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Shravani Balasaheb Sul

Inspirational

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Shravani Balasaheb Sul

Inspirational

जीवनी: संभाजी लोंढे

जीवनी: संभाजी लोंढे

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      सफलता की कथाए अनगिनत संघर्षों के कथानक से जन्म लेती हैं। जिंदगी का अनमोल आभूषण हैं वह माला जो संघर्षों के मोती जिद और जुनून के धागे में धैर्य के भाव से पिरोकर रूप में आई हो। वैसे तो हर जीवनकहानी एक प्रेरणा हैं ; किंतु कुछ खास जीवनियाँ उत्तेजना होती हैं। ऐसी उत्तेजना जो पाठकों, दर्शकों एवं श्रोताओं को अपनी जिंदगी में कुछ कर जाने का जज्बा दिलाती हैं। ऐसी ही एक चित्ररूपी जीवनकथा शब्दरूप में साकारने का यह छोटा सा प्रयास।

       यह कहानी हैं एक नादान लड़के की जिसकी जेबों में सिक्कों की खनक भले न थी मगर फिर भी आँखों में सपनों की चमक जरूर थी। वह छोटा सा लड़का जिसे सब संभा बुलाया करते थे बड़ा होकर 'यशदा कंस्ट्रक्शन' का मालिक संभाजी लोंढे बना । संभा सर से हमारे पारिवारिक संबंध होने के साथ साथ वह मेरे sports coach भी रहे हैं । इस कारणवश उनकी जिंदगी से व्यक्तिगत रूप से मैं थोड़ी बहुत वाक़िफ़ हूँ । मुझे अपनी जिंदगी में इनके जैसी महान शख्सियत को जानने का अवसर मिला ईसे मैं अपना भाग्य समझती हूँ । उनके संघर्ष के कुछ अंश की गवाह मैं खुद भी हूँ । उनके जीवनसंघर्ष को पंक्तिबद्ध करना चाहा तो कलम ने कुछ यूँ कहा...

कत्ल तो होंगे ईस जंग में, जिंदगी से किसी का भाईचारा नहीं।

मैं जान दे के भी आजमा लू खुदको, मगर पीठ दिखाना गवारा नहीं ।

       उपर्युक्त पंक्तियाँ उनके ज़िद्दी जज्बे का परिचय कराती हैं ।उन्होंने जिंदगी में बहुत ठोकरे खाई । बहुत दफा कदम लड़खडाए भी मगर रुके कभी नहीं । उनकी यही निरंतरता उनके और उनके सपनों के बीच के फ़ासले मिटाती रही ।निराशा के काले बादल हटाती रही और वजूद से दूरियाँ मिटाती रही ।

      मुझे पुर्ण विश्वास हैं कि उनकी ये दास्ताँ सभी पाठकों के लिए एक प्रेरणा तथा हर मुश्किल से लड़ जाने की उत्तेजना साबित होगी ।


    2 जून 1986 की दोपहर को महाराष्ट्र राज्य के अहमदनगर जिले के राहुरी तालुके में स्थित वरवंडी गाँव के खड़कवाडी नामक क्षेत्र में संभा सर का जन्म हुआ । उनका पुरा नाम संभाजी भागिनाथ लोंढ़े हैं । उनकी माता का नाम बानुबाई तथा पिता का नाम भागिनाथ भाऊराव लोंढ़े हैं । वह अपने माता पिता की दुसरी संतान थे। उनकी 1 बड़ी और 2 छोटी बहने तथा एक छोटा भाई हैं । वरवंडी ये उनकी माँ का मायका था और ससुराल अहमदनगर जिले में ही स्थित एक गाँव माका था । जन्म के बाद से उनका पुरा बचपन माका में ही गुजरा ।

      उनकी माँ ने बड़ी प्रतिकूलता में उनको जन्म दिया ।

संभा सर के जन्म के 7-8 दिन पहले से ही माताजी की तबियत बहुत ही जादा खराब थी । वह बच्चे को जन्म देने की हालत में बिलकुल नही थी। उस वक़्त ज्यादातर घर पर ही delivery कीई जाती थी । delivery के वक़्त माताजी के साथ सिर्फ उनकी बहन याने की होनेवाली बच्चे की मासी थी । बेहद तकलीफ़ में होने के बावजूद भी माताजी ने सुखरूपता से बच्चे को जनम दिया । दोपहर के प्रहर में जब सूर्य का तापमान अत्यूच्य स्तर पर होता हैं तब सूरज का तेज मुख पर लेकर यह प्रतिभाशाली बालक ईस दुनिया में आया । प्रतिभाशाली इसलिए क्यूंकि बड़ा होकर यह बच्चा कवी, लेखक, martial artist, नेता, वक्ता, अध्यापक और अब एक businessman ऐसी न जाने कितनी भुमिकाए निभाता आया हैं । जैसे कि सावन के कदमों की आहट के पहले अपने आप में सारे रंग लेकर कोई इंद्रधनु किसी फ़रिश्ते के भाति समस्त सृष्टि के लिए ईश्वर का पैग़ाम लेकर आया हो। दुनिया का दस्तूर हैं कि कल्पना के पार सुखद घटना के पहले कल्पना से परे दुखद  घटना आघात कर जाती हैं । उस दुख का अगर हम् डटकर सामना करे तो वही दुख आनेवाले सुख के पीछे की वजह बनता हैं । ईसी प्रकार ऐसे असामान्य पुत्र रत्न के सुख की प्राप्तिपुर्व माताजी को भी असामान्य दुख भोगना पड़ा । मगर अफ़सोस की बात ये हैं कि अपने बेटे को आसमाँ की बुलंदियाँ छूते हुए देखने से बहुत पहले ही वह खुद आसमाँ का एक तारा बनके रह गई । मगर ये तारा बेशक आज भी अपनी शितलता अपने पाँचों बच्चों पे बरसाता हैं। माताजी जहाँ कहीं भी हैं उनका प्रेम और आशीर्वाद हमेशा संभा सर के साथ हैं ।

        संभा सर के जन्म के पश्चात माताजी उन्हें लेकर माका लौट आई । माताजी को पूरा गाँव प्यार से 'आक्का' कहके बुलाता था । वह वात्सल्य और सहनशीलता की साक्षात मूरत थी। पढ़ाई लिखाई से भले ही उनका वास्ता न था लेकिन वह सही रूप में सुसंस्कृत और समझ से सुशिक्षित थी। आक्का महज 14-15 वर्ष की आयु में ही वरवंडी से माका ब्याह कर आई थी।श्री. भाऊराव महादु लोंढ़े और श्रीमती यशदाबाई इनके सात बेटों में से सबसे बड़े बेटे भागिनाथ की वह पत्नी थी और ईस नाते घर की सबसे बड़ी बहु। सास ससुर बहुत भले इंसान थे मगर आक्का अपने पती की वजह से हमेशा तकलीफ़ में रहती थी। उनके पती ने उन्हें कभी वह प्रेम तथा सम्मान दिया ही नहीं जिसकी वह हकदार थी। उनके पाँच नन्हेमुन्ने ही उनकी जिंदगी की रौनक थे। उन्हें देखकर और आँखों में उनका सुनहरा भविष्य सजाकर ही वह जीती थी। खेती का काम, घर का काम, बच्चों का खयाल रखना और पती के जुलूम सहना; इन्ही चार दीवारों में आक्का कैद रहती थी। संभा सर के पिता एक किसान थे तथा हफ्ते में एक दिन कूली का काम किया करते थे। उनके दो चाचा पूणा में engineer, दो मुकादम थे और एक चाचा भेड़- बकरियों के पीछे रहते थे। पिता बच्चों का आधारस्तंभ होता हैं लेकिन संभा सर के पिता अपने बच्चों के लिए खून से अपने होकर भी मन से हमेशा पराये ही थे। उन्हें जिंदगी में कभी भी पिता का प्यार मिला ही नहीं और यह उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी कमियों में से एक हैं। पिता के आश्वासक साये की ठंडक उनको कभी भी महसूस नहीं हुई। उनके लिए उनकी माँ ही सबकुछ थी।

       संभा सर माका की गोद में ही पले- बढ़े। उनका चौथी तक का शिक्षण 'जिला परिषद शाला, माका' में पूर्ण हुआ। वह बचपन से ही पढ़ाई में बहुत ज्यादा तेज थे। कोई भी चीज उनको झट से याद हो जाती थी। घर की आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा खराब थी। अपेक्षित शैक्षणिक सुविधाए उपलब्ध न होने के बावजूद भी वह स्कूल में हमेशा अव्वल आते थे। चौथी की परीक्षा में तो वह पूरे केंद्र में प्रथम आए थे। पढ़ाई के साथ- साथ वह खेलकूद में भी नंबर वन थे। संभा सर जब हमें बॉक्सिंग, कराटे ऐसे खेल सिखाते थे तब खेल के प्रति उनकी आदरभावना तथा समर्पण और समझ देख यूँ लगता था जैसे वह खेल के लिए ही बने हो। वह बचपन से ही घुड़सवारी के बहुत शौकीन थे। तब से ही वह बहुत अच्छे घुड़सवार थे। ये तब की बात हैं जब सर तिसरी कक्षा में थे। एक गाड़ी वाले के साथ घोड़े पर सवार होकर उन्होंने race लगाई और जीत भी गए। साथ ही साथ वह बचपन से ही एक बहुत कुशल पहलवान भी थे। जिंदगी के साथ साथ उनके अखाड़े के दावपेंच भी गौर करने जैसे थे। उनकी पहलवानी के चर्चे कुछ यूँ थे कि जब गाँव में छोटे बच्चों की कुश्ती होती थी तब लोग खास संभा सर की कुश्ती देखने के लिए इकट्ठा होते थे।पहले से ही खेलकूद उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग थी l आगे भी उन्होंने ईस क्षेत्र में तारीफ के काबिल काम किया। खेलने में माहिर और पढ़ाई में भी होशियार होने के कारण वह अपने स्कूल में मशहूर थे।

         संभा सर की ख्याति केवल पढ़ाई और खेलकूद तक ही सिमित नहीं थी। बल्कि वह अपनी शेतनियों के लिए भी उतने ही प्रसिद्ध थे। वह बड़ी प्रतिष्ठा से 'गाँव का सबसे शैतान बच्चा' ईस पद पर विराजमान थे। स्कूल में भी सभी को उनके प्रचंड उदंड स्वभाव की कल्पना होने के कारण जब भी कहीं कोई गड़बड़ होती थी तो बिना किसी जाँच- पड़ताल के ही शिक्षकों द्वारा संभा सर को दोषी ठहराया जाता था। और मजे की बात यह थी कि सर भी अपने अध्यापकों के विश्वास पर हर बार खरे उतरते थे। क्यूंकि वह शरारते उन्हीं की हुआ करती थी। मगर उनकी एक बात लक्षणीय थी कि वह बड़ी विनम्रता से अपनी गलती मान लिया करते थे और उनकी वह मासूमियत शिक्षकों को भी भाती थी।       

        छोटा सा संभा माँ का बहुत दुलारा था। मगर उसकी शेतानियों ने माँ के नाक में दम कर रखा था। उनकी शरारतों के किस्से तो इतने बेशुमार और जटिल हैं कि उनपर अलग से एक किताब लिख दू। यह तब की बात हैं जब वह चौथी में थे। उन्होंने गाँव के एक किसान के आम के पेड़ से दो आम तोड़ लिए। यह उस किसान ने देख लिया। वह दौड़ा- भागा चला आया और उनके हाथ से आम छीन के उन्हें बहुत खरी खोटी सुना दी। तब संभा सर मुँह पे माफ़ी माँग के और मन में बदला लेने की ठान के वहा से चले आए। फिर दूसरे ही दिन अपनी संभसेना के साथ (अपनी टोली के साथ) रात को ग्यारह बजे के दौरान घरवालों की नजरों से बचकर जा पहुँचे उस किसान के खेत उसी आम के पेड़ के पास। फिर क्या... संभा सर और उनके दोस्त सरसर कर पेड़ पर चढ़ गए और सारे के सारे आम तोड़ लिए। हो सके उतने बोरियों में भर लिए और बाकी के आम वही पेड़ के नीचे छोड़कर वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गए। सुबह जब किसान पेड़ की दशा देख आग बबुला हुआ तब संभा सर को अपना बदला पूरा होने की खुशी हुई। सब को यही लगा कि यह काम किसी शातिर चोर ने पुरी योजना के साथ किया हैं। इसलिए संभा सर तब की बार घरवालों की डाँट- फटकार और मार से बच गए। बड़े से बड़ा आदमी जो करने की हिम्मत जुटा नहीं सकता था वह चीज यह छोटे से छोटा बच्चा सबके नाक के नीचे से कर जाता था और किसी को खबर भी नहीं होती थी। ऐसा ही एक किस्सा एक दूसरे किसान के साथ भी हुआ था जिसका मूँगफली का खेत था। हुआ यह था कि सर हमेशा की तरह अपनी घोड़ी को चराने ले गए थे। घोड़ी भाग ना पाए इसलिए उसका एक आगे का और एक पीछे का पैर साथ में बाँध कर उसे चरने के लिए छोड़ दिया और खुद दोस्तों के संग चल दिए। चरते- चरते गलती से वह घोड़ी उस किसान के खेत में घुस गई और खेत के कुछ हिस्से की मूंगफलियाँ चट कर गई। जब किसान ने यह नजारा देखा  वह हाथ में छड़ी लेकर चिल्लाता हुआ आया तो उसकी आवाज सुनकर सर भी भाग कर आए। तब घोड़ी को दो फटके और संभा सर को बहुत सारी गालियाँ पड़ी। अब उन्हें गालियाँ सुननी पड़ी तो उनके अहंकार को चोट पहुंची तो मन में बदला लेने की ठानकर घोड़ी को लेकर चुपचाप वहा से चल दिए और रातोरात अपनी टोली के साथ मिलकर उस किसान का लगभग आधा खेत उजाड़ दिया और किसी को कानोकान् खबर तक नहीं हुई कि यह किसका किया धरा हैं। गाँव में अक्सर लोग रात को जल्दी सो जाया करते थे; इसलिए यही सही वक़्त रहता था ऐसे ख़ुफ़िया बदले लेने का! स्कूल में भी वह कुछ कम गुंडागर्दी नहीं करते थे। हाथापाई तो उनके लिए एक खेल मात्र थी। कहीं पे कुछ झगड़ा हुआ नहीं कि कर दी मारपीट! स्कूल में दो group हुआ करते। एक संभा सर का और एक उनके दोस्त गोरक्ष का। दोनों टोलियों द्वारा मारपीट की मानो प्रतियोगिता ही आयोजित की जाती थी। दोनों टीम में जमके मारपिटाई हुआ करती थी और हर बार संभा सर की गैंग जीत जाया करती थी। संभा सर की शरारतों का कोई हिसाब नहीं था। कभी कभी तो उनकी माँ उनसे इतनी परेशान हो जाती थी कि गुस्से में कह देती थी, "तेरे जैसा बच्चा पैदा ही नहीं होता तो अच्छा होता। " संभा सर कितने भी बेपरवाह बने फिरते हो लेकिन माँ की यह बात उस छोटे से बच्चे को चुभ जाती थी। फिर जब गुस्सा शांत होने पर माँ प्यार से समझाया करती थी,छोटा संभा बड़े ध्यान से माँ की बात सुना करता था और बड़ी आसानी से भुला भी देता था। माँ की दिई हुई समझ का असर रात भर में उतर भी जाता था और फिर अगले ही दिन चला संभा वही मनमर्जियाँ और मनमानियाँ दोहराने।

