हाँ, मैं तो जी भर पियूँगी
हाँ, मैं तो जी भर पियूँगी
'दिन नहीं रात नहीं जब देखो पीने बैठ जाती हो। पता होता तुम्हें यह जहर इतना पसंद है तो कभी शादी ही नहीं करता।' मेरे पति आए दिन मुझे इस तरह से कोसा करते हैं। मैंने कितनी कोशिश की कि उन्हें भी अपनी तरह लत लगा दूँ लेकिन अफ़सोस, कर न सकी। ऐसा नहीं कि वह नहीं पीते। पीते है लेकिन कण्ट्रोल में पीते हैं और मैं अनकण्ट्रोल पीती हूँ। इसीलिए फूटी किस्मत अधिकतर अकेले ही पीनी पड़ती है। कभी जब घर पर कोई नहीं होता तो ज्यादा करके पी लेती हूँ। एक बार जी भर पी ली तो बस मेरा तो दिन ही बन जाता है। गिलास भर मेरा प्यार और साथ में मसालेदार नमकीन। बेसनी मूंगफली या फिर चिवड़ा मिक्सचर। इसका बंदोबस्त हर वक़्त करके रखती हूँ।
जाने पीने कि लत कब लगी लेकिन लगता है बचपन में ही लग गई थी। और ऐसी लगी कि फिर न छूटी। पहाड़ों कि ठंडक में कोई न कोई नशा करना आम है। नानी भी आदी थी और मुझको भी बना दिया। माँ नौकरी करती थी तो नानी के घर पर ही बचपन बीता। पहले वह मुझे पिलाती थी। बाद में मैं उन्हें पिलाने लगी। दोनों साथ बैठकर पीते थे और झूमते थे। दुनिया भर कि गप्पे कभी नानी हाँकती मैं सुनती, कभी मैं हाँकती नानी सुनती। नानी के जाने के बाद ऐसा फिर न मिला। वैसे तो मेरे मायके में सभी पीने पिलाने वाले है लेकिन नानी वह लाजवाब थी।
शादी हुई एक पढ़े-लिखे परिवार में, संतुलित खान-पान जिनकी दिनचर्या का हिस्सा है। मेरी तलब को मन में दबाए मैंने संस्कारी बहू होने का अभिनय करना शुरू कर दिया। लेकिन एक टीस जरूर रहती। इसलिए मायके जाकर अपने अरमान पूरे कर लेती। जबकि मायके में सब ही कम ज्यादा मेरी तरह हैं, उनसे कुछ छूपाने की जरुरत नहीं रहती। सब मिलकर जमकर पीते हैं। न कोई शिकवा, न कोई शिकायत, लेकिन ससुराल तो मायका नहीं है। काश! ससुराल वाले भी मायके वालों जैसे होते। थकान मिटाने का सामान तो मिल जाता।
समय के साथ हालत बदल गए। बच्चे हुए। दादी अपने इकलौते बेटे के बच्चों को लेकर खुश थी। उन्होनें मुझपर ध्यान देना करीब करीब बंद कर दिया। पति काम से पहले ही व्यस्त रहते थे, अब फुर्सत नहीं मिलती थी। मेरे आनंद के दिन वापस आ गए थे। मैंने फिर से अपनी मुँह की लगी को गले से लगा लिया। जब मौका मिलता जी भर पी लेती। कुछ दिन तक सब ठीक रहा लेकिन जल्द ही राज खुल गया जब मेरे खाली गिलास यहां वहां पाए जाने लगे। फिर वही हुआ जो होता है। पति ने क्लास लगा दी। पहले सेहत से बात शुरू हुई और फिर बच्चों को भी लत लग जाने पर खतम हुई। तू-तू मैं-मैं जमकर हुई। लेकिन मैंने बगावत करने की ठान ली थी। कह दिया,' मुझे पसंद है, मैं तो जी भर पियूँगी। तुम्हें कौन कहता है हर वक़्त पीने के लिए।' पति ने आगे कुछ न कहा और मुँह फुलाकर चले गए। मैंने परवाह न की। समय के साथ मेरी आदत को उन्होंने बेमन से ही सही स्वीकार कर लिया। हालाँकि कुढ़ कुढ़ आज भी करते है लेकिन मैं नहीं सुनती।
आखिर आप बताइये इंसान इतनी मेहनत किसलिए करता है अगर अपने शौक ही न पूरा कर सके। जीना तो फिर बेकार है। वैसे भी नशा किसी का छूटा है कभी और वह भी चाय का नशा।
