ख़ानम बी
ख़ानम बी
ख़ानम बी
यह एक काल्पनिक कहानी है। हर किरदार काल्पनिक है। मेरा मकसद किसी मज़हब को किसी भी तरह से ठेस पहुँचाने का नहीं है।
इसलिए इसे एक कहानी के रूप में ही पढिए।
"यह दर्द बाहर वालों ने नही,अपनों ने ही दिया था। वह ज़ख्म शाय़द समय के साथ -साथ भर जाते पर अपनो के द्वारा दिये गए ये ज़ख्म भरे तो नही,पर हां नासूर बन कर रिसने ज़रूर लग गए थे । यह ज़ख्म पारो के थे। जो उसके अपनो ने दिए थे। "
"खानम बी" (भाग 01 )
आप सभी को मेरा नमस्कार !
आशा करती हूँ यह मेरा एक छोटा सा लिखने का प्रयास है, जो आपको बेहद पसंद आयेगा, हो सकता है इस में बहुत सी गलतियां हों उन को नज़र अन्दाज 🙏 कर माफ कर, अपना प्रोहत्सान खुले दिल से दें।
चलिए बढ़तें हैं इस कहानी की तरफ ।
किसी ने ठीक ही कहा है.........
"कभी कभी ख़्वाबों और हकीकत की छेड़ में ख़्वाब टूट जाया करते हैं
और कभी हकीक़त के रुबरु हो ख़्वाब याद आतें हैं।"
भाग। 1
यही कुछ हुआ था नन्ही पार्वती के साथ। सन १९४७ के बटवारे का समय , भारत और पाकिस्तान का विभाजन। हर तरफ कतलियाम, चीख़ें, भागा दौड़ी तरही हो रहा था हर तरफ हिंदु मुस्लिम जिन्होने एक जुट होकर अंग्रेज़ी हुकूमत का तख्ता पलटा था और महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों को वापिस जाने को मजबूर कर दिया था।बहुत भारी कीमत चुकाने के पश्चात ही आज़ादी पाई थी। अभी खुलकर आज़ाद भारत में सबने मिलकर सांस भी नहीं ली थी कि एक घर में बंटवारे की दीवार खेंच दी गई। हमारा देश बट गया दो भागों में। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान। हर तरफ़ दर्द - नाक किस्से सुनने को मिलते,हर तरफ़ मौत का तांडव देखने को मिलता। हर घर में अजीबोगरीब ख़ौफ़ का आलम था । जहां कभी दिलों में प्रेम बसता था आज वहां एक दूसरे को एक आंख नहीं भा रहे थे। और तो और जहां हर बहू , बेटी को अपनी बहू , बेटी मानने वाले वहशी दरिंदे बन गए। कोई भी लड़की महफूज़ नही थी । जिधर भी देखो आग बरसती नज़र आती। यह था बटवारा।हिन्दू भारत की ओर और मुसलमान पाकिस्तान की तरफ़ बढ़ते दिखाई देने लगे रास्ते में दोनों तरफ़ खून की नदियां बह निकली। ज़ुल्म अपनी हदें पार कर चुका था । अपने अपनों से बिछड़ गए।अनगिनत बच्चे अनाथ, और कितनी औरतों की मांग का सिन्दूर उजड़ गए और अधिकतर ऐसे थे जिनके बस्ते घर उजड़ गए, खेत खलिहान सब मिट्टी हो गए।वो धरती जो कभी सोना उगला करती और जहां कभी पांच नदियां उसे मिल कर सींचा करतीं थीं,वह भी दो भागों में बट गई थी।उस धरती जिस पर पीर पैगम्बर हुए थे, जहां प्रेम गाथाएं गाते थे अब वहां रेत के टीले नज़र आने लगे।
अंग्रेजों ने तो इस देश को तो लूटा ही था, १९४७ के विभाजन ने तो कहर ही ढा दिया था। भाई-भाई का प्यासा हो गया । हरियाली धरती खून से लथपथ हो गई।
यह दर्द बाहर वालों ने नही,अपनों ने ही दिया था। वह ज़ख्म शाय़द समय के साथ -साथ भर जाते पर अपनो के द्वारा दिये गए ये ज़ख्म भरे तो नही,पर हां नासूर बन कर रिसने ज़रूर लग गए थे । यह ज़ख्म पारो के थे। जो उसके अपनो ने दिए थे, पाकिस्तान के छोटे से कस्बे में जन्मी पारो (पार्वती) उस वक्त महज़ पांच साल की थी जब यह बटवारा हुआ था। हर तरफ शोर, दिल चीर देने वाली चीखें , मारो काटो की आवाजें उस छोटी-सी बच्ची के लिए एक डरावने सपने से कम नहीं थी। और मां की छाती से लग सहमी रहती। उस नन्ही सी जान इस आए तूफान को समझ तो नही पा रही थी ,पर मां और बाबूजी की डरी शक्लें देखती तो सहमी सी समझ जाती कि कुछ भयानक हो रहा था और वह भी इस छोटी सी उम्र में ही एक डर के साये में जीने लगी। या यूं कहिए उस डर के साथ समझौता करने लगी थी।
