगी में एक ही बदलाव आया और वह ये कि पिछले एक सप्ताह में अमला हर रोज़ दो घंटे उसके साथ गुज़ार रही थी बाकि लोगों का होना उसे सुकून दे रहा था और अमला का आना उसके भीतर ताज़गी पैदा कर रहा था। यह उसकी ज़िंदगी का एक नया और ताज़गी से भरा अहसास था। हुआ यूँ की पिछले दिनों मतलब संत मेरी अस्पताल में दाखिल होने के एक हफ्ते के पहले वाले दिनों में उसने एक ट्रेन का सफ़र किया और ट्रेन की उस बोगी में जिसमें वह सफ़र कर रहा था, रात को किसी स्टेशन पर लुटेरे चढ़ गए। ऐसा नहीं था कि वह ख़ुद को इतना ताक़तवर समझता था कि लुटेरों से भिड़ जाये, लेकिन इतना कमज़ोर भी नहीं  कि सामने वारदात होती रहे हुए ख़ुद को रोक दे; सो लुटेरे जब तक सामान लुटते रहे तो उसने भी औरों को ही फॉलो किया और चुप रहा ; मगर एक मोड़ पर हालात ऐसे बन गए कि लुटेरे लुटेरे न रहे और आततायी बन गए तो उससे रहा न गया और फिर उसने आदतन न आव देखा न ताव देखा एक को कॉलर से पकड़ कर दबोच लिया वैसे तो उसके बाद वह अकेला नहीं था पूरी बोगी ही जैसे जोश में आ गयी-- मर्द तो मर्द औरतें भी अपना जौहर दिखने लगीं लेकिन इस पहली कोशिश में बचने के लिए उस एक लुटेरे ने जो गोली चलायी तो वह उसके पैर में जा लगी और उसके बाद उसे होश नहीं वह कब और कैसे सेंट मेरी अस्पताल के इस बेड पर आया। उसने आंख खोली तो उसके आसपास  बहुत से लोग थे उसमें अमला को देखकर उसे  अच्छा लगा था अमला से उसकी कोई अलग और ख़ास पहचान जैसी चीज़ भी तो नहीं थी लेकिन उसका होना उसे कुछ अलग सा लगा था और उस दिन के बाद अमला लगतार उसके पास आती ही रही थी। 

‘तुम्हें वीरता पुरस्कार देने की बात चल रही है’ अमला ने बताया तो वह मुस्कुराया।

‘तुम्हें कभी कभार इन बातों से ख़ुश भी होना चाहिए।’

उसने ग़ौर किया कि अमला अब उसे तुम कहने लग गयी थी और उसे लगा ज़िंदगी  में थोड़ा बदलाव आया है बाक़ी सब कुछ उसे सामान्य ही लग रहा था। 


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