        संभा सर की अब तक की कहानी जानकर कोई भी व्यक्ति सहजता से यही सोचेगा कि यह लड़का बहुत ही बेफ़िकरा और बेखौफ हैं। मगर यह सिर्फ आधा सच हैं। उनके व्यक्तित्व के कई पहलू अभी तक उनके शरारती स्वभाव के आवरण में बंदिस्त हैं ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हमेशा से ही उनके हँसते खिलते चहरे के पीछे एक संवेदनशील चेहरा छुपा रहा हैं। यह लड़का मनचला तो था मगर मन का सताया हुआ था। संभा सर के परिवार में कुल मिला के लगभग 40 से 42 लोग थे। उस वक्त ज्यादातर संघटित परिवार पद्धति हुआ करती थी। सभी भाई बहनों में संभा सर सबसे शरारती भी थे और होशियार भी। उनकी पढ़ाई में तरक्की उनके चाचा- चाचियों की आँखों में बहुत चूभती थी; क्यूंकि, उनके खुदके बच्चे इतने होशियार नहीं थे। संभा सर के यह तथाकथित अपने उनकी प्रगती में सदैव बाधा उत्पन्न करते थे। उन्हें खेती के कामों में व्यस्त रखा करते थे ताकि वह पढ़ न पाए। कभी कभी तो संभा सर को भेड़- बकरियों के पीछे भी जाना पड़ता था। इतने में भी संतुष्टि नहीं मिलती थी तो संभा सर की छोटी छोटी गलतियों पर भी उनके चाचा- चाची उन्हें बहुत मारते- पिटते थे। उनकी मारपीट एक तरफ और उनके कड़वे बोल एक तरफ। संभा सर के लिए वे लोग हमेशा अपशब्दों का ही प्रयोग किया करते। खुद बड़े होकर इतने बिगड़े हुए थे और अपने बिगडैल बच्चों को बोला करते थे कि, "ईस संभा के साथ मत रहना नहीं तो तुम लोग भी बिगड़ जाओगे"!उनके बच्चे भी अपने माँ- बाप की तरह ही संभा सर पे बहुत दादागिरी किया करते। संभा सर की माँ (आक्का) घर की सबसे बड़ी बहु थी लेकिन स्वभाव से शांत होने के कारण उन्होंने कभी भी अपनी देवराणियों को अपने बेटे के पक्ष में प्रत्युत्तर नहीं दिया जब वे संभा सर को अकारण या बहुत ही सूक्ष्म कारणवश खूब डाँटती या मारती थी। बल्कि अगर कभी संभा सर अपनी किसी चाची की शिकायत लेकर आक्का के पास आ गए तो आक्का उन्ही को डाँटती थी यह कहकर कि, 'तूने ही कुछ किया होगा'। घरवालों का खूब डाँटना और मारना, हर बात के लिए , यहाँ तक कि खाने- पीने के लिए भी कोसते रहना, पढ़ाई में बाधा डालने हेतू बहुत सताना, माँ का भी बेबस होकर चूप रहना और अपने बेटे पे ही बिगड़ जाना चाहे उनकी गलती हो या ना हो। खुदकी ओर सबका ऐसा व्यवहार देख एक बच्चा जिसे सही गलत की सही से समझ ना हो उसके मन को कितनी तकलीफ़ होती होगी , ईस बात की कल्पना मात्र से ही मन सिहर जाता हैं। न जाने कितने सवाल उस बच्चे के मन को सताते होंगे। वह भला यह कैसे जान पाता कि कौन सही और कौन गलत। मन में उठ रहे सवालों से हारकर अंदर ही अंदर वह  खुदसे नाराज रहता होगा।

        संभा सर स्वभाव से कितने भावुक थे ईस बात का एक प्रमाण उनके छोटे भाई संदीप के जन्म से जुड़ा हैं। जब वह चौथी कक्षा में थे तब आक्का पेट से थी। तब उनके गर्भ में संदीप सर थे। (संदीप सर एक martial artist हैं और मेरे 'ताए- क्वाँ- दो' कोच भी रहे हैं।) एक दिन जब संभा सर अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे तब उनका चचेरा भाई उनके पास आया और कहा कि 'संभा को भाई हुआ हैं।' संभा सर बड़े खुश हुए और तेजी से घर की ओर दौड़े। वह अपने भाई को निहार ही रहे थे कि तभी आक्का मजाक में संभा सर को यह बोल पड़ी कि, 'अब मुझे यह बेटा मिल चुका हैं तो अब तुम मेरे बेटे नहीं हो। अबसे यही मेरा बेटा हैं। ' संभा सर ने आक्का के ईस मज़ाक को सच मान लिया और जोर- जोर से रोने लगे।

उनकी ईस मासूमियत पर आक्का और पास बैठी दादी हँस पड़ी। मगर जब संभा सर का रोना शांत ही नहीं हुआ तो आक्का उन्हें समझाने लगी कि वह तो बस मज़ाक कर रही थी। मगर संभा सर को फिर भी यकीन नहीं हुआ। उन्होंने आक्का के मजाक को दिल से लगा लिया और उनसे रूठकर बैठ गए। फिर आक्का से जब बात नहीं बनी तो दादी ने ही बिगड़ी को बनाने के लिए एक तिकडम किया। दादी ने भी एक छोटा सा मजाक किया। उन्होंने आक्का पे झूठ- मूठ का गुस्सा जताकर खूब डाँट लगाई और ऐसी बात दुबारा न दोहराने को कह दिया। माँ ने भी डर जाने का नाटक कर झूठी माफ़ी माँग ली। तब जाके संभा सर शांत हुए ईस विश्वास के साथ कि अब माँ उन्हें कभी नहीं छोड़ेगी। जिस तरह कहते हैं ना कि, 'लोहा ही लोहे को काँटता हैं' उस तरह ईस घटना में मजाक ने मजाक को काँटा। यह घटना मुझे इसलिए मज़ेदार लगती हैं क्यूंकि पहले तो आक्का के लाख मनाने पर भी संभा सर को उनका मज़ाक भी सच लग रहा था और दादी ने जब आक्का को डाँटा तब भी वह मज़ाक उन्हें सच लगा। लेकिन वास्तव में तो दोनों बातों में से कुछ भी सच नहीं था। अब माँ अपने बच्चे का त्याग कर दे यह तो बड़ी अवास्तव बात हैं; लेकिन फिर भी वह बात उन्हें इसलिए सच लगी क्यूँकि शायद उनके मन में अपने चंचल स्वभाव के कारण यह डर बैठ गया कि मैं परेशान करता हूँ इसलिए माँ अब मुझे छोड़ देगी क्यूंकि अब उन्हें नया बेटा मिल गया। और गुस्से में आक्का पहले भी ऐसी बातें कर चुकी थी कि तुम ना होते तो अच्छा होता। इसलिए एक छोटे से बच्चे का माँ से दूर होने का यह डर स्वाभाविक भी था। और दादी के मजाक को उन्होंने इसलिए सच मान लिया क्यूंकि उनके घबराए मन को एकदम से तसल्ली मिल गई। उन्हें विश्वास था कि माँ दादी की बात नहीं टालेगी इसलिए वह बेफ़िकर तो हो गए, मगर उस बच्चे को यह विश्वास नहीं था कि माँ मुझसे बहुत सारा प्यार करती हैं इसलिए वह मुझे कभी अपने से दूर नहीं करेगी। ईस बात से अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि उनके मन में माँ को लेकर कितनी असुरक्षा थी। उनका और एक उल्लेखनीय गुण यह था कि उनके मन में सदा से ही दूसरों के लिए करुणा और सहकार्य की भावना थी। बचपन में वह पास के एक घर में TV देखने जाया करते थे। तब राजा महाराजाओं की कथाए तथा अपनी अच्छाई से बुराई मिटाता नायक ऐसी संकल्पना पर आधारित चलचित्र वह देखा करते थे और तब उनके मन में उस नायक के भाती समाज में बदलाव लाने की एवं दूसरों की जिंदगी में रंग भरने की तमन्ना हर बार नए से जन्म लेती थी। फिल्मे देखते वक़्त उन्हें यह लगता था कि मैं भी बड़ा होकर ईस नायक की तरह ही बनूंगा। गरीबों की मदद करुंगा और बुरे व्यक्तित्व के लोगों को सबक सिखाऊंगा, आदि। और फिर ईस तरह से सामने चल रही फिल्म के साथ- साथ उनके तसव्वुर में उसी से संलग्न एक नई फिल्म शुरू हो जाती जिसके नायक वह खुद थे। ईतनी कम उमर में गर कोई बच्चा ईतनी बुलंद सोच रखता हैं तो बेशक वह बच्चा असामान्य ही होगा। महत्वपूर्ण बात यह हैं कि उनके बचपन की वह तमन्ना आज भी उनके आचरण में साफ झलकती हैं और उनके अंदर के अनोखेपन का अनुभव करा देती हैं। उनका फिल्मों का शौक उनको बहुत महंगा पड़ता था। जब जब वह TV देखने जाते थे उनके चाचा- चाची उनकी खूब धुलाई किया करते। मगर फिर भी उन्होंने अपना यह शौक कभी नहीं छोड़ा। दोस्तों के संग खेलना, शरारते करना, TV देखना और अपनी ही रंगीन दुनिया में खो जाना ; यही कुछ चीजे उनको आनंद देती थी।

         प्राथमिक शिक्षा के उपरांत उन्होंने 'न्यू इंग्लिश स्कूल, माका' ईस विद्यालय में admission लिया। पाँचवी से दसवी तक की शिक्षा वही से प्राप्त करी। उस विद्यालय में आसपास के गाँवों के बच्चे भी माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने हेतु प्रवेश लेते थे। वहा पर भी पढ़ाई में संभा सर की तरक्की काफी अच्छी थी और शरारतों में भी वह अव्वल ही बने रहे।आक्का का सपना था कि मेरा संभा बड़ा होकर collector बनेगा। संभा सर की पढ़ाई में तरक्की देख आक्का को पूर्ण विश्वास था कि उनका बेटा उनका ये सपना जरूर पूरा करेगा। अब उस वक़्त संभा सर को क्या मालूम कि यह collector आखिर होता क्या हैं। लेकिन, बचपन से ही उन्हें ईस बात का एहसास जरूर था कि वह सबसे अलग और खास हैं। उन्हें हमेशा यह महसूस होता था कि वह सबसे जुदा हैं और जिंदगी में बहुत बड़ा मुकाम हासिल करेंगे।आज संभा सर एक collector से सौ गुना ज्यादा कमा रहे हैं मगर खेद की बात यह हैं कि आज आक्का अपने लाडले को शाबाशी देने के लिए मौजूद नहीं।

         आजसे लगभग 24-25 सालों पहले की बात हैं जब सर छठी कक्षा में थे। तब नवरात्री के दिन थे। आक्का का 7 दिनों से उपवास चल रहा था। हररोज की तरह ही वह अपने कामों में व्यस्त थी।शाम के वक़्त जब छोटे संभा ने उन्हें अपने कपड़े धोने के लिए दिए तब उन्हें किसी काम से बाहर जाना था। इसलिए आक्का ने संभा से कह दिया की वह आने के बाद कपड़े धो देगी और वह कपड़े धोने के लिए रखकर वह चली गई। और जब चली गई तो फिर कभी वापस नहीं आई। आक्का के घर से निकलने के कुछ देर बाद पूरे गाँव में एक भयंकर आवाज हुई जिससे पूरा गाँव काँप उठा। संभा तेजी से आवाज की ओर दौड़ पड़ा। जमा हुई भीड़ को भेद जब आगे बढ़ा तो कुछ ऐसा देखा की एकदम से रूक गया । खून से लतपत् आक्का सामने बेजान पड़ी थी। एक एस टी बस से टकराकर आक्का का accident हुआ और उसी पल उन्होंने दम छोड़ दिया।

उनका शरीर सामने ही था मगर वह जा चुकी थी। दूर... बहुत बहुत दूर। जाते- जाते संभा सर के उन बिन धुले कपड़ों में अपनी परछाई छोड़ गई। ऐसी आश्वासक परछाई जो घने अंधेरे में जब अपना खुदका साया भी साथ छोड़ दे तब भी साथ निभाए। इंसान जब श्वास त्याग दे तब बाकी रहता हैं आभास जो पल पल हमें उसकी मौजूदगी का एहसास दिलाता हैं। वह एहसास हमें सहलाता भी हैं मगर बहुत रुलाता भी हैं। या यूँ कह ले कि रुलाते रुलाते सहलाता हैं और सहलाते सहलाते रुलाता हैं। 10- 12 साल की उमर, जब बच्चों ने अपनी माँ को जानना शायद शुरू भी नहीं किया होता उसी वक़्त संभा सर से भगवान का दिया यह सबसे अनमोल तोहफ़ा छीन गया। उनसे उनकी "माँ" छीन गई। माँ की मृत्यु संभा सर के जीवन की सबसे दुखद घटना हैं। वह आज अपनी ज़िंदगी में कितने भी आगे क्यु न बढ़े हो मगर उनके अंदर का वह बच्चा आज भी उसी रास्ते पर उसी जगह ठेहरा हैं जहाँ पर उसने अपनी माँ खोई थी। यह उनके जीवन का ऐसा दुख हैं जिसके बाद से हर सुख उनसे रूठ गया। मुझे आज भी याद हैं, वह अक्सर कहा करते थे कि, 'जब तक माँ होती हैं तब तक ही सारे रिश्ते- नाते होते हैं।' माँ के गुजर जाने के बाद हर रिश्ते ने उन्हें ठुकराया । बाकी रिश्तों को क्या दोष देना जब उनके पिता ने ही अपने बच्चों को अपनाने से इंकार कर दिया। ऐसे मुश्किल वक़्त में संभा सर के दादा दादी आक्का के पाँचो बच्चों के लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं थे। दादा दादी उन बच्चों के पक्ष में थे तो उनके सातों बेटों ने उनको घर से बेदखल कर दिया। कारण सिर्फ यह था कि उन्होंने बच्चों की जिम्मेदारी ले ली थी। फिर दादा- दादी बच्चों के साथ अलग से रहने लगे। उनके लिए दादा- दादी ने बुढ़ापे में जवानी से भी बत्तर ठोकरें खाई। गरीबी तो पहले से ही थी मगर अब यह गरीबी लाचारी में बदल चुकी थी। घरवालों के तिरस्कारपुर्ण व्यवहार के कारण और अपने ही पिता ने जिम्मेदारी ठुकरा देने के कारण इन बच्चों के एकमेव पालनहार और इनके भविष्य के तारनहार उनके दादा- दादी ही थे। जब उनको घर से बेघर कर दिया गया तब उन्हें एक- एक दिन जीने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता था। दादा- दादी के साथ साथ यह बच्चे भी खेती के कामों के साथ जहा से भी उपजीविका मिल सके वह सारे काम किया करते। मगर वह आमदनी सात लोगों की जरूरते पुरी करने के लिए काफी नहीं थी। तब संभा सर दादाजी के साथ गाँव के बाजार में जाते और आखिर में जो नीचे पड़ी हुई सब्जिया मिलती वह उठा लाते और उसी पर उनके परिवार का गुजारा होता। कभी सुखी रोटियों के टुकड़ो से काम चलाते। मगर उनके घरवालों को ना उस बूढ़े जोड़े पे तरस आया जिन्होने अपनी जिंदगी बेचकर उनकी जिंदगियां खरीदी थी और न उन बच्चों पे दया आई जिनकी माँ ने उन्हें ममता की छाव दी थी।हर माँ- बाप अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए उनसे जो कुछ बन पड़े वह सब करते हैं। संभा सर के दादा- दादी ने भी अपने बच्चों के भले भविष्य के लिए जवानी में खून- पसीना एक कर दिया और अपने बेटे के बच्चों के लिए बुढ़ापे का चैन और सुकून भी त्याग दिया। उनके नौ बच्चे थे। दो बेटिया और सात बेटे। मगर सात बेटे होने के बावजूद भी बुढ़ापे मे उनके साथ एक भी बेटा नहीं था जिसने उन्हें पुत्रप्रेम दिया हो। 


जिस बच्चे को अपने माँ- बाप का प्यार न मिला हो वह सबसे अभागा बच्चा हैं और इसी प्रकार जिन माता- पिता को अपने बच्चों का प्यार नहीं मिलता वह सबसे बदनसीब माँ- बाप हैं। यह दो ऐसे दर्द हैं जिनसे कोई भी इंसान उभर नहीं सकता भले उसका दिल कितना भी मजबूत क्यू न हो। क्यूँकि हम जिनका अंश हैं वह माँ- बाप हमें गर न अपनाए तो हमें अपना वजूद खोया सा लगता हैं और वह बच्चे जो हमारा अंश हैं वह अगर हमसे दूर हो जाए तो अपने ही एक हिस्से के सिवा अपना वजूद अधूरा सा लगता हैं। दिल से जुड़े दर्द वक़्त के साथ भुलाए जा सकते हैं, रूह से जुड़े दर्द भले भुलाए न जाए पर पीछे छोड़े जा सकते हैं; मगर,जो जख्म वजूद पे प्रश्नचिह्न बने हो वह हमेशा जिंदा रहते हैं। दादा- दादी और उन बच्चों की जिंदगी ऐसे ही प्रष्णचिह्नों से घिरी हुई थी। गरीबी के कारण भौतिक जगत में तो एक- एक साँस के लिए तक संघर्ष करना पड़ता, मगर बात करे उनके भावनिक विश्व की तो दिल की एक- एक धड़कन उनके दिल के खाली कमरों पर दस्तक दिया करती और खाली हाथ लौट जाती। मगर दादा- दादी ने अपने दुख- दर्द दिल ही दिल में दफ़नाकर बच्चों के भविष्य को चुना। संभा सर के बहनों की शादी हो या उनका और उनके भाई का शिक्षण हो, दादा- दादी ने माता- पिता के सभी फर्ज अदा किए। दादा- दादी को संभा सर के गुस्सैल स्वभाव के कारण उनकी बहुत फ़िक्र होती। वे बहुत समझाते मगर माँ के जाने के बाद संभा सर कुछ ज्यादा ही चिढ़चिढ़े हो चुके थे और इसका कारण थी उनके दिल की घुटन जो उन्हें खुली साँस न लेने देती। और उस घुटन के पीछे की वजह थे उनके आसपास के लोग जिन्होने उनका मानसिक और भावनिक छल किया, उनके हालातों का हल तो न बन पाए मगर हमेशा उनका का मज़ाक बनाया।


 3) समाज के सितम


 माँ के देहांत पश्चात पिता के होने के बावजूद भी संभा सर और उनके भाई बहनों पर 'अनाथ' होने का धब्बा लग चुका था। उनके पिता ने आक्का के चले जाने के बाद छह महीनों में ही दुसरी शादी कर ली। उनकी सौतेली माँ उनका बहुत तिरस्कार किया करती थी। गाँव के लोग यहा तक की उनके चाचा- चाची भी उन्हें अनाथ होने का ताना देते और उनके सामने अपने बच्चों को उनकी संगत में रहने से मना करते। 