अभी मुश्किल से दो-तीन दिन ही बीते थे कि पारो के पिता ने हालात का जायज़ा लेते हुए राधा पारो की मां से कहा," राधा अब मेरा ख्याल है, वक्त आ गया है कि हमें यहां से सब कुछ छोड़ कर जाना पड़ेगा क्योंकि खतरा बहुत बढ़ गया है "।
राधा भी अपने पति की बात से पूरी तरह से सहमत थी क्यूंकि हालात काबू में नहीं थे ।
राधा ने कहा ,"यही ठीक रहेगा। "
रामदेव पारो के पिता ने सिर को हिलाकर कहा," हम्म, मेरा ख्याल है कि हमें यहां से तड़के पौ फटने से पहले ही निकल जाना चाहिए, सो भाग्यवान सारा ज़रूरत का सामान बांध लेते हैं ताकि आगे जाकर मुश्किल न हो" ।
रामदेव अपने भाई राजवीर के पास गांव जाने को तैयार हुआ ।
राजवीर और उसकी पत्नी शन्नो ,रामदेव के पिता दीनानाथ की पुश्तैनी मकान में रहते थे, जो गांव में था। मरने से पहले पिता दीनानाथ ने दोनों बेटों के नाम लिख दिया था। थोड़ी ज़मीन भी थी, वह भी दीनानाथ ने बेटों के नाम आधी - आधी लिख दी थी।रामदेव क्यूंकि
दूसरे गांव में सरकारी नौकरी पर था , इसलिए राजवीर ही रामदेव की ज़मीन का काम
जिस में रामदेव का आधा हिस्सा था सारा हिसाब किताब वही देखा करता था।
भाई-भाई में प्रेम था, इसलिए सब कुछ अभी तक ठीक चल रहा था इसलिए रामदेव
और राधा ने अपनों के साथ रहना ही ठीक समझा था। यह सोच अगले दिन रामदेव और राधा ने की पूरी तैयारी कर ली थी।पौ फटने में अभी वक्त था। अंधेरे में ही रामदेव ने राधा और पारो के साथ निकलना चाहा कि अचानक ही उसके सामने.............
भाग - 2
अगले दिन
रामदेव और राधा ने की पूरी तैयारी कर ली थी। पौ फटने में अभी वक्त था। अंधेरे में ही रामदेव ने राधा और पारो के साथ निकलना चाहा कि अचानक ही उसके सामने चमचमाती तलवार आई इस से पहले रामदेव अपने को संभाल पाता कि उसकी आंखों के सामने ही वह तलवार खून से लथपथ हो गई और राधा उसके सामने लहुलुहान आ कर गिर गई ।रामदेव पारो को जैसे ही उठाने को आगे बढ़ा वहीं तलवार ने उसके गले पर वार कर दिया।
नन्ही पार्वती सहमी हुई पलंग के पीछे से देख रही थी। उसकी आंखों के सामने ही पिता और मां का खून हो गया था, और वह बेबसी से अपनी फटी आंखों में आंसू लिए आवाज़ भी नहीं निकाल पाई।
सवेरा होते ही आस पड़ोस को पता चला तो उन्होंने राजवीर,पार्वती के चाचा को ख़बर पहुंचाई।
चाचा राजवीर शहर पहुंचा , अपने भाई भाभी का अंतिम संस्कार किया। अपने भाई भाभी और पार्वती से राजवीर जहां बहुत प्रेम करता था वही वह अपनी बीवी शन्नो से भी बहुत डरता भी था। शन्नो गांव की थी और ज़ुबान की भी तेज़ थी। शन्नो के डर के मारे वह पार्वती को अपने साथ ले जाने में हिचक रहा था।उसे हिचकचाते देख सबने मिलकर उस को धिक्कारा तो शर्म के मारे और समाज के डर से पारो को अपने साथ गांव ले आया । रास्ते भर राजवीर सोचता रहा कि शायद शन्नो अपने लड़कों के साथ पार्वती को अपनी बेटी मान कर पाल लेगी तो हमें बेटी और भाईयों को बहन मिल जाएगी। नन्ही पारो नींद में कसमसाई, तो चाचा राजवीर भी अपने ख्वाबों की दुनिया से बाहर आया। राजवीर ने देखा गांव भी आ गया था। गांव पहुंच बस से उतरा .........
