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padma sharma

Drama


4  

padma sharma

Drama


फ़ैसला

फ़ैसला

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ठण्ड की धुन्ध भरी सुबह कब की हो चुकी थी लेकिन सतीश के घर में अब भी सन्नाटा था।

सतीश ने बिस्तर पर लेटे-लेटे दीवार घड़ी पर नजर डाली, सात बज गये थे । आज बिरजू नहीं आया वर्ना बर्तनों की आवाज आने लगती। सतीश उदास हो उठे। अलसाये हुए बिस्तर पर ही लेटे रहे। चाय पीने की तलब मन में उठ रही थी। सर्दी ने हाथ पैर इस कदर जकड दिए कि वे हिल डुल भी नहीं पा रहे थे। कैसे चलेगा यह सब ? और कब तक ! वे सोचने लगे।

 रोज सुबह पाँच बजे उठकर दैनिक कार्यों से फारिग होते और साढ़े पाँच बजे जो घूमने जाते तो साढ़े छः तक लौटते। दस पन्द्रह मिनिट आराम से बैठते , फिर बाबा रामदेव का योग करते तब तक बिरजू आ जाता। वह बर्तन साफ करता, झाडू लगाता, फिर चाय बनाता। सतीश चाय पीने के साथ-साथ अखबार पढ़ते । बिरजू एफ एम रेडियो के समान मोहल्ले भर के ताजा और स्थानीय समाचार चटखारे ले-लेकर सुनाता।

शाम की चाय वे स्वयं बनाते और पीने बैठते तो गम में डूब जाते।

सतीश गोस्वामी- जी हाँ यही पूरा नाम था उनका । लेकिन उनकी कॉलोनी के लोग उन्हें गोस्वामीेजी के नाम से ही जानते थे। बेटा बारह वर्ष का और बेटी दस वर्ष की थी तब ही उनकी पत्नी संध्या की मृत्यु हो गयी । बच्चों के पालन पोषण में वे इतने व्यस्त रहे कि कभी एकाकी जीवन दुःखदायी न बना । बेटा विदेश में नौकरी कर रहा था और परदेशी बन गया था। बेटी का विवाह हो गया तो जिन्दगी ही बेमानी लगने लगी किसके लिये जियें? प्रश्न अनुत्तरित ही रहता। लेकिन जीवन हैसांसें हैंधडकने हैंतो जीना भी है। जिन्दगी है तो रोजमर्रा की आवश्यकतायंे भी हैं।

मधुमेह और उच्च रक्त चाप ने उनकी काया में स्थायी बसेरा कर लिया था । किसके लिए कमायें ? प्रश्न उन्हें रोज परेशान करता इसलिए पचपन वर्ष की उम्र में ही बैंक से वालेन्चुअरी रिटायरमेन्ट ले लिया ।

तीन कमरों के इस फ्लैट को उन्होंने तीन वर्ष पहले खरीदा था । घर में भरा पूरा सामान है। खाने का झंझट कौन पाले सो एक मैस से दोनों वक्त के भोजन का टिफिन बँाध लिया। जब कभी हल्का फुल्का खाने का मन करता तो खिचडी बना लेते ,इसके अलावा कुछ और बनाना ही नहीं आता था उन्हें।

उन्होंने लिहाफ हटाकर उठना चाहा तो खिडकी से आयी सर्द हवा उनके प्रौढ़ चेहरे को कँपकँपाती चली गयी, वे फिर से लिहाफ में दुबक गए। इस ठण्ड ने उन्हें पैंतीस साल पहले ले जाकर खडा कर दिया । इस सर्दी ने ही तो उन्हें और संध्या को पहली ही रात में इतने करीब ला दिया था कि दोनों की गर्म साँेसे आपस में टकराकर जलतरंग पैदा कर रहीं थीं और उसी लय पर उनके हाथ थिरक रहे थे। उसी ताल पर चूड़ियों की खनक, पायल की रूनझुन, कपड़ों की सरसराहट और मुँह की दबी एवं घुटी हिस्सिस्की आवाजों ने आनन्द के चरम् शिखर पर पहुँचाकरअनिर्वचनीय सुख का अहसास करा दिया था।

 यादें ताजा हुयीं। पुरूषतत्व भी जागा। शरीर में फुरफुरी सी दौड़ीहाथ-पैरों के रक्त संचार तीव्र हुआमन काम लालसा की बूंदों से सराबोर हो उठा। 

दरअसल बैंक की एक ही ब्रांच में काम करते थे वे दोनों, और बैंक के काम से टूर पर गये थे। मीटिंग एक दूरस्थ फैक्ट्री में थी, जहँंा से अपने होटल लौटते-लौटते सांझ घिरने लगी थी और बादल भी। दिसम्बर का महीना और कड़ाके की सर्दी। वे और संध्या नीचे के डाइनिंग रूम मे चाय पीने बैठे। जल्दी ही दोनों एक दूसरे से प्रभावित हो गये। अपने तन और मन की जलतरंग को एक दूसरे को सुना दिया था उन्होने। दोनों कुंवारे थे , दोनों ही ख्ुाद मुख्तार । जल्दी ही ब्याह कर लिया था दोनों ने ।


अचानक मोबाइल की घंटी ने गोस्वामीजी का ध्यान भंग कर दिया। घूमकर आने के बाद मोबाइल चार्ज होने लगा दिया था। मजबूरी में उन्हें उठना पडा । कॉल देखी। जयपुर से छोटी बहन राजरानी का फोन था।

‘‘हलो हाँ राज बोलो कैसी हो ?’’