बिन माँ के उन्हें 'बिन माँ का बिगड़ा बच्चा' यह ब्रीद हररोज सुनना पड़ता था। माँ के जाने के बाद उनके लिए अपने और बेगाने में कोई फर्क नहीं था। उनके लिए दादा- दादी छोड़ पुरी दुनिया पराई हो चुकी थी; या यू कह ले कि दुश्मन बन चुकी थी। लोगों के रूखे बर्ताव के कारण संभा सर बहुत दुःखी रहते थे। लोग उन्हें अपनी दहलीज तक छूने से यू मना करते थे कि जैसे उस निष्पाप बच्चे के कदम उनके घरों में कोई विपदा ले आते। अपनी ओर सबकी ऐसी निर्दयी धारणा देख संभा सर का मन बड़ा विचलित रहता था। कुछ समय बाद उनके मन में इन लोगों के लिए कड़वाहट भर गई जो बिल्कुल स्वाभाविक था। ईन सब चीजों का बुरा प्रभाव उनकी पढ़ाई पर भी दिखने लगा था। उनका पढ़ाई पर से मन उठ गया। साथ ही साथ उनकी शरारते भी बढ़ गई। वह पहले से बहुत ज्यादा चिड़चिड़े हो चुके थे। उनमें आ चुके ईस बदलाव के कारण दादा- दादी को उनकी बहुत चिंता सताती थी। वह दोनों अक्सर उन्हें प्यार से समझाया करते कि उनका गुस्सैल स्वभाव उनके लिए किस प्रकार हानिकारक हैं; मगर लोगों के द्वेषपुर्ण बर्ताव के कारण हर बार दुबारा से उनका खून खौल उठता। 

    वह अब खोए- खोए से रहने लगे थे। माँ के चले जाने के बाद पढ़ाई में उनकी प्रगती का आलेख एकदम से घटता गया और शैतानियों का आलेख बढ़ता ही गया। स्कूल में वह सबको बहुत परेशान किया करते। जब वह छटी कक्षा में थे तब स्कूल की छात्राओं को स्कूल आने- जाने के लिए एक- एक सायकल दी गई थी। संभा सर ने जब उनसे एक चक्कर लगाने के लिए सायकल माँगी तो सभी ने अपनी सायकल देने से इंकार कर दिया। तब खुन्नस में संभा सर ने दुसरे दिन सबकी नजरों से बचकर लड़कियों के सायकल की घंटी निकालकर हर एक सायकल स्कूल के सामनेवाले गन्ने के खेत में फेंक दी। जब इस सायकल कांड का खुलासा हुआ तब शिक्षकों से लेकर विद्यार्थियों तक शक की सारी निगाहें बेशक संभा सर पर थी; और संभा सर ने अपनी गलती मान भी ली। फिर उनकी इस 'दंडनीय' उपलब्धि पर सबके सामने उनको स्टेज पर 'आमंत्रित' किया और 'पिटाई' से 'सम्मानित' किया गया। ऐसे सम्मानों की तो संभा सर को आदत थी, इसलिए यह उनके लिए कोई बड़ी बात तो नहीं थी। वैसे मैं याद दिला दू कि उनकी और एक पुरानी आदत थी, अपमान का बदला लेना! अगले दिन उन्होंने सभी सायकल पंक्चर कर डाली और फिरसे मार खाई। सातवी कक्षा में उन्होंने एक नया उपक्रम शुरू किया। सामने बैठे लड़के की पैंट का बेल्ट लगानेवाला हिस्सा डोरी से बांधकर बैंच में फँसा देते। और होता यह था कि लड़का जैसेही खड़ा होने को जाता तब या तो एकदम से गिर जाता, या फिर उसकी पैंट ही फट जाती थी। लड़के का सबके सामने मजाक बनता देख संभा सर को बड़ा मजा आता था। शिक्षकों के लाख डाँटने- मारने पर भी जब वह नहीं माने तो उनको लड़कियों के पीछे बिठा दिया गया। फिर लड़कियों के यूनिफॉर्म पर पेन की स्याही से धब्बा बनाकर वह उन्हें भी परेशान किया करते। कभी- कभी तो assembly के वक़्त क्लास में ही ठहरते और लड़कियों के टिफिन चट कर जाते। उनकी कापियाँ तो हमेशा कोरी ही रहती। इस बात के कारण भी हमेशा उनको बहुत डाँट पड़ती। जब शिक्षकों द्वारा उन्हें दुसरे बच्चों से सीखने के ताने मिलते तो वह उन बिचारों की कापियाँ भी फाड़ देते और फिर मार खाते। उनकी बिगड़ी हुई पढ़ाई के कारण हिंदी विषय की शिक्षिका उनसे बहुत परेशान रहती थी। जिन बच्चों ने होम वर्क न किया हो उनको जब वह खड़े होने के लिए कहती थी तब संभा सर हमेशा गर्दन तान के खड़े हो जाते। वह संभा सर को "निर्लज्जम सदासुखी" कह के ताना मारती। और संभा सर उनकी बात का मान रखते हुए बेइज्जती के बाद भी उन्हें Thank you madam कह के बैठ जाते। उन्हें अब किसी भी चीज से कोई भी फर्क नहीं पड़ता था। वह बस अपने ही मन की किया करते। उनकी कापियाँ भले कोरी थी, मगर मन उन सारे शब्दों से भरा था जिनमें सवाल थे, शिकायते थी और जिंदगी से कई सारी रंजिशे भी थी। उनमे आ चुके इस बदलाव पर गौर करे तो एक बात का प्रखरता से एहसास होता हैं कि,शरारती तो वह पहले भी थे; मगर उन शरारतों में बचपना था, नादानी थी और हर बच्चे का जो आभूषण होती हैं वह नासमझी भी थी। मगर उनकी अब की शरारते किसी कारनामे से कम नही थी। उन शैतानियों में बस जूनून , जिद और पागलपन था। उनकी ऐसी हरकतों की वजह से लोगों का उन्हें पागल एवं बिगड़ा हुआ कहना शायद उचित था; मगर यह भूल जाना बिल्कुल भी मुनासिब न था कि इस बच्चे को ऐसे हालात में भी हमने ही तो धकेला हैं। एक सुप्रसिद्ध भजन की प्रख्यात पंक्ति हैं कि, 'पुष्प नहीं बन सकते तो तुम, काँटे बन कर मत रहना'। मगर इस सितमगर समाज ने संभा सर के पथ में केवल काँटे ही काँटे बोए। उन काँटों की राह पर चलते- चलते, अपनी खामोश चीखें सुनते- सुनते और चारों तरफ से रुसवाई के प्रहार सहते- सहते उस बच्चे का यू सौदाई बन जाना, इस कदर बौरा जाना तो स्वाभावीक था। पहले तो वह बेफ़िकर थे; मगर अब उपर- उपर से वह सबको बेशरम प्रतित होते, पर अंदर से वह पूरी तरह से बेबस थे। जब उन्हीं के घरवाले उन्हें अनाथ या भिखारी कहकर बेइज्जत कर घर की चौखट तक ना छूने देते, तब उन्हें माँ की बहुत ही याद आती। उस बच्चे को किसी ऐसे शख्स की जरूरत थी जो उसे सीने से लगा ले और प्यार की छाँव तले पनाह दे। मगर उनका कोई भी रिश्तेदार इतना अमीर न था कि उनपर बेइंतहा मोहब्बत की दौलत नीछावर कर दे। गिनती से परे रिश्तेदार होने के बावजूद भी दादा- दादी के सिवा कोई उनका अपना न था। मगर उनके स्वभाव के कारण दादा- दादी भी उनसे हैरान हो जाते और उनके लिए परेशान हो जाते। वह उन्हें समझाते समझाते थक जाते। 

बहुत दफा ऐसा होता हैं कि ,जब इंसान समझाने से समझता नहीं तब उसे समझाने की नहीं 'समझने' की जरूरत होती हैं। जब आप खुद सामनेवाले को समझोगे तभी आपको ईल्म होगा कि इस इंसान को क्या समझने की जरूरत हैं । वह बात समझाने की जगह गर उसे उस बात का एहसास दिलाया जाए तो मुमकिन हैं कि वह बात उसके जहन तक उतरेगी। और वह एहसास उसे कैसे दिलाया जाए यह बात भी आप तब समझ पाओगे जब आप उस इंसान को समझोगे। मगर यह काम बड़े सब्र का हैं, इसलिए इसकी जगह लोग अक्सर ऊँची आवाज में चार समझदारी की बातें कहना ही उचित समझते हैं। इस बारे में संभा सर की बात करू तो मुझे अपनी एक कविता की दो पंक्तियाँ याद आती हैं- "बिना अल्फ़ाजों के होते हैं कुछ गीत, जो एहसाँसों से लिखे जाते हैं गाने के लिए; समझने वाला ही मिल जाए कोई, काफ़िले बहुत हैं समझाने के लिए"। उनके पास उन्हें समझने वाला कोई भी नहीं था। वह अपने आप को बहुत अकेला महसूस किया करते थे। उन्हें यूँ लगता था कि, पुरी दुनिया में उनको समझने वाला कोई नहीं हैं और यह बात सच ही तो थी। इस जालिम समाज ने ही तो उस बच्चे को अकेलेपन के अंधेरे कुए में धकेला था। वहा से उनको अपनेपन का हाथ देकर बाहर खींच कर नया सवेरा दिखाने वाला कोई नहीं था। एक बार जब वह आठवी कक्षा में थे, तब उन्होंने उस कुए में तैरकर लड़ते रहने की जगह उसकी गहराई से हारकर उसमें डूब जाना मुनासिब समझा। उन्होंने तब पहली दफा इस दुनिया से रूठकर इसे अलविदा कहना चाहा। उन्होंने खुदखुशी करने की ठान ली। मगर उनके कुछ दोस्तों ने उन्हें इस अनहोनी से बचा लिया। यह दोस्त उनसे उम्र में 8-10 साल बड़े थे। संभा सर की उम्र के किसी भी बच्चे के मातापिता अपने बच्चों को संभा सर से दोस्ती नहीं करने देते; इसलिए उनसे बड़े लड़के ही उनके दोस्त हुआ करते। यह उनसे 8-10 साल बड़े दोस्त उन्हें समझाया भी करते पर उनके कारण संभा सर को सिगरेट पीने जैसी बुरी आदतें भी लग जाती थी। 

     जब वह दसवी में थे तब भी एक बार उन्होंने आत्महत्या करने का कदम उठाने की कगार पर थे। हुआ यह था, कि तब दोस्तों के बहकावे में आकर उन्होंने एक लड़की के नाम चिट्ठी लिख डाली। जब यह बात शिक्षकों तक पहुँची तब उनकी बहुत पिटाई हुई और उन्हें स्कूल से निष्काषित भी कर दिया गया। यह बात उन्होंने दादा- दादी से छुपाकर रखी थी। स्कूल के वक़्त में वह गाँव में अकेले ही किसी जगह बैठे रहते या अपने से उम्र में बड़े अपने उन दोस्तों के संग ठहरते। घरवालों को लगता कि स्कूल में गए हैं और स्कूल में सब सोचते कि घरपे ठहरे हैं। उस वक़्त उनपे मानसिक तनाव ने तो जैसे हल्ला बोल दिया था। एक तरफ माँ की स्मृतियाँ, दुसरी तरफ सबकी निष्ठुर कृतियाँ और सामने कही दूर भविष्य की धुंधली आकृतियाँ; इन सबमे संभा सर का मानसिक और भावनिक संघर्ष चलता रहता। उपर से हररोज की रोटी के लिए हररोज जो पापड़ बेलने पड़ते वह तो एक अलग ही समस्या थी। सभी की जिंदगी में कोई ना कोई समस्या होती ही हैं जिससे लड़ने की सोचो भी तो दिल बेबस हो जाए। मगर ऐसी ढेरों समस्याए किसी एक ही इंसान को सताने लगेगी तो उसे अपनी अँधेरे जीवन में उम्मीद का सूरज भला कैसे दिखेगा! संभा सर का हाल भी कुछ ऐसा ही था। तब उन्होंने खेती में प्रयोग किइ जानेवाली कोई औषधि खाकर जब जान देने की कोशिश की, उनके एक चचेरे भाई ने उन्हें रोक लिया और समझाया। फिर उनके बड़े दोस्तों ने स्कूल में बात करी और संभा सर को स्कूल में आने की इजाजत देने की याचना किई। मिन्नतों बाद स्कूल वाले मान गए और संभा सर फिरसे स्कूल जाने लगे। 



    संभा सर ज़िन्दगी के साथ साथ मैदान के भी एक बेहतरीन खिलाडी हैं। कुश्ती, घुडासवारी जैसे खेल तो वह बचपन से ही खेलते थे; मगर, सातवी कक्षा से वह और भी भिन्न- भिन्न प्रकार के खेल खेलने लगे, जैसे कि ज्युदो, कराटे, किक- बॉक्सिंग, ॲथलेटिक्स, ताए- क्वॉन- दो, कबड्डी, आदि। खेल में उनकी हमेशा से ही रुचि लक्षणीय थी। एक खिलाडी के लिए अच्छी तालिम के साथ अच्छा आहार होना भी जरूरी होता हैं; मगर,घर की आर्थिक स्थिती इतनी बिकट थी कि बाँसी रोटियों के टुकड़े ही उनके लिए उनका आहार थे। फिर भी बिना किसी बहाने के वह बड़ी लगन से खेलते रहे। उनके लिए उनका खेल ही उनकी जिंदगी था। कुश्ती में तो वह झंडे गाड देते थे। इस बात की यथोचित कल्पना एक घटना से किइ जा सकती हैं। हुआ यह था की एक बार उनकी कुश्ती पर बेहद खुश होकर किसीने उन्हें रोज दूध पीने के लिए एक भैंस भेट में दिई थी। संभा सर खेल की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया करते थे। उनके खेल का लाजवाब प्रदर्शन उनके लिए संपदा भी था और आपदा था। संपदा इसलिए क्यूंकि खेल के क्षेत्र में उनकी जड़े मजबूत होती जा रही थी। अहमदनगर जिले में खेल को नई ऊँचाई पर ले जाने की शुरुआत हो चुकी थी। और आपदा इसलिए क्यूंकि मन ही मन में उनको आगे बढ़ता देख अन्य प्रतियोगी तथा उनके कोच उन्हें पीछे खिचने की कोशिश किया करते। एक बार तो हद ही हो चुकी। जिलास्तरीय ज्युदो प्रतियोगिता में विजय हासिल कर राज्यस्तरीय ज्युदो प्रतियोगिताओं के लिए संभा सर का चयन हुआ था। राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में भी उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी को पछाड़ दिया था। फिर भी उन्हें खेल से बाहर कर दिया गया ; क्यूंकि उनका वह प्रतिद्वंदी हमेशा से जीतता आया था और वहा के एक कोच का चहिता भी था। इसलिए अंत में उसे ही विजयी घोषित किया गया। अब ऐसे बच्चे जो कुटिलता से आगे बढ़े हो या आगे बढाए गए हो वह क्या ही इस देश का भविष्य लिखेंगे। खेद की बात यह हैं कि, ऐसे कुटिल व्यक्ति लगभग हर क्षेत्र में थोड़ी- बहुत हद तक भरे पड़े हैं। और उनका शिकार होते हैं वह काबिल बच्चे जो किसी के सहारे बिना, एकदम सीधी भाषा में कहु तो किसी की भी चमचेगीरी किए बिना अपने दम पर आगे बढ़ रहे होते हैं। हर आगे बढ़नेवाले व्यक्ति को ऐसे अनुभवों से गुजरना पड़ता हैं। मुझे भी गुजरना पड़ा था, गुजरना पड़ता हैं और यकीनन आगे भी गुजरना पड़ेगा। पर अनुभव यह भी रहा हैं कि अगर हम उन्हें नजरंदाज कर निडरता से अपने ही अंदाज में अपने पथ पर चलते रहे तो यही वह लोग होते हैं जिनके कारण हम मानसिक रूप से इतने मजबूत हो जाते हैं कि कुछ समय बाद हमें ऐसी किसी भी घटना से हैरानी- परेशानी होना बंद हो जाता हैं।