खानम बी ( गांव में -3 )
गांव पहुंच बस से उतरा और रिक्शा ले घर की तरफ रवाना हो गया।
चाचा राजवीर पारो को अपने घर गांव, समाज के डर से ले तो आया,पर नसीब की मारी को तो यह भी मालूम न था, कि उसकी चाची उससे बेइन्ताह नफरत करती थी।
चाचा राजवीर ने पारो को जैसे ही शन्नो की गोद में देना चाहा शन्नो ने मुँह दूसरी तरफ करते हुये उस पर तानो की बौछार कर दी, पालना तो दूर की बात थी नन्ही सी जान को देखने से भी इन्कार दिया।
अभी राजवीर कुछ बोलता उससे पहले ही शन्नो जहर उगलते हुए बोली, " मैं अपने बच्चो का लालन- पालन करूँ या इस मनहूस का जो अपने माँ -बाप को ही खा गई है"।
राजवीर ने बीवी के नाराज होने के डर से गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए कहा, "तुम ठीक कहती हो भाग्यवान, हमारे तो दोनो बेटे हैँ और यह ठहरी लडकी जात मुल्क के हालात भी ऐसे हैँ, कहीं जाना पङ गया तो इसका भार कहाँ ढोते फिरेंगे।"
शन्नो तङाक से बोली, " यह तो इसे लाने से पहले सोचा होता, लाने की जररूरत ही क्या थी वहीँ पङा रहने दिया होता"।
"कैसे रहने देता, सब लोगों ने इसे मुझे यह कह कर सौप दिया कि चाचा चाची ही इसका अच्छे से ख्याल रख सकते हैँ। कुछ भी कहो खून का रिश्ता जो है"। समाज के डर से मैं कुछ बोल न सका क्योंकि बात भी सही थी, इसे हम नकार तो नहीं सकते। यह कह राजवीर ने शन्नो की तरफ कनखियो से देखा। इस उम्मीद से कि शायद उसका पारो को लेकर मन पसीज जाये।
"अज्जी खून के रिश्तों को मारो गोली, यहाँ अपनी जान के लाले पङे हैं और अब इस कलमुही को भी पालते फिरें।मैं तो आपको साफ साफ कहे देती हूँ, मुझसे कोई उम्मीद न रखना। मेरे बच्चोँ के ननिहाल से लौटने से पहले ही इसका इन्तिज़ाम कर दो। वर्ना मैं यह घर और आपको हमेशा के लिये मायके चली जाऊंगी"।
राजवीर पहले तो चुप रहा, फिर शन्नो के कान के पास जा कर बुदबुदाया," मैं सारे रास्ते इस बारे सोचता आया हूँ मेरी रानी, वैसे तो मैंने इसे गोद में लेते ही इसका इन्तिज़ाम कर लिया था, पर सोच रहा था कि एक बार तुम से सलाह कर के ही वह कदम उठाऊंगा "।
"हः ऐसा कौन सा कदम उठाना है शन्नो हैरान और परेशान हो तपाक से बोली", राजवीर शन्नो के नजदीक होते हुए उसके कान मे धीरे से कुछ बुदबुदाया, बस फिर क्या था शन्नो के मानो पैरो तले धरती खिसक गई, साथ ही आखों में चमक पर होशियारी से अपने आप को सम्भालते हुए बोली,
" ठीक है, रात को यह करनाऔर बहुत होश्यारी से, किसी को कानो कान खबर न होने पाये"।
शन्नो ने तो इजाज़त दे दी, पर दोनों के दिल न जाने किस अनजाने डर के कारण बहुत तेज गति से धडकने लगे थे। अभी शाम का समय था। अब कोशिश यही थी कि पारो का
मुहल्ले में किसी को पता न चले। रात होने का इन्तिज़ार दोनों मिया बीवी बहुत बेसबरी
से करने लगे। शन्नो के दोनो बेटे अपने ननिहाल गए हुए थे, इसलिए उस तरफ से उन्हें डर न था। आज रात ने भी शायद आने में देर कर रही थी।...
