कर्ज
कर्ज
मेरा भाई मात्र २ साल का था, मैं दस
साल की होगी जब पिता जी गुजर गए, माँ की उम्र करीब ३५ साल की रही होगी, पिता जी सेना में अफसर थे,असमय ही लकवा मार गया, आर्मी में हृष्ट पृष्ट लोगों की जरूरत होती है सो पेंशन लेकर घर आना पड़ा घर बैठना रास न आया उन्हें, ठीक ९ महीने बाद सब मोह माया छोड़कर चलते बने,एक बार न सोचा जिसे पलकों पर बिठा कर रखा था रानी की तरह, सभी जिम्मेदारियों से हमेश मुक्त रखा, ,सोचा नही एक बार क्या करेगी छोटे छोटे बच्चों के साथ। माँ छुई मुई सी बैठी उनकी देह के पास बैठी उनकी मृत काया को निहारती रही थी रात भर, कभी कभी रो पड़ती बीच में, मानो पत्थर की हो। सब ख़तम हो गया था उसका, सुबह जब पिता जी को ले जा रहे थे तब भी बस उन्हें ले जाते हुए निहारती रही। पिता जी का भरा पूरा परिवार था। दो छोटे भाई, दो बहिने और मेरी दादी। सभी परिवार की जिम्मेदारी एक बड़े भाई होने के नाते जी ने बखूभी निभाई थी, तभी तो सारे एकदम पहुँच गए थे, माँ को सांत्वना दे रहे थे की फ़िक्र न करो आपके भाई साथ हैं।
पेंशन लगने को अभी टाइम था। धीरे धीरे १० दिन बीत गए। सभी की छुट्टियां ख़त्म हो गयी थीं सब जाने को तैयार थे तभी एक पत्र के साथ कोइ घर में दाखिल हुआ माँ को आर्मी कैंटीन में नौकरी के लिए आवेदन देने को कहा गया था। सबसे पहले चाचा जी ने देखा, तो एकदम भड़क गए अब हमारी भाभी नौकरी करेगी, घर में कभी औरतों ने बा हर का काम किया ही नहीं, फिर बाकी सब का भी एकमत ही था।
दादी तो फूट फूट कर रोने ही लगी। कि बेटे को गए अभी दस दिन नही हुए फिर पलट कर माँ बोली तूने ही कहा होगा ये सब करने को, फिर बोली देख बहू, देरसवेर पेंशन हो ही जाएगी। हाँ थोड़े खर्चे काम करने होंगे। माँ को कभी पलट कर जवाब देते सुना नही था, पर उस दिन बोली माँ सहम कर बोली, छोटे छोटे बच्चे हैं इनका तो सोचना ही होगा, पहली बार माँ को बोलता देख सबके रंग ही उड़ गए, दादी तो रोने बैठ गयी। चाचा और चची तो मुहं फुला कर च ले गए। माँ का ये रूप देखकर मुझे तो माँ पर ही गुस्सा आ रहा था कि देखो ये तो सच में पिता के जाते बदल ही गयी।
फिर माँ ने किसी भी हो हल्ले की परवाह किये बिना नौकरी के लिए आवेदन कर ही दिया। सबको नाराज होने का पूरा बहाना ही मिल गया। सबकी माँ से बातचीत बंद हो गयी। बिना कुछ सोचे माँ ने महीने के बाद नौकरी शुरू कर दी। ये माँ का वो बदला रूप था जो मैंने पहली बार देखा, हालाँकि मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा।
पिता जी के होते हुए माँ कभी अकेले घर से बा हर नहीं गयी थी। समझ नहीं आ रहा था की माँ को क्या हो रहा है। धीरे धीरे गाड़ी पटरी पर आने लगी, पेंशन शुरू हो गयी। पहले पहले तो माँ डर कर ही रहती। दसवीं पास थी ऊपर से कभी कुछ किया नहीं था, पर गज़ब की हिम्मत ही थी जो उसने वो सब सीखा जो कभी उसने सोचा भी न था। धीरे धीरे ऑफिस में कंप्यूटर में काम शुरू हुआ।
माँ के ऑफिस में पढ़े लिखे लोग भी उसमे काम करने से कतराते । पर माँ ने उस काम को हाथ में लिया। लोगों ने मज़ाक उड़ाया, माँ डरी नहीं चुप चाप डटी रही एक सिपाही की भांति। फिर क्या था जो लोग उन्हें दया का पात्र समझते थे उनसे स्वतः ही प्रभावित होने लगे,उनसे काम सिखने लगे। माँ में अब आत्मविश्वास आने लगा । दिन में ऑफिस में काम फिर शाम को हमें लेकर बैठ जाती। , किस्मत से लड़ने की ठान ली थी उसने। जो लोग उसे ताने देते थे आज उसके हौसले की दा द देते। मुझे भी अच्छा लगता, सीना चौड़ा करके रहती। दादी भी धीरे धीरे सब समझ रही थी।
मैंने भी ठान ली थी अब माँ को झुकने नहीं दूंगी। उसी की ताकत थी जिससे मैंने अच्छे नम्बरों से इंजीनियरिंग की पढाई की, और भाई को भी पढ़ाया। बीच में जब भी पैसों की कमी हुई माँ ने कपडे सीले। कभी किसी काम को छोटा नहीं समझा। आज हम सर उठा के जीते हैं इस माँ के द म पर। कभी नहीं सोचा माँ ने अपने लिए, बस बच्चों का ही करती रही । आज सोचती हूँ क्या होता गर माँ ने उस रोज हिम्मत न दिखाई होती, गर माँ डर गयी होती, क्या चाचा बुआ हमें इस मुकाम तक पहुंचा पा ते। क्या होता माँ अपना सोचती, वो तो अपना घर दोबारा बसा सकती थी। । क्या क़र्ज़ उतरेगा माँ का कभी इस जन्म में। माँ तो आज भी हमारा ही सोचती है पर कभी कभी महसूस करती हूँ उसका अकेलापन, बेटी हूँ न। क्या अगले जन्म में बनाएगा भगवान उसकी बेटी कि क़र्ज़ उतार पाऊं उसका ?