     संभा सर के साथ भी ऐसा ही हुआ। बचपन से ही उनके आसपास ऐसे ही लोग थे जो उन्हें निचा दिखाने की कोशिश किया करते। पहले तो ऐसी बाते उन्हें बहुत चुभती थी मगर धीरे- धीरे उन्हें फर्क पड़ना बंद हो गया। किसी भी चीज से मुक्त होना कोई कृति नहीं हैं जो कुछ पलों में समाप्त हो जाएगी। बल्कि, वह एक प्रक्रिया हैं जो अपने सही समय पर पुरी हो जाती हैं। हमें जरूरत हैं बस थोड़ा धीरज रखने की और खुदको संभालने की। खेल में उतरने के बाद ऐसे कई अनुभवों ने संभा सर के व्यक्तित्व को आकार दिया। विविध प्रकार के खेलों में उन्होंने जिला, राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी कामगिरी करी; लेकिन खेल में बहुत आगे तक छलांग लगाने की काबिलियत होने के बावजूद भी वह सही कोच न मिलने के कारण ज्यादा आगे तक भले जा नहीं पाए, मगर एक अच्छा कोच बनकर उन्होंने ग्रामीण विभाग के बहुत से बच्चों को अलग- अलग खेलों की तालिम दिई। इस नेक काम की शुरुआत तब हुई जब वह दसवी कक्षा में थे। उस वक़्त उन्होंने कराटे के क्लास लेना शुरू किए। वैसे तो वह अन्य खेल भी सिखाया करते थे, लेकिन हम क्लास को 'कराटे क्लास' ही कहते थे। शायद इसलिए क्यूंकि, शुरुआती दौर में हमें martial arts में से सिर्फ कराटे ही पता था। अपनी दिशाहीन जिंदगी को एक दिशा देनेवाली घटना के तौर पर संभा सर यह बात बताते कि,' कराटे क्लास में आनेवाले उनके विद्यार्थी जब उन्हें 'सर' कह के संबोधित करने लगे तब उन्हें पहली बार उन बच्चों ने एक इज्जतदार इंसान होने का अनुभव कराया था और तब से वह अपने भविष्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से लेने लगे थे। सालों बाद उन्हें वह उम्मीदों का सूरज नजर आने लगा था। तब उनकी ज़िन्दगी का एक नया अध्याय शुरू हो चुका था। 

दसवी के बाद संभा सर ने ग्यारहवी तथा बारहवी की शिक्षा प्राप्त करने हेतु 'श्रीराम माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय, ढोर, जलगांव' यहा ग्यारहवी में 'कला' शाखा में प्रवेश लिया। इन दो सालों में उन्होंने बहुत ही संघर्ष किया। पढाई के साथ वह कराटे क्लास भी लिया करते और इतना ही नहीं बल्कि, पैसों का प्रबंध करने हेतु जो मिले वह सारे काम किया करते। तब उनके जौखेड और देड़गांव में कराटे क्लास थे। उनका कॉलेज उनकी स्थायी जगह से 8km की दूरी पर था। जौखेड का क्लास 11km और देड़गांव का क्लास 7km की दूरी पर था। जौखेड का क्लास हररोज रहता था और देड़गांव का क्लास हफ़्ते में एक दिन शनिवार को रहता था। इस तरह उनको प्रतिदिन 38km तथा शनिवार के दिन 52km का सफर तय करना पड़ता। और यह यात्रा वह सायकल से किया करते। बारिश के दिनों में उनको सफर करने में बड़ी तकलीफ़ होती थी। एक बार तो सायकल कीचड़ में बहुत बुरी तरह फंस चुकी थी और सर भी घुटनों तक कीचड़ में फंसे हुए थे। ऐसी नौबत अक्सर आया करती थी; तब जैसे तैसे करके संभा सर वहा से खुदको और अपनी सायकल को आजाद कर वापस अपनी राह पकड़ लेते। इस छोटी सी बात में जिंदगी का फलसफा छुपा हैं। जो हमें कीचड़ में जकड़कर रखती हैं ऐसी अनचाही बारिशे हम सब की ज़िंदगियों में होती रहती हैं। उस वक़्त हालात से हारकर, हालातों का बहाना कर वही फँसे रहना हैं या जिस प्रकार जमीं में बोया कोई बीज आसमान पे अपनी नजर रख उसकी ओर बढ़ता रहता हैं और अंत में एक विशाल पेड़ के रूप में राज करता हैं उस प्रकार अपनी पूरी ऊर्जा लगाकर उस दलदल से बाहर निकलकर अपनी राह में आगे बढ़ना हैं; इन दोनों विकल्पों में से हम जो चुनेंगे वही हमारी काबिलियत की परिभाषा कहलाएगा। संभा सर के हालात उनके पक्ष में भले न थे पर वह कभी हिम्मत नहीं हारे। अपनी पढ़ाई और कराटे क्लास के साथ वह खुदकी तालिम पर भी कटाक्ष से ध्यान देते। उसमें दो बातों का अलग से वर्णन करना चाहूँगी। पहली तो यह कि वह हररोज 20km की दौड़ लगाते। इस कारण सालों बाद भी उनको शारीरिक कष्ट से कोई थकान महसूस नहीं होती और वह हमेशा फुर्तिले ही होते हैं। दुसरी बात यह कि कराटे की एक एक किक का वह हजार बार अभ्यास किया करते। खेल में उनकी जड़े मजबूत होने

के पीछे उनकी सालों तक की गई अविरत मेहनत हैं। 

      

बारहवी की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के उपरांत संभा सर को आगे की शिक्षा लेने की इच्छा थी। मगर उनके पिताजी हर बार की तरह उनके रास्ते का काँटा बन उन्हें दुबारा से चुभ गए। उन्हें संभा सर का बारहवी के बाद पढ़ना मंजूर नही था। वजह कुछ खास नहीं थी बस हमेशा की तरह वह अपने बेटे पर अपना हुकूम चलाना चाहते थे। अलग रहने के बाद भी अपने निष्ठूर पिता और घरवालों ने संभा सर को बिलकुल भी बक्शा नहीं था। बचपन में उनके मन पे नजाने कितने आघात किए, और अब जवानी में उनकी आज़ादी को काबू में रखना चाह रहे थे। मगर संभा सर भी कुछ कम ज़िद्दी नहीं थे। वह भी अपने आगे पढ़ने के फैसले पर अटल रहे। तब उनके पिताजी ने उन्हें बहुत मारा और अपनी बात को पत्थर की लकीर की तरह बना दिया। पर संभा सर भी बहते पानी की तरह हैं। अपनी ही दिशा में आगे बढनेवाले। मार्ग में आनेवाली हर बाधा का तोड़ निकालकर बिना रूके हमेशा आगे बढनेवाले। अपने पिता के ऐसे बर्ताव के कारण वह घर से भागकर अहमदनगर जिले के नगर तालुके में आ पहुँचे। 

    घर से भागकर तो वह चले आए मगर वह जहा आ चुके थे वहा हज़ार नई परेशानिया उनका इंतजार कर रही थी। जिंदगी में हर किसी का हाथ छूट सकता हैं, मगर परेशानियों का साथ कभी नहीं छूटता। या यू कह ले कि, जिंदगी में किसी न किसी वजह से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कभी न कभी हर किसी का हाथ हाथों से छूट ही जाता हैं और शायद इसिलिए यह परेशानिया हमारे साथ होती हैं। सफ़र में साथ चलने के लिए न सही मगर साथ देने के लिए ही कोई सच्चा साथी साथ हो तो यह मुश्किले हमें हारने नहीं देती । अफ़सोस की बात यह हैं कि संभा सर के साथ ऐसा कोई नहीं था। अपने ख्वाबों की मायानगरी में उनका सफर एकदम तन्हा था। शायद यही वजह हैं कि आज वह हर एक मायने में एक आत्मनिर्भर व्यक्ति हैं। इस बात ने उन्हें उस समय बहुत तकलीफ पहुँचाई, मगर यही वजह हैं कि आज वह अपने दम पर आसमाँ की बुलंदियाँ छू रहे हैं। 

क्यूँकि हर एक सफ़र अकेले तय करने की हिम्मत रखने वालों के हौसले आसमाँ से भी ऊँचे और समंदर से भी गहरे होते हैं। हाँ मगर यह सफ़र आसान तो बिलकुल नहीं होता।ऐसे रास्तों पे अक्सर खुद की खुद से ही जंग होती हैं। खुद ही से हारे हैं और खुद ही से जितना हैं! 

    नगर में आने के बाद उन्होंने अपने बुआ के बेटे राजू से सम्पर्क किया। राजू ने अपने एक पहलवान दोस्त के साथ संभा सर के ठहरने की व्यवस्था किइ। संभा सर उस पहलवान के साथ एक कमरे में रहने लगे। तब एक दिन किसी कारण उन दोनों में तू- तू मैं- मैं हो गई और बात इतनी आगे बढ़ गई कि दोनों हाथापाई पर उतर आए। अब दोनों भी पहलवान थे तो कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। तब मामुली सी देहयष्टि वाले संभा सर ने उस बलशाली पहलवान को चारों खाने चित कर दिया था। संभा सर ने उस पहलवान को इतना पीटा कि वह बेहोश ही हो गया। तब संभा सर को लगा कि वह मर गया हैं और वह डर के मारे वहा से भाग गए। होश में आने पर पहलवान ने राजू को सारी हकीकत बता दि। जब राजू ने संभा सर से सवाल- जवाब किए तो उन्होंने अपनी सफाई देकर वहा से निकल जाना ही सही समझा। बाद में उस पहलवान ने संभा सर को अपनी कुश्ती की तरकीबे उसे सिखाने की विनंती किइ थी, लेकिन संभा सर ने उससे दूर रहना ही सही समझा। इस तरह से नए शहर में नई मुसीबत के साथ उनका स्वागत हो चुका था। बचपन और जवानी के दिनों में यह मारपीट तो उनके लिए किसी खेल जैसी ही थी। इस बात पे शायद यकीन ना हो लेकिन उस वक़्त उनको किसी 'डॉन' से कम नही माना जाता था। मगर यह डॉन खलनायक नहीं नायक ही था।गांव में तो उनकी ख्याति यहां तक थी की अगर कहीं कोई घोटाला हो जाए तो उनको बात संभालने के लिए बुलाया जाता था। तब गुंडागिरी की दुनिया में संभा लोंढे यह एक जाना माना नाम था। एक बार तो उनकी प्रसिद्धि सुनकर एक जगह उन्हें कुछ गुंडों से लड़ने के लिए बुलाया गया था। सब की यही कल्पना थी की यह संभा लोंढे बड़ी सुदृढ़ देहयष्टि का होगा। लेकिन जब उन्होंने संभा सर को प्रत्यक्ष आमने सामने देखा तो सबकी निगाहें कुछ आश्चर्य से तो कुछ संदेह से चौंक उठी। संभा सर ने जब अपने बलबूते पर पूरा मामला संभाल लिया तब जाकर सबको यकीन हुआ की वह ‘छोटा पैकेट और बड़ा धमाका’ थे। पर उन्होंने कोई भी लडाई कभी भी किसी का छल करने हेतू या किसी को नुकसान पहुंचाने हेतू नहीं किइ। उनकी मारपीट के किस्से तो अनगिनत थे। जब वह 12वी कक्षा में थे तब बोर्ड की परीक्षा के पूर्व गांव के मेले में कोई हंगामा हो चुका था। तब भी उन्होंने एक दोषी वकील को बुरी तरह से पीटा था। और एक बार तो नौवीं कक्षा में जब एथलेटिक्स की प्रतियोगिताओं के लिए वह भेंडा गांव में गए थे तब वहां पर किसी ने उनकी टीम के किसी खिलाड़ी के साथ दुर्व्यवहार किया तो उन्होंने उस लड़के को भी बहुत पीटा। दूसरों की मदद करने के लिए लोगों से मारपीट करने का उनका स्वभाव उन्होंने बचपन में चोरी-छिपे देखे हुए उन फिल्मों का प्रतिबिंब था जिनमें कोई हीरो निर्दोष लोगों को बचाने के लिए गुंडों से लड़ता था।

    नए शहर में भी उनका सफरनामा मारपीट से ही शुरू हुआ। उसके बाद वह जगह छोड़कर उन्होंने अपना ठिकाना कहीं और लगा लिया। 2005 इस शैक्षणिक वर्ष में उन्होंने अहमदनगर कॉलेज में प्रथम वर्ष की पढ़ाई के लिए अपना प्रवेश निश्चित किया और एक नई राह पर अपने कदमों को मोड़ दिया। उनका महाविद्यालयीन जीवन बड़ा ही मजेदार और साथ ही साथ तनावपूर्ण भी रहा हैं। किस प्रकार उनको एक के बाद एक कॉलेज बदलना पड़ा था इसके पीछे की कहानी बड़ी रोचक हैं।

       संभा सर का स्वभाव था ही ऐसा कि कोई भी उनसे प्रभावित हो जाए। उन्होंने ने नगर के ' न्यू आर्ट्स' कॉलेज में B.A के लिए admission लिया। वहा के एक प्रोफेसर की बेटी भी उसी कॉलेज में पढ़ती थी। उसे शुरुआत में तो संभा सर से नफरत थी लेकीन जैसे जैसे वह संभा सर को जानने लगी, धीरे धीरे यह नफरत प्यार में ढलती गई। उस लड़की को यह यकीन तो हो चुका था कि वह संभा सर पे भरोसा रख सकती हैं। इसलिए उसने संभा सर से अपने मन की बात कह दी। वह सुनकर संभा सर को कुछ खास खुशी नहीं हुई, क्यूंकि उन्हें अपने हालात मालूम थे। वह जैसे भी थे मगर हमेशा से एक सच्चे इंसान थे। अपने संघर्ष को किसी और का संघर्ष बनाना उनको बिलकुल मंजूर नहीं था। और तब उनकी जिंदगी इतने अंधेरे में थी कि वह यह तक उम्मीद नहीं रख सकते थे शायद भविष्य में नजारे कुछ बदल जाए। ऐसे वक्त में अक्सर कठोर हालातों के सामने दिल की नज़ाकत को अनदेखा करना पड़ता है।  

ऐसे में लड़कियों के झमेले में फसना उनके लिए मुनासिब नहीं था, इसलिए वह उस लडकी से कोई भी झूठा वादा किए बगैर ही वह कॉलेज छोड़कर वहा से चले गए

    नगर में 2005- 06 ईस शैक्षणिक वर्ष में उनका प्रथम वर्ष समाप्त हो चुका था। फिर आगे द्वितीय वर्ष की पढाई के लिए उन्होंने लोणी के कॉलेज में admission लिया और वहा पर तो वह एक ही महीना टिक पाए। इसके पीछे की वजह भी एक लड़की ही थी। हुआ यह था कि जब सर कॉलेज गए तो उन्होंने देखा कि एक लड़की सीढ़ियों पे बैठी अकेली ही रो रही हैं। तो सर उसके पास गए और सीधे पूछा कि "तुम क्यों रो रही हो?" अब संभा सर कॉलेज में नए थे तो उस लडकी को जानते नहीं थे। इसलिए बिना जान पहचान संभा सर का पूछताछ करना उसको दखलंदाजी लगा। तो उसने कटाक्ष में संभा सर से पूछा कि "तुम कौन पूछनेवाले?" संभा सर ठहरे एकदम भोलेभाले। उन्हें लगा कि वह कॉलेज में नए हैं तो जान पहचान के लिए पुछ रही हैं। तो वह एक सांस में ही शुरू हो गए, "मेरा नाम संभाजी लोंढे हैं। मैं BA के द्वितीय वर्ष की पढ़ाई के लिए यहां आया हूं, मैं माका गांव से हूं... और बोलते ही रह गए।" उनकी ऐसी बचकानी बातों पर और भोलेपन पर वह कुछ देर पहले रोती हुई लड़की जोर जोर से हसने लगी। यह सुनकर तो मुझे भी आश्चर्य हुआ कि आज जो इन्सान बातें करने में इतना होशियार हैं वह एक वक्त में बच्चे जैसा भोला था। सच हैं कि जिंदगी के सितम रूई जैसे मुलायम मन वाले इंसान को भी सुई की नोक जैसा तीक्ष्ण बना देते हैं। ईस लड़की ने संभा सर में एक अच्छा इंसान देखा और उनसे दोस्ती करली। कुछ दिनों में ही उसके मन में संभा सर के लिए एक खास जगह बन चुकी थी। उसको संभा सर में अपने जीवनसाथी की परछाई दिखने लगी। जैसे ही उसने संभा सर से यह बात कही उनको पता था कि अब उन्हें क्या करना है। उन्होंने उसकी बात तो सुनली और उससे भी कोई वादा किए बगैर एक महीने में ही कॉलेज छोड़ दिया और चल पड़े कही और अपना admission करवाने।

    उनके यह फैसले सही थे या गलत पता नहीं लेकीन उनका इनके पीछे का उद्देश्य बिलकुल सही था। वह बस किसी को भी अंधेरे में नहीं रखना चाहते थे। ना उन लड़कियों को और ना खुदको। हड़बड़ाहट में इंसान अक्सर सही गलत तय नहीं कर पाता मगर उद्देश्य गर सही हो तो तो बादमें पछतावा कुछ कम होता हैं। लोणी के बाद संभा सर ने शेवगांव के कॉलेज में 2006 में द्वितीय वर्ष के लिए admission लिया। मगर यहां भी उनकी शिक्षा सरलता से पूर्ण नहीं हो पाई। उसी कॉलेज में पढ़नेवाली एक लड़की को संभा सर भा गए। लड़कियों को संभा सर भरोसेमंद प्रतीत होते, इसलिए शायद वह मन की बात कह देने में कतराती नहीं थी। ईस लड़की ने भी अपने प्यार का इज़हार कर ही दिया। अब तो संभा सर ईस सबसे तंग आ चुके थे। अपनी मजबूरियों के कारण वह किसी लड़की के चक्कर में नहीं पड़ना चाहते थे लेकिन अब तक उन्हें यह बात तो समझ में आ चुकी थी कि कॉलेज बदलते रहने से ईस समस्या का समाधान नहीं मिलने वाला। इसलिए ईस बार उन्होंने कॉलेज तो नहीं बदला मगर उस लड़की का graduation पूरा होने तक कॉलेज नहीं गए। बाद में उन्होंने उसी कॉलेज से 2010 मे अपना graduation पूरा कर लिया। ईस तरह 3 साल की डिग्री उन्होंने 5 सालों में प्राप्त कर ली।