खानम (भाग-4 )
रात का समय
समय के बीतने के साथ साथ शन्नो और राजवीर की धडकने भी तेज होने लगीं। बारह बजे के बाद राजवीर ने सोती हुई पारो को गोद में उठाया और गले लगाया। शन्नो को यह सोच देखा शायद उसका मन मासूम बच्ची को देख बदल जाए, पर नही, शन्नो टस से मस नही हुई।
राजवीर काली चादरओढ, काली रात के साये में पैदल ही पारो की काली तकदीर लिखने उन गुमनाम गलियों में बीवी का चन्द पैसों का लालच, अपने ही खून का सौदा करने
के लिए चल दिया।
जैसे ही खानम बी की बदनाम चौखट आई, अहमद एक पल के लिए ठिठक गया। डर के मारे उसका बदन पसीने से मानो नहा लिया हो। मन को सख्त कर के दरवाजा खटखटया।
" कौन है भाई इस वक्त" अन्दर से आवाज़ आई।
" मै " राजवीर ने डरते हुए धीमी आवाज़ में कहा, आगे उस से कुछ बोला न गया।
दरबान ने छोटी खिङकी के झरोखे में से राजवीर को देखा, फिर दरवाज़े को खोल दिया, अन्दर आने का इशारा कर बैठने को कुर्सी सरकाते हुए पूछा, " किस से मिलना है?"
"खानम बी से "राजवीर की आवाज़ में घबराहट थी।
दरबान राजवीर की गोद में बच्चे को देख एक तिरछी मुस्कान दे समझ गया उसे वहीँ बैठने का बोल शीश महल के अन्दर गया।
शीश महल की महफिल इस समय अपने पूरे यौवन और अपने रंग में रंगी हुई थी।
दरबान ने खानम बी को इशारे से बाहर आने को कहा, खानम बी जब बाहर आईं तो दरबान ने उनके कान में आहिस्ता से कुछ कहा, वह दरबान को देख हल्के से मुस्काई
और गर्दन हिला कुछ कह कर वापिस आ शीश महल में बैठ गई।....
सवेरे के चार बज गए।
राजवीर दूसरे कमरे में बैठा हुआ खानम बी का इन्तिज़ार कर रहा था। और महफिल दरखास्त होने का इन्तिज़ार कर रहा था।इसी बीच न जाने कितनी बार वह झपकी भी ले चुका था।
इन्तिज़ार की घङियां खत्म हुईं। खानम बी थक कर चूर हो चुकीं थी। सोने की तैयारी में थीं कि उसे राजवीर की याद आई औरं उसे बुला भेजा।
गोद में पारो को लिए राजवीर खानम बी के सामने आया और खानम बी को उसने सलाम
किया।
"कौन है जिसे उठा लाये हो? देखो हमें झगड़े वगङे में न डाल देना"।
" नहीं नहीं सरकार अपनो में से है, इसका कोई सगा सम्बन्धी नही है, जो इसका हिसाब मांगेगा आप इस बात से बेफिक्र रहें"।
इसी बीच पारो नींद में कुनमुनाई और आँखे खोल मुस्कुराते हुए खानम बी को देख बङी
मासूमियत से बोल उठी, "अम्मी " खानम बी की नींद उङ गई बच्ची के मुँह से अम्मी ने मालूम नहीं क्या जादू कर दिया, उसे राजवीर से ले अपनी गोद में ले लिया और राजवीर को मुँह मांगी रकम दे एकदम रवाना कर दिया और साथ ही बोली, " अब इधर का रुख कभी न करना नहीं तो तुम्हारे लिए अच्छा न होगा"।
राजवीर के जैसे मन की मुराद पूरी हो गई हो, वह वहाँ से बिना पारो को एक नजर देखे ही उल्टे पांव वहाँ से भाग गया।
खानम बी ने पारो को एक बार अपने सीने से लगाया, और बङे दुलार से कहा, "बेटा एक बार फिर से बोलना अम्मी "।
पारो ने फिर अम्मी दोहराया, खानम बी के अन्दर न जाने कैसे ममता जाग गई और उस नन्ही अबोध बच्ची को कलेजे से लगा रोने लगी।
मुहब्बत एक एसा जज्बा है जिसे मालिक ने इस कायनात को बनाते वक्त जानवर, परिन्दो या वह भले इन्सान सब में एक जैसा ही डाला है।
खानम बी ने अब रोना बन्द किया, भीगी पलकों से बच्ची को फिर निहारा उसके
गले में कुछ ऐसा था जो खानम बी के हाथ से टकराया, यह सोने की चेन में लाकेट था जिस के ऊपर "ऊँ" लिखा था। खानम बी को समझने में देर न लगी कि बच्ची हिन्दू परिवार से सम्बन्ध रखती थी। लाकेट को उतार कर खानम बी ने उसे महफूज़ जगह पर रख दिया।
खानम बी ने बच्ची से फिर सवाल किया, " आपका नाम क्या है?