‘‘भैया मैं ठीक हूँआप सनडे को जयपुर आ जाओ’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘यहीं आ जाओ तब बताऊंगीबहुत अर्जेंन्ट काम है’’

‘‘तुम्हारी तबियत तो’’

‘‘नहीं मैं व सभी लोग ठीक हैंबस आपसे कुछ काम था’’

‘‘अच्छा’’

‘‘जरूर आना, अभी से रिजर्वेशन करवा लेना।’’

‘‘ओके’’

वे कुछ देर वहीं बैठे रहे। जयपुर बुलाये जाने का कारण ढूँढ़ने लगे। दूर-दूर तक नौकाविहार की लेकिन कोई किनारा नहीं दिखाकोई सूत्र नहीं मिला।

वे उठकर किचिन की ओर चल दिए। चाय चढ़ाई, शक्कर-पत्ती, पानीजीवन में सब कुछ था , बस दूध के बिना चाय खदक रही थी वहीं की वहींदूध डालने पर कैसा उफान आता है।

सारी उम्र दोस्तों की तरह रहे वे और संध्या । दो बच्चे हुऐ । संध्या ने दोनों की परवरिश अच्छे ढंग से की। दिसम्बर अंत के जाड़ों में उस दिन संध्या को हार्ट अटैक आया और वह उन्हे तन्हा छोड़ जाने किस जहान में चली गई।

चाय सिप करते हुए वे सोच रहे थे काश ! कोई होता जिससे बात करके मन हल्का कर सकते। शाम के समय सारे हमउम्र दोस्त बैठकर बातें करते हैं गप्पे लगाते हैं, फिर भी कई बातें ऐसी होती हैं जिन्हें कुछ खास लोगों में ही बाँटी जा सकती हैं।

शनिवार की रात वे जयपुर पहुँच गए। रेल्वे स्टेशन पर उनके बहन-बहनोई लेने आ गये । गोस्वामी जी की खोजी निगाहें कई बार राजरानी सेे प्रश्न कर चुकी थीं। राजरानी आँखों से उन्हें इशारा कर देती कि अभी बताऊँगी।

 भोजन के बाद राजरानी ने उन्हें एक पॅम्पलेट लाकर दिया जिसमें लिखा था -

 ‘‘वृद्ध महिला -पुरूष सम्मेलन’’

स्थानीय लोगों की अनूठी पहल - वृद्ध महिलाओं-पुरूषों के विवाह को प्रोत्साहन। युवावस्था में अकेले हो गये महिला/पुरूष सामाजिक प्रतिष्ठा, मर्यादा, सर्विस के कारण या पारिवारिक उत्तरदायित्वों के कारण विवाह नहीं कर पाते, जीवन साथी के बिना अकेले रह जाते हैं। युवावस्था तो व्यस्तता में निकल जाती है। प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था में व्यक्ति को जीवन साथी की सबसे अधिक जरूरत होती है, जिसे वह अपना अन्तरंग साथी बना सके। सन्तान की अपनी अलग व्यस्ततायें हैं। जब शरीर भी शिथिल होने लगता है तब एक हमदर्द, हमसफर, और एक हमराज की जरूरत होती है।

आइये और जीवनसाथी का चयन करें जिसे रविवार 

वे एक साँस में ही पूरा पॅम्पलेट पढ़ गये। स्थान और समय को अनदेखा करते हुए वे राजरानी को प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगे।

‘‘भैया मेैं चाहती हूँ आप भी अच्छा सा साथी देखकर विवाह कर लें।’’

गोस्वामी जी चौंक गए और हँसकर बोले , ‘‘इस उम्र में!’’

‘‘हाँ इसी उम्र में तो जीवनसाथी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।’’

‘‘नहींइतने दिन तुम्हारी भाभी के बिना गुजार दिए। उसकी जगह कोई और नहीं ले सकता।’’

‘‘उनके स्थान पर किसी और को बिठाने की बात नहीं कहती। जो स्थान अब सूना है उसमें तो किसी का प्रवेश हो सकता है।’’

‘‘बेटा विदेश में सैटल हो गया। बेटी का विवाह हो गया, अब क्या करूँगायह सब करके ?’’