     इन लड़कियों के अलावा संभा सर के कॉलेज के दिनों की बात करे तो वह जिस भी कॉलेज में जाते थे वहा के प्रोफेसर लोग उनसे परेशान हो जाते। उनकी नजर में संभा सर कॉलेज में सिर्फ time pass के लिए आनेवालों में से थे। मगर कुछ लोगों की परखती नज़र उनके अंदर की काबिलियत को हेर लेती थी। कटाक्ष में ही सही लेकिन कुछ professor उनकी सराहना भी करते थे। उन्हें समझाते भी थे। 

  अपने ग्रेजुएशन के सालों के दरमिया वह अपने अंदर के एक कलाकार को उभरने का मौका दे रहे थे। उन्हें स्कूल के दिनों से ही लिखने का बहुत शौक था। दोस्तों से बाते करते वक्त वह बोलते बोलते एकसरीखे शब्दों की सलीके से रचना कर किसी भी बात पे कविता बना देते। तभी से उनकी एक कवि बनने की शुरुआत हो गई थी। बादमें उन्होंने मराठी साहित्य में अपनी लेखक के तौर पर एक पहचान बनाई। ग्रेजुएशन के दौरान उन्होंने चित्रपट कथाए लिखी थी जिनमें से ' परतीचा प्रवास' नामक मराठी शॉर्टफिल्म को राज्यस्तर पर प्रथम क्रमांक मिल चुका था। वह अच्छा लिखते भी थे और उनको फिल्मों में अभिनय करने का भी शौक था। लेकिन उनको फिल्मे बनाने में एक अच्छी टीम न होने के कारण कुछ खास तरक्की नहीं मिल पाई । उन्होंने लिखी ' गड़ाची वारी' ईस फिल्म की स्क्रिप्ट ही चोरी हो गई थी। ' प्रवास ' नामक एक फिल्म बनाते वक्त उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर 35,00,000 रूपये का भांडवल इकट्ठा किया था लेकिन उन लोगों ने संभा सर को धोखा दे दिया और खुद पैसे लेकर फरार हो गए। उनके बहुत से काम इसी कारण अड़ गए कि उनको अपने पक्ष में अच्छे लोगों का

साथ नहीं मिला। 

    शेवगाव के कॉलेज में उनकी एक व्यक्ति विशेष से मुलाकात हुई जो उनकी ज़िंदगी के बेहद खास और महत्वपूर्ण लोगों में से एक हैं। उन्हें संभा सर 'थोरात सर ' कह के संबोधित करते हैं।वह संभा सर के senior थे। थोरात सर ने संभा सर को हमेशा से अपने छोटे भाई की तरह ही प्यार किया। उन्होंने संभा सर को न जाने कितनी बार और न जाने कितने पैसों की मदद कि लेकिन कभी भी एक रुपए की भी मांग नहीं किई। खुद के हिस्से की रोटी तक उनको खिलाते थे। हमेशा उनको अच्छी बातें सिखाते और प्रेरित करते। संभा सर के साथ उनका कोई खून का रिश्ता ना होने के बावजूद भी संभा सर को उनसे बेहतर कोई नहीं समझता। थोरात सर की मां ने संभा सर के बारे में बहुत गलत सलत बातें सुनी थी, इसलिए वह हमेशा उनको संभा सर के साथ रहने से मना करती थी। लेकिन जब उनके ध्यान में आया कि खुद एक मुश्किलों भरी जिंदगी जीते हुए भी संभा सर हमेशा दूसरों के भले के बारे में सोचते हैं और गरीबों की मदद करते हैं, उनके लिए लड़ते भी हैं। तब उन्हें एहसास हुआ कि संभा सर दिल के बहुत अच्छे हैं। तबसे वह भी उन्हें बहुत प्यार करती। 

       7 मार्च 2010 को मन में आशाओं के बुझे दीप दुबारा प्रज्जवलित कर एमपीएससी परीक्षा की तैयारी के लिए राहुरी के महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ में कदम रखा। खुद यही की रहिवासी होने के कारण मुझे ज्ञात हैं कि तब भी और आज भी यहा बहुत से बच्चे लोकसेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी करते हैं। इसके पीछे की मूल वजह हैं यहाँ का शैक्षणिक रूप से परिपूर्ण माहौल। पढ़ाई की बात करे तो संभा सर बचपन से ही बहुत काबिल छात्र रहे हैं और किसी भी निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने का हौसला भी उनमें हैं। इसलिए यह परीक्षा सफलतापूर्वक पार कर जाना उनके लिए बिल्कुल भी नामुमकिन नहीं था। विद्यापीठ में आने के बाद उनके एक मामा ने शेतकरी निवास में उनके रहने की व्यवस्था किई। शेतकरी निवास बाहर के प्रांत से विद्यापीठ को भेंट देने हेतु आनेवाले यात्रियों को निवास की सुविधा प्रदान करता हैं। बाद में जान पहचान के जरिए उनकी विद्यापीठ के कैंपस में किराये पर रहने की सुविधा हो गई। 

    पढ़ाई के साथ उनके ब्राम्हणी और वांबोरी में कराटे क्लास भी शुरू थे। अच्छे कोच ना मिलने के कारण या मार्गदर्शक के तौर पर मार्ग भटकानेवाले लोग मिलने के कारण संभा सर में काबिलियत होने के बाद भी उनका खेल में भवितव्य अधूरा ही रह गया। मगर अन्य बच्चों को प्रशिक्षण देकर उन्होंने उनका भवितव्य उजागर कर दिया। संभा सर पढ़ते तो थे मगर कुछ पारिवारिक कारणों के कारण उनकी पढाई में नियमितता का अभाव था। कभी किसी चीज को लेकर घरवालों के साथ झगड़े हो जाते तो कभी बहनों पे ससुराल में जुल्म होते तो उनके ससुरालवालों से भी झगड़े हो जाते। कभी-कभी यह झगड़े हाथापाई का रूप धारण करते थे। संभा सर अपने भावना प्रधान स्वभाव के कारण इन सब बातों को नजरअंदाज कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगा पाते थे। फिर भी मेहनती होने के कारण उनको सफलता मिलती तो थी लेकिन कभी वह डॉक्यूमेंट वेरीफिकेशन में फेल हो जाते तो कभी उनसे डोनेशन मांगा जाता जिसकी पूर्तता नहीं कर पाने के कारण उनका परीक्षा में चयन होने के बाद भी उनको अपना अधिकार नहीं मिल पाया। बार-बार इस प्रकार असफल होने के बाद लोक सेवा आयोग की परीक्षा पर से उनका मन उठ गया। अब वह अपने कराटे क्लास पर ही ध्यान देते थे। कराटे क्लास के सभी बच्चों के वह चहीते थे। कराटे, ज्यूडो, ताए क्वान दो जैसे खेल वह सिखाया करते थे। बच्चों के लिए वह खुद भी बहुत मेहनत करते थे। वह उन बहुत चुनिंदा लोगों में शामिल हैं जो अपने काम को सिर्फ पैसे कमाने का जरिया नहीं समझते बल्कि अपने कर्म से दूसरों के जीवन में सुखद परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं और उसी में उन्हें सुकून और खुशी मिलती हैं । केवल पैसों के पीछे भागनेवाले लोग कभी भी स्थायी रूप से खुश नहीं रह पाते; क्यूंकि उस खुशी में सुकून नहीं सिर्फ सुरूर हैं। संभा सर अपनी जिंदगी से तो कुछ नाराज और कुछ हैरान थे, मगर उनका यह काम उन्हें सुकून और खुशी दोनों देता था।

     अब तक संभा सर की शादी की उमर हो चुकी थी। उनकी दादी बार बार उनसे अपना घर बसा लेने के लिए कहती रहती। दादा दादी की उनके जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं। संभा सर अक्सर कहते हैं कि अगर दादा दादी ने उनकी जिम्मेदारी नहीं ली होती, तो आज भी वह गुंडागर्दी ही कर रहे होते। दादा दादी को अब बस संभा सर की शादी देखनी थी। संभा सर एक नेक और काबिल इंसान थे इसलिए उनको किसी ने नापसंद करने का कोई सवाल ही नहीं था। फिर भी कुछ ना कुछ कारण से उनका बना बनाया रिश्ता टूट ही जाता था। जब वह पढ़ाई कर रहे थे तो उनके चचेरे मामा ने उनके समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि, “अगर तुम्हें नौकरी मिल जाती हैं तो मैं अपनी बेटी की शादी तुमसे कराऊंगा।” कुछ दिनों बाद संभा सर की एरिगेशन में नौकरी निश्चित ही हो गई थी, लेकिन डॉक्युमेंट वेरीफिकेशन में उनको रिजेक्ट किया गया। तब तय हो चुकी शादी मामाजी ने तोड़ दी, क्यूंकि संभा सर की नौकरी हाथ से निकल चुकी थी। फिर उन्होंने अपनी बेटी की शादी संभा सर की एक मौसी के बेटे से करा दी जिसकी नौकरी लग चुकी थी। ब्राम्हणी में संभा सर के पहचान की एक लड़की थी जो उन्हें पसंद करती थी। उसने संभा सर को अपने दिल की बात बता दी और संभा सर ने भी हां कर दी। मगर कुछ समय बाद उसी ने रिश्ते से इंकार कर दिया क्यूंकि उसे लगा था कि संभा सर को नौकरी मिल जाएगी फिर वह शादी करेंगे। पर संभा सर को नौकरी मिल नहीं पाई। ताजुब की बात यह हैं कि बाद में उस लड़की ने पता नहीं क्या सोचा और वह संभा सर को धमकी भरे कॉल करने लगी और ब्लैकमिल करने लगी। संभा सर ने उससे संपर्क तोड़ दिया और इस मुसीबत से पीछा छुड़ा लिया। और एक लड़की थी श्रीरामपुर की। वह संभा सर को सच्चे मन से चाहती थी। संभा सर की सीरत उसे भा गई थी। संभा सर ने भी उसे पसंद कर लिया था। अब बात यह थी कि, वह लड़की अलग जाती की थी। फिर भी उसके घरवालों को ऐतराज नहीं था क्यूंकि लड़ता हीरे जैसा था। संभा सर ने भी दादा दादी से बात कर ली थी। शादी की तारीख तक तय हो चुकी थी लेकिन लड़की के रिश्तेदारों में से किसी ने संभा सर उनकी जाती के बाहर होने के कारण शादी को लेकर आपत्ति जताई। संभा सर तब भावनाओं के शिकार हो जानेवालों में से थे। वह नहीं चाहते थे कि उनकी खुशी किसी और के दुःख की वजह साबित हो। इसलिए लडकी को और उसके मातापिता को रिश्ता मंजूर होने के बाद भी संभा सर ने वह रिश्ता तोड़ दिया। रिश्ता तोड़कर उन्हें ऐसा लगा कि उन्होने किसी का दुःख मिटा दिया। पर वास्तव में यह उनका वहम था। क्यूंकि उन्होंने लडकी के प्रगतिहीन विचार रखनेवाले रिश्तेदारों को खुश करने के लिए उस लड़की की, उसके मातापिता की और अपने आप की भी खुशियां त्याग दी। वह लडकी जो उनसे प्यार करती थी, उसने कुछ साल तो शादी ही नहीं किई। फिर धीरे धीरे खुदको संभाला और घरवालों के समझाने पर किसी और से शादी कर ली जो उनकी जाती का था। हम जिंदगी की किसी भी स्थिति में हर किसी को खुश नहीं रख सकते; क्यूंकि हर इंसान अपनी अपनी समझ के हिसाब से सोचता हैं और अपने तरीके से जीता हैं। अब ऐसे में भला कैसे कोई हर किसी को किसी एक निर्णय से संतुष्ट कर पाएगा! ऐसी स्थिति में अपनी भावनिक और वैचारिक बुद्धिमत्ता से हमें सही निर्णय लेना पड़ता हैं। सिर्फ भावनाओं के आदि होकर गर निर्णय लिया जाए तो अक्सर हमारा यह ‘सही’ गलत हो जाता हैं। 

    नौकरी और छोकरी इन दोनों मामलों में संभा सर की किस्मत एक जैसी ही थी। दोनों हाथ में तो आती थी मगर पकड़ में नहीं। किसी न किसी वजह से बनी बनाई बात बिगड़ जाती थी। दादी के जीते जी संभा सर की शादी हो नहीं पाई और दादी की यह ईच्छा अधुरी ही रह गई। 2014 में दादी ने बुढ़ापे के कारण अपनी सांसे त्याग दी। मां के बाद दादी ही थी जिनके आंचल की छाव तले संभा सर को सुकून मिलता था। मगर अब उनसे उनका यह सुकून हमेशा के लिए छीन चुका था।

       मेरे पापा और संभा सर अच्छे दोस्त थे और संभा सर हमारे रिश्तेदार भी थे। पापा ने उनको विद्यापीठ में कराटे क्लास शुरू कराने का सुझाव दिया। संभा सर जहा किराये पर रहते थे उसके ठीक सामने ही हमारा स्कूल था। पापा के कहने पर संभा सर ने स्कूल की इजाजत लेकर स्कूल के मैदान पर कराटे क्लास शुरू कराने का तय किया।विद्यापीठ में कराटे क्लास शुरू करने से पहले विज्ञापन के तौर पर विद्यालय में ब्राम्हणी के क्लास के विद्यार्थियों द्वारा एक शानदार प्रात्यक्षिक सादर किया गया था। उनकी अद्भुत कुशलता देख यह बात तो जायज थी कि उनको प्रशिक्षित करने वाला खुद बेशक कोई बेहतरीन खिलाड़ी होगा। 6 सितंबर 2016 को हमारे क्लास शुरू हुए। 5 बजे जब स्कूल की छुट्टी हो जाती थी तब हमारे क्लास शुरू होते थे। शुरुआत में एक घंटा और फिर धीरे-धीरे दो ढाई घंटे तक हमारा क्लास चलता था। छुट्टी के दिन और भी अतिरिक्त समय तक चलता, और कभी कभी तो हम लोग पूरा दिन मैदान में ही होते थे। थकान तो होती थी मगर आनंद भी बहुत आता था। संभा सर अपनी सकारात्मक ऊर्जा से अपने आसपास का माहौल एकदम उल्लासपूर्ण कर देते थे। विद्यापीठ के क्लास में भी संभा सर को बहुत काबिल बच्चे मिले। संभा सर ने क्लास में ऐसा वातावरण निर्माण किया था कि हमारा क्लास एक परिवार ही बन चुका था। संभा सर की वजह से पढ़ाई के साथ साथ अब खेल में भी स्कूल की पहचान बनती जा रही थी। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के समारोह पर हमारे क्लास के खिलाड़ियों द्वारा विद्यालय में कराटे का तथा लाठीकाठी का प्रात्यक्षिक सादर किया जाता था। संभा सर की खास बात यह थी कि तरह तरह के खेलों का प्रशिक्षण देने के बाद भी वह बदले में बहुत कम रकम आँकते थे और जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी उनको मोफत में प्रशिक्षण दिया करते थे। और यहीं वजह थी कि उनके जगह जगह पर क्लास थे फिर भी वह खुद आर्थिक रूप से स्तब्ध नहीं थे। उन्होने अपनी ज़िंदगी में ऐसे दिन देखे हैं जब उन्हें एक निवाले की रोटी के लिए और एक बूंद पानी के लिए न जाने क्या क्या कष्ट उठाने पड़ते थे। इसलिए वह आर्थिक मामलों में संवेदनशीलता से पेशाते थे। मगर पैसों से बढ़कर गर उनको कोई चीज मिलती थी तो वह था बच्चों का प्यार। ब्राम्हणी हो, वांबोरी हो, सोनई हो, राहुरी हो या विद्यापीठ; हर जगह उन्हें उनके विद्यार्थियों से प्यार और सम्मान मिला। वह सारी जगहें जहा वह अपनी विद्यार्थी दशा में क्लास लेते थे वहा पर भी वह अपने विद्यार्थियों के लाड़ले थे। गौर करने की बात यह हैं कि उनके कुछ विद्यार्थी उम्र में उनसे बड़े थे फिर भी वह उनको गुरु का दर्जा देते थे। हम सबको संभा सर से एक अनोखा लगाव हो चुका था। वह हमारी जिंदगी का एक हिस्सा बन चुके थे। संभा सर पुरी आत्मीयता से अपना काम करते थे। इसलिए उनमें और बाकी प्रशिक्षकों में यह अंतर था कि, बाकी लोग जिस मैदान पर प्रशिक्षण देते हैं वह खेल का मैदान हैं और संभा सर जिस मैदान पर प्रशिक्षण देते थे वह ज़िंदगी का मैदान था। उन्होंने अप्रत्यक्ष रुप से हम लोगों पर बहुत ही मौल्यवान संस्कार किए। वह हमारे लिए मातापिता के बाद सबसे पहले ऐसे शख्स थे जिनपर हम भरोसा रख सकते थे। यहां तक कि बच्चे अपनी वैयक्तिक जीवन की समस्याएं भी उनको बताते थे और संभा सर उन्हें हल भी कर देते थे। उनके व्यक्तित्व के ईस विशेष को अगर पंक्तिबद्ध करू तो मन कहता हैं कि, 