वह तो आपने हमें बताया ही नहीं "।
टूटी फूटी भाषा में बच्ची बोली," पालो "।
खानम बी को शायद यह नाम भा जाता पर दुनियाँ के डर से बोली
"नहीं,बेटा आज से आपका नाम रूबीना उर्फ रूबी है"। बोल बेटा, "रूबी "। नन्ही पारो ने कई बार अपना नाम खानम बी के पीछे "लूबी "कह कर दोहराया। बस फिर पत्थर दिल खानम बी की आँखें नम हो गईं।..........
खानम बी (भाग -5)
फ्लैश बैक
खानम बीका अपना बचपन तो न जाने कब आया और कब, कहाँ खो गया। खानम बी ने आँख खुलते ही रात की रंगीनियाँही देखीं थीं और जवान होने तक कितनी ही जवानियां भी लुटते और सिसकते ही देखीं थी। ऐसे माहौल में खानम बी पली और बङी हुई थी। एक कोमल मूरत न बन वह पत्थर की मूरत बन कर रह गई थी।
खानम बी की माँ सकीना अपनी जवानी में इसी शीश महल की जान हुआ करती थी और हर जवान मर्द की चाह शीश महल आने और सकीना की एक झलक पाने को तरसता जो
इस बदनाम गलियों का कोहिनूर थी।
लोग तो सकीना बानो के लिए पागल थे पर सकीना बानो एक रईस खानदान के बेटे भानू प्रताप को अन्जाने में ही अपना दिल दे बैठी थी। मुहब्बत अंधी और लाचार होती है सकीना और भानू प्रताप ने भी इस मुहब्बत के चलते न जाने कितने ही वादे कर डाले पर जो शायद पूरे न होने के लिए ही गए थे।
यह कोठे वालियाँ न मालूम कैसा नसीब लिखवा कर आतीं हैँ जो पतंगे की तरह सारी रात जलती है और सुबह होते ही सब खत्म हो जाती हैँ उनके नसीब में शायद घर गृहस्थी का कोई नामों निशान नहीं होता पर हाँ! कहलाती वो " सदा सुहागन हैं।"
सकीना की भी ऐसी थी यह दर्द भरी दास्ताँ जिसकी जिंदगी का एक हिस्सा उसकी अपनी बेटी जब "खानम बी" बन कर आ गई जिसे देख सकीना के मन में डर के साथ साथ कभी जीने के आस बंध गई थी।
खानम बी को बचपन में सब गुङिया कह कर पुकारते और ' शीश महल ' के दिन की रौनक खानम बी (गुड़िया) ही थीं।
खानम बी ( गुड़िया )बङी हुई तो उसे गाना और नाच सिखाना शुरू हो गया। उधर खूबसूरत अंगों का छुपना या छुपाने का कोई रास्ता न मिला। इस राज़ को कभी तो बाहर आना ही था।
शीश महल की नादिया बेगम का राज था। सब नादिया बेगम से डरते थे।
शीश महल की नादिया बेगम ने इस कल की गुड़िया जो अभी अपने कोमल पंख सम्भाल भी न पाई थी, पैसे की लालच में आ उसके पंख ही काट डाले।
शंकर शीशमहल के सामने ही रहता था। बचपन से ही गुड़िया ने शंकर को शीश महल में आते जाते देखा था वह शीश महल में रहने वालों के बाहर के काम कर दिया करता, अनाथ था बेचारा, मजहब से हिंदू था। नादिया बेगम को भी शंकर के शीश महल में आने जाने से भी कोई दिक्कत नहीं थी। गुड़िया उसे बचपन में ही राखी बाँधा करती थी। पहले तो कुछ साल बचपन के इसी तरह हसीं मजाक में यह त्यौहार मनाते थे, पर जब बच्चे बङे हुये दोनों ने इस त्यौहार का महत्व जाना और धर्म ईमान से भाई बहन का नाता निभाने लगे।..........
ख़ानम बी (भाग- 6)
नादिया बेगम की बचपन की सहेली शाहबानो कुछ दिनों के लिए शीशमहल मिलने आई। अभी एक दिन भी नही बीता था कि शाह शाह बानो की नज़र गुड़िया पर पङ गई और गुड़िया को इधर उधर शीश महल में घूमते देख शाह बानो ने नादिया बेगम से तपाक से सवाल कर डाला, " ऐं नादिया बेगम यह बेफिक्र परिन्दा कहाँ से पकङ लिया, अल्लाह कसम खूबसूरत नहीं नगीना है।" नादिया बेगम ने अभी बोलने के लिये मुँह खोला ही था कि शाह बानो बोल उठी "बुरा न मानो तो नादिया इस परिन्दे को दोस्ती के वास्ते ही सही
मुझे दे दो, मुँह माँगी रकम दूंगी। "क्या कहती हो?" "अरे नहीं नहीं, अभी तो बच्ची है, सकीना की बेटी है। नादिया ने जवाब दिया। शाह बानो इतराते हुए बोली " बच्ची है तभी तो कह रहीं हूँ मुँह बोली रकम दूंगी बाकी पालने पोसने की फिक्र न करो। अल्लाह की रहमत है हमारे गरीब खाने में.........
शाह बानो का यह कहना, नादिया बेगम को बिल्कुल भी नही भाया था। नादिया बेगम शाह बानो से क्या करती और क्या कहती एक तो पुरानी बचपन की सहेली और दूसरे उनकी महेमान, गुस्सा पी गई। चुप तो रह गई। पर कहीं न कहीं शाह बानो की बात दिल के किसी कोने में खटक ही गई। थोङा मुस्करा कर नादिया बेगम कहने लगी। "अरे अभी नहीं अभी तो सकीना ही मेरे शीश महल की रौनक है। बाकी, बाद में सोचूंगी पर, कभी सोचा तो शाह बानो आप से ज़रूर पूछ लूंगी कह नादिया बेगम ने बात को बढ़ावा न देते हुए उसे वहीँ खत्म कर दिया।
शाह बानो कुछ दिन शीश महल में रही और फिर वह लौट गई जाते जाते भी एक बार गुड़िया को बहुत प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली" नादिया बेगम जब कभी सोचो तो हमें ज़रूर याद कर लेना।" गुड़िया के हाथ में पाँच का नोट थमाते हुए बोली।
नादिया बेगम न जाने क्यों सकपका गई, पर चेहरे के भावों को छिपाते हुये कहने लगी
" अरे! शाह इतनी उतावली क्यों होती हो? वक्त का इन्तिज़ार सब्र से करना अभी तक न आया है। अल्लाह के वास्ते अब तो सब्र करना सीख लो।" फिर दोनों गले मिलींऔर ठहाका लगा हँसने लगीं। गुड़िया की मासूमियत को यह तो मालूम हो गया था कि बात उसके बारे में ही हो रही थी पर इस बात से बेखबर कि किस बारे में हो रही थी।
बचपने के चलते गुङिया शाह बानो से कह उठी, " अगली बार आओगी तो हम भी आपके साथ आपके घर चलेंगे।" हाँ!हाँ! मेरी बच्ची तुम्हारी नादिया बेगम हुक्म दें तो हम तो आज ही तुम्हें अपने साथ ले चलें।" नादिया बेगम ने गुड़िया का हाथ कुछ इस तरह पकङ लिया जैसे कोई उनसे उनकी प्यारी और कीमती वस्तु ज़बरदस्ती न छीन ले जाये। नादिया बेगम ने झट से गुड़िया को बोला
"चलो गुड़िया, खाला को सलाम कर अन्दर जाओ।" गुड़िया शाह बानो को सलाम कर अन्दर चली गई।
शाह बानो भी तिरछी मुस्कान दे बङी ही नजाकत और इतराते हुये तांगे में बैठ हाथ हिलाते हुए स्टेशन की ओर बढ. गई। लेकिन...........