“हम दुनिया की उलझनों को सुलझाते रहें

 और खुद की फरियादों को खुद समझाते रहे

अंधेरे में रोशनी भर दी और खिल गई सब कलियां

उजाले की चमक में भी खुद मगर मुरझाते रहे"


   वह खुद तो दूसरों की मुश्किलों में उनका आधारस्तम्भ बनते मगर अपनी ज़िंदगी में वह एकदम अकेले थे। उनका मजाकिया मिजाज सबको बहुत हंसाता मगर उनकी अपनी मुस्कुराहट सिर्फ एक मुखौटा थी। वह हमेशा सबको हंसाते रहते, इसलिए सबके मन में उनकी छवी एक खुशमिजाज इंसान की थी मगर उनके मन की तकलीफ से सब बेखबर थे। समुद्र जितना भी गहरा हो, पर कभी न कभी उसके पृष्ठ पे कही न कही उसके तल का प्रतिबिंब दिख ही जाता हैं। मुझे आज भी याद हैं जब संभा सर के मन का वह तल मैंने साफ साफ देखा था। यह तब की बात हैं जब हमारे क्लास शुरु थे। गरमी के दिन थे इसलिए सर स्कूल के बगीचे के आवार में क्लास ले रहे थे। प्रैक्टिस हो जाने के बाद हम कुछ जन सर के साथ कुछ देर वही पेड़ के नीचे बैठे थे। संभा सर अक्सर ईस तरह हमारे साथ बैठकर हमसे हमारी पढ़ाई, स्कूल, तबियत, खेल, आदि के बारे में बाते किया करते। उस दिन भी कुछ ऐसी ही बातें चल रही थी जो बातों बातों में जिंदगी की तरफ़ मुड़ती गई और एक खामोशी के बाद अचानक संभा सर ने हमसे एक सवाल पूछा की, "मान लो तुम अपने रास्ते पर चलते चलते अंजाने में किसी अंजान जंगल में आ चुके हो और जब तुम्हें ईस बात का इल्म हुआ तब बहुत देर हो चुकी हो; घनेरे जंगल में चारों तरफ घना अंधेरा , सूरज की एक किरण तक वहा पहुंच न सकती हो और बाहर जाने का कोई भी रास्ता नहीं हों, बल्कि जितना रस्ता ढूंढने की कोशिश करो उतना भटकते जाओ। कहा से आए हो यह याद नहीं और कहा जाना हैं यह पता नहीं। तब तुम क्या करोगे?" उनके ईस सवाल से हम खुद ही सवाल में पड़ गए। मुझे आज भी याद हैं कि यह शब्द कहते वक्त उनकी आंखों की गहराई में भी एक अंधेरा सा छा गया था। उस वक्त मैं कुछ नहीं पाई मगर मेरे पास ईस सवाल का एक ही जवाब हैं; कि अगर हर मुमकिन - नामुमकिन कोशिश के बाद भी रास्ता ना मिले तो उस जंगल को ही अपनी उपस्थिति से एक प्रेक्षणीय स्थल में तबदील कर दो जिस पर से दुनिया की नजरे हटे ही ना। संभा सर के साथ भी यही हुआ। उन्होने जब अपने हालात बदलने की नाकाम कोशिशें छोड़कर अपने आप को बदलना चाहा तब उनका यह जंगल एक गुलशन बन गया जो खुद भी महका हैं और अपने इर्द गिर्द भी सुगंध फैलाता हैं। आज यह गुलशन उस जंगल का ऋणी हैं जिसके वजूद से प्रेरणा लेकर यह आकार में आया हैं। कहते हैं ना कि "जब भगवान आपकी परिस्थिती नहीं बदलना चाहता तब वह आपकी मनस्थिति को बदलना चाहता हैं।" अब ऐसे में अपने हालात बदलने का निरर्थक प्रयास करेंगे तो अपने नसीब को ही कोसते रह जाएंगे। और अगर भगवान की दिशा को समझकर खुदमे सुधार लाएंगे तो बाद में उन्हीं हालातों के शुक्रगुजार रहेंगे जिन्होंने आज हमें बेहाल कर रखा हैं। संभा सर की ज़िंदगी में पुराने शिकवे तो कायम हैं मगर उस सब के पीछे के मतलब अब नए हैं। इस वजह से कभी जो दर्द उनको सजा लगते थे आज वह ईनायत लगते हैं। 

       हमारी पाठशाला के आगे ही ' सावित्रीबाई फूले इंग्लिश मीडियम' नामक एक विद्यालय हैं। जून 2018 में संभा सर को क्रीडाशिक्षक का पदभार संभालने हेतु इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था। तब सर हमारे साथ बॉक्सिंग की प्रतियोगिताओं के लिए ठाणे में थे। इंटरव्यू के लिए कॉल आने पर उनको तुरंत ही निकलना पड़ा था। इंटरव्यू सफलतापूर्वक समाप्त हुआ और उनकी वहा क्रीड़ा शिक्षक के पद पर नियुक्ति हो गई। साल 2018 से 2021 तक वह ईस विद्यालय में कार्यरत थे। इन तीन सालों में वह अपने काम से विद्यालय में उल्लेखनीय परिवर्तन ले आए। अब पढ़ाई के साथ खेल के क्षेत्र में भी वहा के बच्चे आगे बढ़ते नजर आ रहे थे। उन्होंने स्कूल में martial arts के साथ एथलेटिक्स, कबड्डी, खो - खो जैसे खेल शुरु किए और स्कूल के छात्रों को अपना भविष्य बनाने का और एक मार्ग उपलब्ध करके दिया। मेरी मानो तो ' खेल सिर्फ भविष्य नहीं बल्कि जिंदगी बनाता है'। ईस बात का अनुभव मैंने वैयक्तिक रूप से किया हैं। संभा सर ने एक खिलाड़ी के रूप में अपनी ज़िंदगी भी सवारी और एक प्रशिक्षक के रूप में हम सबकी जिंदगी को भी एक नई राह और एक नई मंजिल दे दी। ' बच्चे सुनीसुनाई समझदारी की बातों से ज्यादा कोई भी चीज कृति देखकर सीखते हैं' ; ईस बात का ध्यान रखते हुए संभा सर कोई भी अनुशासन बच्चों को सिखाने से पहले खुद उसका पालन करते थे। जैसे कि, हमने हमारे नाखून काटे हैं या नहीं यह देखने से पहले उनके नाखून हमेशा कटे हुए रहते थे। ' कोई भी काम छोटा नहीं होता ' यह ज्ञान बच्चों को देने से पहले वह खुद उस बात का उदाहरण बनते। जैसे कि, स्कूल में अध्यापन के कार्य के साथ वह पौधों को पानी दिया करते और स्कूल की सफाई में भी ध्यान देते। उनकी सबसे खास बात जिसका आज वह जिस मुकाम तक हैं वहा तक पहुंचने में बहुत बड़ा योगदान रहा है और निसंदेह आगे भी रहेगा वह यह है कि, वह जो भी काम करते हैं उसे पूरी शिद्दत के साथ करते हैं ; ना कि यह सोच कर कि उस काम के बदले में उन्हें क्या और कितना मिलेगा। यह एक आने के एक करोड़ कर देने वाली खूबी उन्हें जीवन में बहुत आगे ले आई है।

     हर सफल व्यक्ति के जीवन में कभी ना कभी ऐसा दौर आता ही है जब सारी दुनिया उसे अपना निशाना बनाते हुए उस पर तानों की बौछार कर देती है। वैसे देखा जाए तो यह बात सही भी है क्योंकि पेड़ को अगर अपने आप को हराभरा और रूपवान बनाना है तो उसे खुद को धूप में से सेकना ही पड़ेगा। ऐसे लोग जो अपने आप में कड़वे शब्दों की एक अप्रकाशित किताब होते हैं, वह किसी के बुरे समय में एक एक कर कुछ इस तरह अपना प्रकाशन जारी करने पर तुले हुए होते हैं जैसे कि उन्हें इसी का इंतजार था और यही उनका काम है। अपनी बेटी जिंदगी की तरह इस स्कूल में भी संभा सर को ऐसे कलाकारी लहजे वाले बहुत लोग मिले। वहा के मुख्याध्यापक आदरणीय मेहरे सर जो पहले हमारे स्कूल में अंग्रेजी विषय के अध्यापक रह चुके हैं और एक बेहतरीन शिक्षक हैं, उन्हें संभा सर के काम करने का तरीका बहुत भाता था और संभा सर बच्चों के साथ साथ उनके भी सबसे चहीते अध्यापक थे। यह बात वहा के कुछ दूसरे शिक्षकों को हज़म नहीं होती थी। वह लोग संभा सर को नीचा दिखाने का एक मौका नहीं गवाते थे। जब संभा सर पौधों को पानी देते तब उन्हें माली आपस में माली कह के उनका मजाक उड़ाते। हमारे स्कूल के भी कुछ मोफट बच्चे ' आप यहा माली का काम करते हैं क्या?' ऐसे सवाल कर उनके मजे लेते थे। जब संभा सर बच्चों को लेझीम सिखाते तब उनके सहकर्मी उनको ' नाचनेवाला ' कहकर उनको बेईज्जत करने की कोशिश करते। एक बार तो हद ही हो चुकी। स्कूल में जब एक बार पैरेंट्स मीटिंग थी तब कुछ शिक्षकों ने अपने पहचान के कुछ पैरेंट्स को संभा सर के बारे में गलत जानकारी देकर संभा सर के खिलाफ बोलने को कह दिया। तब एक मोहतरमा मीटिंग शुरु होने से पहले संभा सर से जब मिली तब उनके साथ बहुत अच्छे से पेशा रही थी और उनके काम की तारीफ भी कर रही थी। तब उनको इतना ही पता था कि यह क्रीड़ा शिक्षक हैं। यह वह दिन थे जब संभा सर को स्कूल में आए कुछ ही दिन हुए थे। इसलिए इन्हीं का नाम संभाजी लोंढे हैं ईस बात की उन्हें कानोकान खबर नहीं थीं। मीटिंग हॉल के बाहर तो उन्होंने संभा सर से हंसी खुशी बात की लेकिन मीटिंग शुरू होते ही जब मुख्याध्यापक ने पेरेंट्स को अध्यापकों के काम पर अपना मत प्रदर्शित करने को कहा तब उन्होंने संभा सर के बारे में बहुत भला बुरा कहा। उनके काम को लेकर अप्रसन्नता जताई। अपने बारे में ऐसी बातें सुनकर और वह भी उस व्यक्ति से जिसने 2 मिनट पहले ही उनकी तारीफ की थी संभा सर आश्चर्य में पड़ गए। अपनी सफाई पेश करने के लिए कहे जाने पर जब संभा सर खड़े होकर अपनी बात रखने लगे तब उस स्त्री को पता चला कि कुछ देर पहले वह जिनकी तारीफों के पुल बांध रही थी वह वही शख्स हैं जिन्हें अभी अभी उसने बेइज्जत करने की कोशिश की हैं। बाद में सच पता चला कि, स्कूल के ही किसी शिक्षक ने यह सब करवाया था। स्कूल के यह शिक्षक संभा सर को नीचा दिखाने का प्रयास तो करते मगर संभा सर ठोकर खाकर पर्वत के तले सहारा मांगनेवालों में से नहीं बल्कि उसके शिखर पर नजर रखनेवालों में से हैं यह बात वह लोग समझ ही नहीं पाए और अपनी ईर्ष्या के कारण खुद ही नीचे गिरते रहे। स्कूल के शिक्षकों का दो संघों में बटवारा हो चुका था। संभा सर के पक्ष में रहनेवाले और संभा सर के लिए मन में ईर्ष्या रखनेवाले। पहले संघ में तो 2 - 4 जन ही थे; बाकी सभी को संभा सर की लोकप्रियता से दिक्कत थी। 

    ईस स्कूल में सेवा प्रदान करते समय संभा सर को ज़िंदगी के बहुत किमती अनुभव और अपने छात्रों के साथ कुछ ख़ास और यादगार लम्हे मिले। साथ ही साथ विद्यापीठ में उनका जो कराटे क्लास था, वहा के बच्चों के लिए उनके मन में हमेशा से ही एक खास जगह रही हैं। 

    2017 में संभा सर की शादी हो गई। बाकी शादियों की तरह इस शादी में भी कुछ कम बाधाएं नहीं आई। सर, मेरे पापा और उनके एक और दोस्त सागर सर यह तीनों अक्सर मिला करते थे। एक दिन बातों बातों में सागर सर ने संभा सर की शादी की बात छेड़ दी। पापा से कहा कि ' लोंढे सर के लिए कोई लड़की ध्यान में हो तो देखिए।' पापा बोले कि," दो लड़कियां हैं नज़र में, एक करजगाव की और एक की। पहली वाली के पिता नहीं हैं। दोनों से मिलवाते हैं जो पसंद आए वहा बात आगे बढ़ाएंगे।" संभा सर को अपनी मां न होने के कारण जिसके पिता नहीं थे उसके साथ एक सरीखे दर्द के कारण जुड़ाव सा लगा तो उन्होंने तुरंत कह दिया कि, " पहली वाली से ही मिलवा दिजिए, शायद हम एकदूसरे का दर्द समझ पाए और एकदूसरे को भी समझ पाए।" संभा सर का विचार सही भी था, क्योंकि हर किसी को चाहत होती हैं एक ऐसे साथी की जो उसके दर्द आंखों में ही पढ़ ले। इसलिए किसी भी इंसान से जुड़ने का सबसे आसान तरीका है कि उसके दर्द से जुड़ जाओ। एक सरीखे दर्द के कारण संभा सर को पहली वाली से एक जुड़ाव महसूस हुआ। संभा सर जब उनसे मिले तो दोनोंने एक दूसरे को पसंद कर लिया। 

    लड़की का नाम सविता था। वह मेरी छोटी मामी की छोटी बहन हैं। उन्हें देख के ' सादगी ही सच्ची सुंदरता हैं' , ईस बात का अनुभव होता है। जितना सुंदर उनका रूप , उतना ही सादा रहनसहन। और गुणों से भी संपन्न। छोटों को प्यार और बड़ों को सम्मान देनेवाली। ईस शादी में कुछ कम बाधाएं नहीं आई, बल्कि शादी के बाद भी यह दिक्कतें खतम नहीं हुई। लड़की के जीजा याने कि मेरे छोटे मामा ने संभा सर के बारे में गलत बाते सुनी थी। संभा सर के गांव में उनकी जांच करने के बाद कुछ लड़कीवालों को ईस शादी से परेशानी हो गई। पापा संभा सर को वैयक्तिक रूप से पहचानते थे इसलिए उन्हें भली भांति मालूम था कि सर एक अच्छे इंसान हैं। उनके लाख समझाने पर भी कुछ फायदा नहीं हुआ। फिर भी यह रिश्ता ना ना कहते हुए आखिर में तय हो गया। जिन बातों पे इंसान का बिलकुल भी बस नहीं चलता उन्हें नसीब कहते हैं। यह शादी भी नियति का ही फैसला थी जिसका जरिया मेरे पापा बने। 

शादी के दिन मा और दादी की याद ने संभा सर को बहुत रुलाया था। 

   ईस शादी के वक्त कुछ रिश्ते शायद हमेशा के लिए ही खराब हो गए, लेकीन सविताजी को एक सच्चा जीवनसाथी और संभा सर को सुख दुःख में साथ निभानेवाली जीवनसंगिनी मिली। आज उनका एक 4 साल का प्यारा सा बेटा हैं। उसका नाम युवराज हैं। हम उसे tiger कह के बुलाते हैं। आज संभा सर अपने छोटे से परिवार के साथ खुश हैं और हजारों मुश्किलों के बाद भी यह पति पत्नी आज भी एकदुसरे के साथ हैं। अनबन तो हर रिश्ते में होती हैं, मगर फिर भी उसी एक इंसान को अपनी मंजिल समझकर हर हाल में उसका साथ निभाना यह हर कोई नहीं कर पाता। 

     2020 के शुरुआती दौर में विद्यापीठ का क्लास बहुत अच्छे से चल रहा था। लेकिन ईस साल के मार्च महीने से कोरोना के कारण होती महामारी को देख सरकार ने जो देशभर में lockdown लगा दिया उसके वह लगभग दो साल तक जारी रहा। ईस lockdown के कारण लोगों का प्रचंड रूप से को आर्थिक, शैक्षणिक, जैविक नुकसान हुआ उसका गवाह पूरा विश्व हैं। ईस lock down ने दो सालों के लिए पूरी दुनिया का luck down कर दिया था। ईस lockdown के चलते एक बार जो विद्यापीठ के क्लास बंद हो गए वह हमेशा के लिए। बीच में परिस्थिति जरा शिथिल होने पर क्लास शुरु भी हुए थे लेकिन कोरोना की दुसरी खौफनाक वेव के बाद क्लास हमेशा के लिए बंद हो गए। मगर तब हममें से किसी यूको भी ईस बात की कल्पना नहीं थी क्यूंकि हमे जरा भी अंदाजा नहीं था कि संभा सर की जिंदगी में क्या चल रहा हैं। कोरोना में लोगों का एकदुसरे के घर आना जाना बंद था , इसलिए संभा सर बहुत दिनों से हमारे घर आए नहीं थे। हाल ही में मार्च 2022 में अपनी जिन्दगी में एक मुकाम तक पहुंचने के बाद जब वह घर आए थे तब सारी बीती बातें जानने का अवसर मिला। 

    कोरोना का संभा सर की आर्थिक स्थिति पर असर तो हो ही चुका था और उनके घरवालों ने भी उनकी जिन्दगी मुश्किलों से भर दी। स्कूल बंद होने की वजह से पेमेंट की दिक्कतें थी। ऐसे में उनके आर्थिक हालात इतने कमजोर हो चुके थे कि घर का सब धनधान्य खतम हो चुका था और उनके परिवार पर रोजी रोटी के लिए तरसने की नौबत आ गई थी। ऐसे में मजबूरी में उनको पूरे परिवार के साथ अपनी एक बहन के ससुराल जाना पड़ा। एक बहन को शादी के बाद भाई के घर रहने में झिझक होती हैं तो उस भाई के आत्मसम्मान पे कितनी गहरी चोट आई होगी जिसे आर्थिक मजबूरी के कारण अपनी ही बहन के ससुराल में आसरा लेना पड़ा हो। यह बात संभा सर के मन को बहुत सताती थी कि वह किसी पर बोझ बन चुके हैं। वह दिनभर बाहर ही रहते और रात को सबके सो जाने के बाद घर जाते थे। वह किसी से नजरे नहीं मिला पा रहे थे। किसी भी स्वाभिमानी इंसान को अपना स्वाभिमान जान से भी प्यारा होता हैं। उनके जैसे स्वाभिमानी इंसान पर ऐसी नौबत आना मतलब बेमौत मर जाना हैं। 

     उनके परिवार पर पहले ही कुछ कम मुसीबतें नहीं और ऊपर से उनके घरवाले उनकी जान के दुश्मन बन बैठे थे। बचपन में जब संभा सर के घरवालों द्वारा उनका छल होता था तब कहीं ना कहीं वह शायद पूरी दुनिया को कोसते होंगे। क्यूंकि नौ- दस साल की नन्ही उमर में जब दुनियादारी की बिलकुल भी समझ नहीं होती हैं तब बच्चे अपने आसपास के लोगों में ही पुरी दुनिया देखते हैं और उन्ही लोगोँ के आधार पर दुनिया का अनुमान लगा लेते हैं। शायद इसीलिए जो बच्चे बचपन में नाजों से पले होते हैं, बड़े होने के बाद लोगों से धोखे खाकर सीखते हैं और ऐसे बच्चे जिनके लिए उनका बचपन ही (मानसिक और भावनिक रूप से) एक धोखा था वह हद से ज्यादा व्यावहारिक बन जाते हैं नहीं तो हद से ज्यादा भावनिक। या तो किसी से ज्यादा घुलमिल नहीं पाते या फिर बचपन से वह जिस प्यार से वंचित रहे थे उसे किसी न किसी से पाने की उम्मीद रखते हैं और फिर वह उम्मीद जब टुट जाती हैं तो वही उनकी सीख होती हैं। संभा सर बड़े होने के बबाद हमेशा उस प्यार की तलाश में रहे जो उन्हें बचपन में किसी से नहीं मिला। जब वह अपनी ज़िंदगी में एक एक दिन की रोजी- रोटी के लिए तक किसी न किसी के मोहताज थे तब उन्हें यूँ लगता था कि अपने बेटे को ईस कदर बेहाल देखकर शायद उनके पिता के मन में पितृप्रेम जाग उठे और वह अपने बेटे को सीने से लगाकर उसके दिल के खाली कमरों को रोशन कर दे। मगर संभा सर की यह गलतफहमी बहुत जल्द दूर हो गई जब उनके पिता ने उनके नाम की सुपारी दिई। तब उनकी सारी उम्मीदें टुट गई और वही टूटी हुई उम्मीदें उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी सीख बनी।  

     संभा सर को एक दिन उनके घरवालों ने साजिश कर बहुत मारा पीटा। उनके चाचा, चाची और उनके पिता में से किसी ने भी उनको नहीं बक्शा। कुछ लोगों ने उनको कसके पकड़ा और कुछ जन उन्हें बड़ी बेरहमी से पीट रहे थे। संभा सर कितने शक्तिशाली हैं यह बात उन लोगों को पता थी इसलिए उस एक अकेले और निहत्ते इंसान को मारने के लिए पूरा झुंड तैनात था। संभा सर के कपड़े फट चुके थे, खून निकल रहा था और उनके शरीर की पीड़ा उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी। और जो जान लेने पे तुले थे वह उन्हीं की तो रगों का खून था। लेकिन एक बार भी उन लोगों के हाथ नहीं कांपे अपने ही अंश का गला घोटते वक्त। उस वक्त संभा सर के देह पर वह ज़ख्म थे जिन्होंने उनकी सारी उम्मीदें तोड़ दी और मन में मा की याद थी जिसने उन्हें और भी कमजोर, घायल और बेबस कर दिया। उस समय उनके पास मा का न होना उन्हें उनकी सबसे बड़ी लाचारी लग रही थी। उस दिन मा की याद में वह बहुत रोए। भगवान की कृपा से उनकी जान तो बच गई लेकिन उनमें बिलकुल भी जान नहीं बची थी। वह घर आए तो उनके छोटे भाई, उनकी पत्नी और उनका बच्चा उनकी ऐसी हालत देख घबराहट में चौक उठे। उनकी परेशानिया खतम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। वह अब जिंदगी से हार चुके थे। एक तरफ दो वक्त के खाने तक के पैसे नही और दूसरी तरफ बाप खुद अपने बेटे को मरवाने की चाले चल रहा था। जब जीने का कुछ मतलब न दिखाई दे तब इंसान को एक ही अंतिम रस्ता दिखता हैं और वह हैं मौत। संभा सर ने खुद भी कभी नहीं सोचा होगा कि जिंदगी उनको ईस मोड़ पर लाकर खड़ा कर देगी कि वह हालातों से हारकर अपनी जान देने की सोच लेंगे। एक दिन सविताजी और संभा सर ने बैठ के बहुत सोचा और तय कर लिया कि अब वह ईस मौत जैसी जिंदगी से छुटकारा चाहते हैं। उन्होंने आत्महत्या करने की ठान ली। फिर संभा सर के मन में आया कि अगर वह दोनों ईस दुनिया में नहीं रहेंगे तो उनके बेटे को भी वही ठोकरें खानी पड़ेगी जो अनाथ होने के कारण उनके नसीब में आई थी। इसलिए उन्होंने तय किया कि पहले उस बच्चे को जहर खिला देंगे और फिर दोनों खुदकुशी कर लेंगे। यह सब जानकर मेरे आंसू नहीं थमे। जिस इंसान ने औरों को जीने का हुनर सिखाया हो, वह खुद जिंदगी से इतनी बुरी तरह से कैसे हार गया यह बात मेरी समझ से बाहर थी। उस वक्त मैं यहीं समझ पाई कि, मजबूरी इंसान की सारी मजबूती छीन लेती हैं। 

        संभा सर ने जब तीन जिंदगियों का आखिरी अंजाम तय कर लिया और वह अपने विचार पे अमल करने ही जा रहे थे कि उनको अपने फैसले पे और एक बार सोचने का विचार आया और ईस पल में मानो उनमें दुबारा से जान आई हो। उनको भावनाओं में बहकर उन लोगों के कारण अपनी सांसे रोक देना गलत लगा जिनके मन में उनके लिए घृणा के सिवा और कुछ नहीं था। तब उनको एहसास हुआ कि वह कितनी बड़ी भूल करने जा रहे थे। वह एकदम से आगाह हो गए और अपनी ईस सोच का ही कत्ल कर डाला जो उन्हें इतना कठोर कदम उठाने के लिए उकसा रही थीं। उनकी आंखों में कुछ ईस तरह सच्चाई चमक उठी जैसे कि किसी दिव्यता ने उनकी रूह में जनम लिया हो और आज तक जो उनकी आंखों के सामने था पर उन्हें दिख नही रहा था वह एकदम से दिख हो! वह अनुभूति कुछ ऐसी थी मानो दुबारा से उनका नए से जन्म हुआ हो! उन्हें एहसास हुआ कि वह आज तक एक भ्रम में जी रहे थे। वह अतीत जो गुजर चुका हैं और वह उम्मीदें जो सिर्फ़ एक सपना है जो आंख खोलो तो टूट जाएगा, यह दोनों भ्रम ही तो हैं। संभा सर के मन में अतीत में अपने साथ हुए अन्याय के कारण जिंदगी से जो खलिश थी वह अंदर ही अंदर उनके मन को खाए जा रही थी और उनके वह तथाकथित अपने जिन्होंने हमेशा उनके साथ किसी निर्जीव वस्तु की तरह व्यवहार किया और उनको प्यार भरे दो लफ्जों के लिए तरसा दिया , उन बेकदर लोगों से वह एक बच्चे के बाप होने के बाद भी एक बच्चे की तरह भोली आस लगाए बैठे थे कि आज नही तो कल उनके मन में संभा सर के लिए प्यार जगेगा। कोई और नहीं तो कम से कम उनके पिता के हृदय में तो बेटे को इतना लाचार देख पितृप्रेम जाग उठेगा। मगर उनके दिल में प्यार था ही नहीं तो जगता कैसे! यह समझने में उनको सालों लगे। अगर इंसान को किसी से प्यार पाने की उम्मीद रखनी पड़े तो अप्रत्यक्ष रुप से उसे सामनेवाले से दया की उम्मीद होती हैं जिसे वह प्यार का नाम देता हैं। और दया की भीक से भली तो हक की नफ़रत हैं। मगर ज़िंदगी ने उनसे उनका सबसे नायाब हक छीन लिया। मा बाप का प्यार हर बच्चे का हक होता हैं जो संभा को कभी मिल ही नहीं पाता। मा क्या होती हैं यह समझने से पहले ही वह भगवान को प्यारी हो गई और बाप का प्यार महसूस करने का मौका उनके पिता ने उनको कभी दिया ही नहीं। वह चाहते थे मा बाप से इस जालिम दुनिया की शिकायते करना, उनकी गोद में सिर रखकर रो देना , उनकी आंखों का तारा बनके रहना, उनकी आंखों में अपने लिए प्यार और चेहरे पर गुरूर देखना। मगर कुछ चाहते सिर्फ चाहते ही रह जाती हैं और ज़िंदगी भर के लिए एक कसक बन जाती हैं। तकदीर ने संभा सर को इतना मजबूर कर दिया था कि एक बेटा हक से अपने बाप के गले तक नहीं लग सकता था और मां की याद में रोते रोते ही उसकी धुंधली यादों की चादर ओढ़ के सो जाता था। 

    संभा सर मानते हैं कि यह मा का ही आशीर्वाद हैं जो उनके अंदर ऐन वक्त में उस दिव्यता ने जन्म लिया जिसने उनके भ्रम मिटाकर उनको खुदका एक मुख्तलिफ वजूद दिखाया जो उनकी ज़िंदगी के किसी भी इंसान से नही बल्कि सिर्फ उनसे जुड़ा था। और उन्हें यू लगा जैसे सालों पश्चात वह गहरी नींद से जगे हो और अब तक जो था वह बस एक सपना हो। और वह निकल पड़े अपनी सच्चाई ढूंढने। उन्होंने अपने मन से जीवन त्यागने की सोच का त्याग कर जीवन को पाने की सोच को अपना लिया। खुदको भी संभाला और सविताजी को भी। और शायद मन ही मन में अपने बच्चे से माफी मांग ली जिसकी ईजाजत के बगैर ही, उसने जीना शुरू करने से पहले ही उन्होंने बेहद मजबूरी में सही लेकिन उसकी ज़िन्दगी खत्म करने का विचार किया था। उन्होंने अपनी सारी झूठी उम्मीदों का जो उनके मन की एक कल्पना मात्र थी उनका त्याग कर दिया और सच्चाई में जीना शुरू कर दिया। 

     लोगों से मिले अनुभव और उन अनुभवों से मिले पाठ सदा के लिए याद कर लिए और हर उस शख्स को अपने दिमाग से बाहर निकाला और उससे रखी उम्मीदों को दिल से बाहर निकाला जो उनके दुख के पीछे की वजह था। इतना ही नहीं बल्कि कुछ समय के लिए उन्होंने पूरी दुनिया से रिश्ता तोड़ अपनी पहचान ढूंढने निकले। और सही भी हैं क्यूंकि कहते हैं ना कि 'कुछ लड़ाईयां अकेले ही लड़नी पड़ती हैं'। उस जंग में आपकी प्रतिद्वंद्वी आप ही की ज़िंदगी हैं और अपने पक्ष के सेनापति भी आप हैं और अपनी सेना भी आप खुद ही हैं। शस्त्र हैं आपका बुलंद हौसला, खुदका वजूद तलाशने की प्यास, अपनी कोशिशों पर अड जाने की ज़िद और सीने में हर मुसीबत को पछाड़कर मंजिल की तरफ बढ़ने की दहकती आग! 

सबसे अच्छा बदलाव संभा सर में यह हुआ कि पहले उनका दिल उनकी कमजोरी था लेकिन अब ताकत बन चुका था। अब वह भावनाओं में बह जाना और भावनाओं को बहने देना, दोनों में फर्क समझ चुके थे। उनको उन सारी गलतियों का एहसास हो गया जो उन्होंने भावनाओं का शिकार होकर बार बार दोहराई थी। और अब वह व्यावहारिकता की महत्ता समझ चुके थे। इसका मतलब यह तो नहीं है कि अब वह भावनात्मक नहीं रहे। वह आज भी उतने ही भावुक हैं लेकिन अब यह फर्क है कि पहले यह भावनाएं उनको ले डूबती थी लेकिन अब उन भावनाओं को जरा भी इजाजत नहीं कि वह दुबारा कभी संभा सर के दिल को और उनकी ज़िंदगी को तबाह कर पाए।

   संभा सर ने और सविताजी ने अपनी ज़िन्दगी नए से शुरू की, नई उम्मीदें और नए सपनों के साथ। मगर इस बार वह सारी उम्मीदें और वह सारे सपने सच्चे थे क्यूंकि वो सिर्फ खुद से जुड़े थे किसी और से नहीं। अब उनकी ज़िन्दगी पर सिर्फ उनका बस था। संभा सर अपनी गाड़ी पर कभी काम की खोज में और हर वक़्त खुद की खोज में बस निकल पड़ते। कई बार मूसलधार बारिश से झगड़ते और कई बार भूके पेट को अपने आंसू पिलाकर सहलाते। बचपन से जो चीखें दबी हुई थी अब और चुप नहीं रह पाई। अब वह दिल के समशान से बाहर निकल जाना चाहती थी, मुक्त होना चाहती थी और इस हवा में खुद को समा देना चाहती थी। अब तक तो वह सिर्फ घुटघुटके रोते आए थे मगर अब एक दिन भी ऐसा नहीं था जब वो आक्रोश कर रोए ना हो, चीखें ना हो , चिल्लाए ना हो। धीरे धीरे कर सारी चीखें रुखसत हो गई और आंसू दिल की यादों के मोती बन सदा के लिए आंखों के किसी कोने में हमेशा के लिए बस गए जो कभी मा की याद में मा के चरणों पर अर्पण हो जाते हैं तो कभी चेहरे को वात्सल्य से छूकर थपकियां दे जाते हैं और कभी किसी याद में आंखों की चमक और होठों की मुस्कुराहट बन वहीं ठहर जाते हैं।

     Lockdown में संभा सर और सविताजी खेती का ही काम किया करते। बीच में सब रुक सा गया लेकिन अब फिर सविताजी दुबारा कमर कसकर, खून पसीना एक कर खेती में मेहनत करने लगी और संभा सर साथ ही साथ कोई न कोई काम के लिए यहां वहां घूमते रहते। ना आर्थिक परेशानियां खत्म हुई थी, ना घरवालों की साजिशे खत्म हुई थी और ना अब तक ज़िंदगी का मकसद दिख रहा था लेकिन इस बार सिर पे एक ऐसा जुनून सवार था जो पहले कभी नहीं था।