लो
ख़ानम बी ( भाग- 7)
शाह बानो भी तिरछी मुस्कान दे बङी ही नज़ाकत और इतराते हुये तांगे में बैठ हाथ हिलाते हुए स्टेशन की ओर बढ. गई। लेकिन पीछे छोड़ गई एक सवाल नादिया बेगम के मन में, सवाल भी ऐसा जो नादिया बेगम का चैन और सुकून सब उङा कर ले गया।
अब वह वह छोटी सी खेलती कूदती गुड़िया उन्हें एक सुन्दर जवान और खूबसूरत अपने शीश महल की गुड़िया न रह कर जीनत नजर आने लगी।
डील डौल रौबीला इतनी छोटी उम्र में था तो आगे तो.........
नादिया बेगम ने गुड़िया का नाम यही सोच लिया। अब तो गुड़िया नादिया बेगम की आँखों में खटकने लगी। उसकी जगह दिल और दिमाग़ में अब उन्हें एक और ही शख्सियत जगह लेते हुए नज़र आने लगी।
अब 13 साल की बच्ची नादिया बेगम की आँख में हर वक्त तिनके की तरह खटकने लगी।
सकीना रोती और कहती रह गई , " नादिया बेगम, अभी गुड़िया बहुत छोटी है अभी इसे इस आग में मत झोंको।"
नादिया बेगम न मानी और कहने लगी, " सकीना न समझ मत बन। जवान लौंडिया कहाँ तक सम्भालेंगे अभी से कमाना सीख जायेगी, शीश महल की रस्मों रिवायतों से वाकिफ भी हो जायेगी।"
साथ ही सकीना को दिल चीर देने वाला ताना भी दे दिया, " तूने कौन सा घर बसा लिया ।
कुछ दिन बीते ही थे कि नादिया बेगम को शीश महल में एक बडे. शाहूकार का संदेशा आया कि नादिया बेगम को वह पैसे तोल देगा ,पर शर्त एक ही थी कि उसे एक रात के लिए खूबसूरत और वह भी अनछुई कली चाहिए।
नादिया बेगम की बांछे खिल उठीं।उन्हें गुङिया जब से शाह बानो की नज़र उस पर पङी ।थी तब से ही गुड़िया ह र वक्त उनके दिलो दिमाग पर छाई हुई थी। नादिया बेगम को इससे अच्छा मौका कब मिलता।
नादिया बेगम ने पैसे का लालच तो किया ही और साथ ही शाह बानो की टोक का हिसाब भी मन में जो था वह भी पूरा होने के आसार नज़र आते दिखाई देने लगे।
नादिया बेगम ने यह भी सोचा कि आज नहीं ,तो कल गुड़िया की नथनी कभी तो उतरनी ही है तो अब क्यों नहीं। ऐसा मौका बार बार कहां आता है?
मन में सोचना शुरु किया, बुढ़ापा भी आसानी से कट जाएगा, यही सोच कर गुड़िया के उन उड़ान भरने वाले परों के काटने की तैयारी होने लगी जो अभी उड़ना भी न सीखे थे
गायन विद्या उठने बैठने का सलीका,हालाँकि यह गुड़िया को सब आता था लेकिन बचपना होने के कारण अदब अदाब कभी कभी नज़र अन्दाज हो जाता था।
हफ्ते दस दिन की बात थी, गुङिया में एक दम बदलाव आ गया। जो सकीना को अच्छा
न लगा वहीं नादिया बेगम को बहुत अधिक अच्छा, उसके तो पांव धरती पर न पङते और तारीफ करते ज़ुबान न थकती।
इसपर......
To be continued💕💕
Please comment and share💕💕
💕💕 Guy's aapko Aaj ka chapter kaise laga comment karke zaroor batayen Bane rahen hamaari khani ke saath, tab tak ke liye take care and happy reading.📚