     कहते हैं, ' जहा चाह हैं वहा राह हैं '। संभा सर की एक दिन एक ऐसे फरिश्ते के साथ मुलाकात हो गई जिनके आशीर्वाद ने संभा सर की बिगड़ी बना दी। वह एक आध्यात्मिक गुरु हैं। उनके शिष्य तथा भक्त उन्हें ' महाराज' कहकर संबोधित करते हैं। अपनी जिदंगी में किसी भी एक सुख के लिए बस तरसते रह जाने की वजह से संभा सर को भगवान में कुछ खास यकीन नहीं था। या यू कह ले कि वह पूरी तरह से नास्तिक थे। मगर महाराज से मुलाकात के बाद वह अध्यात्म में, ईश्वर में यकीन करने लगे। उन्हें एहसास हो गया कि इतनी कठिनाइयों के बाद भी आज वह जिंदा हैं और लड़ रहे हैं यह उसी खुदा की ईनायत हैं जिसमें उनको आज तक यकीन नहीं था। महाराज उन कुछ चुनिंदा महापंडित व्यक्तित्वों में से हैं जो किसी भी इंसान के बारे में खुद उस इंसान से अधिक जानते हैं। इंसान का चेहरा देखकर ही उसका इतिहास, उसका भविष्य, उसका वर्तमान जान लेते हैं। इंसान की फितरत और उसकी हसरत, उसकी अच्छाईयां और बुराईया, उसके सुख - दुख, सुख के पीछे का दुख और दुख के पीछे का सुख सब कुछ जान जाते हैं । शायद कुछ लोगों को ईस बात पे यकीन न हो, मगर यह सच हैं। सर से महाराज के बारे में सुनने के बाद मुझे यकीन रखने में बहुत सहजता से बिना किसी शक और आश्चर्य के बगैर यकीन रख पाई क्योंकि मैं पहले से ही बिलकुल ऐसे ही दिव्य व्यक्तित्व के अध्यात्मिक तथा सिद्धिप्राप्त गुरु से मिली हूं जो हमारे जीवन की हर एक बारिकाई को हेर लेते हैं। यहा तक हमारे मन में गूंज रहे शब्द भी वह पकड़ लेते हैं। महाराज ने संभा सर को पहली नजर में ही परख लिया। उनको संभा सर में वह दिखा जो इससे पहले शायद किसी में नहीं दिखा था। वह संभा सर को देखते ही उनको पहचान गए। संभा सर ने अपने अतीत में क्या थे और वह आज क्या deserve करते हैं यह महाराज के ध्यान में आ गया। संभा सर नोकरी करने के लिए नहीं, लोगों को नोकरी देने के लिए बने थे। शायद सारे कराटे क्लासेस किसी न किसी वजह से बंद हो जाना, उनका स्कूल विद्यापीठ का स्कूल छोड़ देना इनके पीछे कुछ तो कारण था जो उस वक्त किसी को मालूम न था। संभा सर की बुद्धिमत्ता की बात करे तो वह दिमाग से बड़े चालाक हैं। एक व्यापारी की जो बुद्धिमत्ता होती हैं वह संभा सर के व्यक्तित्व में साफ़ झलकती थी। खामी सिर्फ यह थी कि उनका भावनाओं में बह जाना जो की अब खत्म हो चुकी थी। महाराज ने संभा सर की क्षमताओं को पहचान लिया और अपने संपर्क से संभा सर को पहले महाराष्ट्र में एक रोड कॉन्ट्रैक्ट का काम दिलवाया, उसके लिए मार्गदर्शन किया और संभा सर उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे तो आसाम, ओडिशा जैसे ही अन्य राज्यों में भी काम दिया। संभा सर को अपना काम शुरू करने में दिक्कतें तो बहुत आई लेकिन अब उनको रुक जाना बिलकुल भी मंजूर नहीं था। इंसान के सिर पर जब किसी भी चीज के लिए पागलपन सवार हो जाता हैं तो सब मुमकिन लगने लगता हैं। ज़िंदगी के तूफान महज किसी बवंडर जैसे भाने लगते हैं। धीरे धीरे संभा सर का काम बढ़ता गया। लगभग एक साल में ही उनकी ईतनी तरक्की हो गई जितनी उनके खानदान में किसी ने नहीं कि। यह सब अचानक तो हुआ नहीं। उसके पीछे रातदिन की कड़ी मेहनत थी, महाराज का और उनकी स्वर्गवासी मा तथा दादा -दादी का आशीर्वाद था और उनके शुभचिंतकों की दुआए और सबसे महत्वपूर्ण, भगवान की कृपा थी जिसके कारण वह इतने कम समय में इस मुकाम तक पहुंच पाए। 

    एक समय तक रोड कॉन्ट्रैक्ट का काम करने के बाद उन्होंने स्मार्टमीटर जो एक ऐसा विद्युत उपकरण हैं जिसके माध्यम से विद्युत् प्रवाह और उससे जुड़े अन्य भौतिक प्रमाणों का मापन किया जाता हैं, उससे संबंधित business शुरू किया और उसे विकसित किया। स्मार्टमीटर के काम से संबंधित अन्य अनुभवी संघटनाओं को ईस रेस में पीछे छोड़ महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि भारत के अन्य राज्यों में भी अपना नाम बनाया। कभी जेब में एक पैसा तक नहीं होता था और आज उनको करोड़ों के काम मिलते हैं। आज उन्होंने अपने दम पर अपने गांव माक़ा में एक से अधिक जमीनें खरीदी हैं। अपने नए घर का काम भी शुरू करा दिया हैं। आज वह जब चाहे तब अपनी मनचाही गाड़ी खरीद सकते हैं। यशदा जो उनकी दादी का नाम था, ईस नाम से राहुरी में उनका office हैं। और काम इतने मिल रहे हैं कि और जगह भी office शुरू करने पड़ रहे हैं। साथ ही अब जल्द ही उनकी कंपनी प्राइवेट लिमिटेड होने जा रही हैं। 

    आज वह भारतभर में कामों के सिलसिले में घूमते हैं, फिर भी उन्होंने अपना कार्यालय राहुरी में शुरू किया इसके पीछे वजह यह है कि, राहुरी उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि है और वह इस भूमि के सदा के लिए ऋणी हैं इसलिए उन्होंने इसी जगह को फिर एक बार अपना स्टार्टिंग पॉइंट बनाना चाहा। आज उनकी परिस्थितियां तो बदल गई लेकिन वह नहीं बदले। आज भी वह उतने ही दरिया दिल हैं जितने की पहले थे। आज भी वह जिन्हें जरूरत है उनकी सच्चे मन से बिना किसी दिखावे के मदद करते हैं । उनके कठिन हालातों में जिन्होंने उनका छल किया वह जब आज उनसे मदद मांगते हैं तो संभा सर उन्हें भी मना नहीं करते। जिन बच्चों को सुविधाए उपलब्ध नहीं हैं उनकी शिक्षा और खेल में उन्नति के लिए संभा सर अपनी विविध योजनाओं पर काम कर रहे हैं जो जल्द ही साकार होंगी। उनके पास जब कुछ नहीं था तब भी वह दूसरों को देने के बारे में सोचते थे और आज भी जब उनके पास सब कुछ है तब भी वह दूसरों की मदद करने के बारे में सोचते हैं। उनका मानना हैं कि यही वह गुण हैं जिसने उनको धन दौलत के रुप में भी संपन्न बनाया। जिसकी अपना हिस्सा दूसरे के साथ बाटने की मंशा न हो उसे धनसंपत्ति हासिल हो न हो, लेकिन जो दिल से सब को अपना समझता हैं और खुशियों के अपने हिस्से को लोगों के साथ बाटना चाहता हैं तो भगवान उसे सब कुछ देते हैं। क्योंकी देनेवालों के हाथों में देंगे तभी सब तक पहुंच पाएगा। 

    संभा सर को सब कुछ मिलता गया और अभी भी मिल रहा हैं लेकिन उन्होंने देना कभी कम नहीं किया। यहां तक पहुंचने में उनको जितने भी कष्ट उठाने पड़े और आज भी उठाने पड़ रहे हैं उन सबके फल अब एकसाथ मिलने लगे हैं। आज उन्हें उन सारी कठिनाइयों के मतलब समझ में आते हैं जो एक वक्त पहले उनको सजा लगती थी। अतीत की ऐसी कोई बात नहीं जिनसे उनको सबक न मिला हो। इससे पहले वह जो भी काम करते थे उसका भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से उनके काम लाभ होता ही हैं। जैसे कि, खेल और राजनीति के क्षेत्र में अनुभव होने के कारण उनके नेतृत्व गुण बहुत अच्छे से विकसित हो चुके हैं। और आज भी वह इन क्षेत्रों में कार्यरत हैं। बात करे उनके लेखक होने की तो ' मुक्ता ' नामक कादंबरी पर वह काम से थोड़ी राहत मिलते ही काम शुरू कर देंगे। ईससे पहले उनके एक उत्तम कवि होने का प्रमाण देनेवाला ' जीवनरहस्य ' नामक काव्यसंग्रह 2014 में मातृभाषा मराठी में प्रकाशित हो चुका है। उनकी कविताओं के सीधे सरल शब्द किसी के भी दिल को छू जाए ऐसे हैं। वह कविताए उनके जीवन के सारे रंगों से रूबरू कराती हैं। आज वह सारे रंग नए से चमक उठे हैं और उनके व्यक्तित्व को और भी आकर्षक बना गए। जैसे कि, दिवाली में घर की दीवारें फिर एक दफा रंगों में रंग जाए और घर महल बन जाए। 

     आज खेती में भी अच्छी उन्नति हो चुकी हैं और business तो जोरोशोरो से शुरू हैं । आखिर में इन दो पतिपत्नी का सब्र रंग लाया। मगर यह सब इतना आसान नहीं था। जिंदगी आप जो चाहते हैं वह आपको जरूर देती हैं लेकिन बदले में आपसे अपना सब कुछ मांग लेती हैं। जितनी बड़ी आपकी मांगे होगी उतनी ही बड़ी जिंदगी की मांगे होगी। ज्यादातर लोग पाना तो सब कुछ चाहते हैं लेकिन बिना उचित दाम अदा किए। जिंदगी कोई सरकार तो हैं नहीं जिसके सामने आप ' हमारी मांगे पूरी करो ' का नारा लगाए और उम्मीद रखे की आपकी ख्वाहिशें पूरी होंगी। ज़िंदगी तो वह समुद्र हैं जिसके तल को आपका जन्म हुआ हैं और धीरे धीरे हर मुसीबत का सामना करते हुए आपको इसकी उच्चतम सतह तक का सफर तय करना हैं। तब जमी भी आपकी और यह आसमान भी आपका, जब आप ईस समुद्र पे राज करोगे। मुसीबतें तो सबकी लगभग एक जैसी ही होती हैं, बस सबका उनकी ओर नजरिया अलग अलग होने के कारण सबको परिणाम भी अलग अलग ही मिलते हैं। संभा सर ने भी जब अपना नजरिया बदला तो मुसीबतें एक अवसर बन गई।

    इंसान ईस एक जीवन में दो बार जन्म लेता है। पहला मा की कोख से और दूसरा जिंदगी की कोख से। मा की कोख में आपका शरीर रुप धारण करता है और जिंदगी की कोख में आपका वजूद रुप धारण करता है। मा की कोख में उसकी हथेलियों की थपथपाहट का एहसास हमको सहलाता हैं, तो जिंदगी की कोख में मीठी यादों का कारवा मन को बहलाता हैं। मा खुद आपके लिए दर्द सहकर आपको कोख में पालेगी और जिंदगी की कोख में तभी पल पाओगे जब उसके दर्द सह पाओगे। मा अपनी जान खतरे में डालकर आपको जन्म देती हैं और जिंदगी पहले आपको जीते जी मार देती हैं फिर जनम देती हैं। मा जब जन्म देती हैं तब नाल काटनी पड़ती हैं और जब जिंदगी जन्म देती हैं तब हर वह डोर काटनी पड़ती हैं जो आगे बढ़ने से रोके , फिर चाहे वह कोई व्यक्ति हो या घटना। मा से जोड़नेवाली नाल कट जाए तो वात्सल्य की निशानी के रुप में आधा हिस्सा मा के पास और बाकी आधा बच्चे के पास रह जाता हैं। जब जिंदगी की अनचाही हर एक डोर कट जाए तब कुछ लोग और घटनाए जो दर्द देते हैं वह पीछे छूट जाते हैं और उनसे मिले सबक हमारे पास रह जाते हैं। पहले जन्म के बाद सभी की आयु समान याने की शून्य होती हैं मगर दूसरे जन्म के वक्त आपकी आयु आपके अनुभवों से तय होती हैं। पहले जनम के बाद हम सालों तक दूसरों के अस्तित्व की छाया तले जीते हैं और दूसरे जनम के बाद हम जिंदगीभर के लिए खुद के अस्तित्व का ताज पहनकर शान से जीते हैं। और सबसे खास और महत्वपूर्ण बात यह हैं कि पहला जन्म आप की ईच्छा के अनुसार नहीं होता लेकिन दूसरा जन्म लेना हैं कि नहीं यह सिर्फ और सिर्फ आप ही पे निर्भर करता हैं। यही कहानी हैं संभा सर की और यही कहानी हम सब की भी हैं।

     


                समापन..।


 संभा सर के जीवन में हर तरह की मुश्किलें थी। उनकी आर्थिक मुश्किलें उनकी काबिलियत ने हल कर दी। उनकी मानसिक मुश्किलें उनके अंदर जागृत हुई दिव्यता ने मिटा दी। लेकिन उनके भावनिक विश्व में वह आज भी एकदम विरान हैं। उन्हें वह प्यार किसी से नहीं मिल पाया जो उन्हें सुकून दे सके । वह आज भी अंदर से तो अकेले ही हैं। जिसने भी कहा है सच कहा हैं कि, "जो लोग हमेशा दूसरों को खुश देखना चाहते हैं वह खुद अंत तक अकेले ही रह जाते हैं।" भगवान आपको कुछ देता हैं तो उसकी कीमत भी लेता है। और जितना ज्यादा देगा उतनी ज्यादा कीमत लेगा। भगवान के दरबार का भी यही उसूल हैं जो जिंदगी के बाज़ार का हैं। संभा सर को सौगात में हर तरह का हुनर मिला मगर बदले में भगवान ने उनका ' वह सुकून ' रख लिया जो तब मिलता हैं जब कोई आपसे बेमतलब प्यार करे, आपके शब्दों को समझ ले और खामोशी को सुनले। जब आपको भावनिक आधार की जरूरत हो तो आप उनपर विश्वास रख सके और उनपे हक भी जता सके। जैसे कि, एक मा होती हैं। भगवान ने संभा सर से उनका यह सुकून छीना जरूर है लेकिन अपने ही तो पास रखा हैं। तो शायद भगवान की ही शरण में जाकर, उसी से प्रेम कर उनको अपना वह सुकून मिल जाए !

   संभा सर का बचपन एक सौगात कम और आघात ज्यादा था । बढ़ती उम्र के साथ बढ़ती मुश्किलें थी। अपने हालातों के कारण न जाने अपनी कितनी ख्वाहिशों को उन्हें भुलाना पड़ा। आज उनके हालात तो बेहतर हो गए लेकिन वह सारी छोटी बड़ी ख्वाहिशें कबकी मर चुकी हैं। उनसे बात करते वक्त यह महसूस होता हैं कि उनके मन में किसी भी चीज का मोह अब बिल्कुल भी बचा नहीं हैं और वह किसी बड़े उद्देश्य के लिए जी रहे हैं। 

    संभा सर की कहानी हमे सबसे महत्वपूर्ण बात यह सिखाती हैं कि कभी भी सपने देखना ना छोड़े। हमेशा दिमाग में एक vision लेकर चले। छोटी उम्र से ही वह अपने भविष्य के बारे में ऐसी बातें सोचते जिनकी एक बड़े से बड़ा आदमी कल्पना तक नहीं कर सकता। यहां पर हम ये याद कर सकते हैं कि ' आप जो सोच सकते हो, आप वह बन सकते हो।' बस अपने आप पर विश्वास रखें। और अपने जीवन के उद्देश्य में स्वार्थ नहीं परमार्थ रखे!

     संभा सर के जीवन के कई सारे पहलू हैं और हर एक पहलू पे अलग से किताब लिखी जाए इतनी गहरी उसकी मार्मिकता और महत्ता हैं। मुझ जैसी सामान्य लेखिका का उनके असामान्य और तेजोमयी व्यक्तित्व को अपनी कलम के जरिए आप सबसे रूबरू कराने का और अपने शब्दों में उनको लिखकर इन शब्दों की शोभा बढ़ाने का यह एक छोटा सा प्रयास! हाला की यह उनकी ज़िंदगी में घटित हुए किस्सों का एक चतुर्थांश भाग भी नहीं पर उनके जीवन में सबसे बड़ा बदलाव लानेवाली कहानी पर मैंने अपनी ओर से प्रकाश डालने की कोशिश की हैं। वहम मे जीना मन को भाता तो हैं पर उस पर से पर्दा हट जाए तो दिल टूट जाता हैं। अहम वह हैं जो महत्वपूर्ण हैं। याने की सच। ऐसा वहम जो सुख चैन से जीने के लिए अहम हैं उसी को 'सच' कहते हैं। क्योंकी मरने के बाद तो यह सच्चाई भी एक वहम बनके रह जाएगी। अपने शब्दों में कहूं तो संभा सर की यह कहानी मूलतः उनके दूसरे जन्म की कहानी हैं जो जिंदगी की कोख से हुआ जिसका संदर्भ उनके पहले जन्म के संघर्षों से जुड़ा है जो मा की कोख से हुआ था। दूसरे जन्म ने उन्हें वह सच्चाई दिखा दी जिससे वह कुछ तो अंजान थे और कुछ तो मुंह फेर रहे थे। इसलिए यह कहानी सही मायने में ' वहम से अहम तक का सफर' हैं। 


   सवार हैं सिर पे जो जुनून-ए-मंजिल

   शीश झुकाती पर्वत सी मुश्किल 

   अकाल का खौफ समुंदर को ना दिखाओ

   कह दू कि.. नहीं बुजदिल यह दिल...!







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