‘‘आप अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो गये हैं। तब तो और अधिक सुगमता है। अपने स्वयं के जीवन के लिए भी कोई धर्म होता है। यों घुट-घुटकर जीवन जीने से मानव जीवन को शाप लगता है।’’

‘‘लेकिन लोग क्या कहेगें ? बुढ़ापे में विवाह ! सब कहेगे बुड्ढा सठिया गया है।’’

‘‘भैया शादी शरीर की तुष्टि मात्र नहीं है । साथी की सबसे ज्यादा जरूरत इसी उम्र्र में पड़ती है। एक ऐसे साथी की आवश्यकता होती है जिससे हम अपना दुःख-सुख बाँट सकें। और फिर हमें भी आपकी चिन्ता लगी रहती है।’’

 ‘‘अरे अब क्या करना है ? बात करने को दोस्त यार हैं। घर में नौकर हैं काम के लिए। बिल्डिंग में कई लोग हैंसब सहयोग कर देते है।’’

अब तक राजरानी के पति नवीन मौन थे। दोनों की बातें सुन रहे थे । वे बात काटते हुए बीच में बोले-‘‘भैया! राजरानी ठीक कह रही है नौकर काम कर जायेगा। दोस्तों के साथ भी कितना समय गुजारेंगे। जिंदगी की मंजिल पहाड़ के रास्ते तय मत करो भैया उसमें सीढ़ियाँ बना लो।

उन लोेगों की जिद और उनके तर्को के आगे झुकना पड़ा गोस्वामीजी को । सहमति देते हुए वे संकोच से बोले-‘लेकिन अप्पू क्या सोचेगी? वरुण क्या सोचेगा?’’

तल्ख आवाज में राजरानी बोली ‘‘अभी पिछले माह आप दस दिन अस्पताल में भर्ती रहे। आपने हमें खबर नहीं की। अप्पू को फोन किया तब भी वो नहीं आ पायी। रही वरूण की बात तो उसने आपसे संबंध ही कब बना रखे हैं। उसे आपकी जरूरत नहीं है। पिछले पाँच वर्षो से उसका कोई पत्र, उसकी कोई कॉल, उसकी कोई खबर आपके पास आयी है? उसके हर जन्म्दिन पर आप पत्र डालते हैं, उसका भी कभी उŸार आया है ? बदले में पहुँचा देता है अमेरिकी डॉलर जिसे आप गुस्से में वापस कर देते हैं। ’’

 गोस्वामीजी अपने आपसे भी हार गये थेबस एक वाक्य मुहँ से निकला-‘‘जैसा तुम चाहो ’’

 रातभर गोस्वामीैजी ऊहापोह की स्थिति में रहे।

बेटीदोस्तबिल्डिंग बालेबच्चे सब क्या सोचेंगें ? कभी-कभी मन पुलक उठताशादी के नाम से। पहली बार भी तो वे कितने प्रसन्न थे। सारी रस्में उन्होंने परम्परागत ढंग से ही निबाही थीं। अचानक उन्हें गाने की पंक्तियाँ याद आ गयीं-‘‘ बब्बा बुढ़ापे में करो न सगाई ,मैं कैसे करूँ भाई’’

वे मुस्करा गये और करवट बदल सोने की कोशिश करने लगे।

समारोह स्थल पर आकर उन्हें लगा कि वेे नाहक ही संकोच कर रहे थे। यहाँ तो उनसे भी अधिक शारीरिक दृष्टि से वृद्ध नजर आ रहे लोग बैठे थे। वे चारों तरफ का जायजा लेने लगे। एक तरफ महिलाओं की सीटें लगी थीं, दूसरी ओर पुरूषों की।

समारोह शुरू हो गया। उनके नाम की पुकार लगते ही वे सकुचाते हुए स्टेज पर आये।पहले वे कई प्रतियोगिताओं में भाग लेने स्टेज पर गये हैं, उस समय कितना उत्साह रहता था। लेकिन आज पैरों में कम्पन था ,चेहरे पर हल्की पसीने की बूँदे झलक आयी थीं। घबराहट के कारण सीना घौंकनी के समान चल रहा था। माइक के पास आकर वे ठिठक गये। सामने की पंक्ति में बैठी अपनी बहन राजरानी की ओर देखा। उसने सिर हिलाकर उन्हें बोलने का इशारा किया।आवाज हलक से बाहर ही नहीं निकल पा रही थी। वे बहुत असहाय महसूस कर रहे थे अपने आपको। बैंक में कामयाब अधिकारी रहे हैं वे। उनकी रौबदार आवाज से सभी मातहत डरते थे पर आज आवाज घुटी जा रही थी।जीभ तालू से चिपक कर रह गयी थी।

हकलाते से बोलने लगे, ‘‘मैं सतीश गोस्वामीनिवासी ग्वालियरआयु इकसठ वर्षबैंक से वालेन्चुअरी रिटायरमेन्टपेंशन बीस हजारएक बेटा और एक बेटीदोनों विवाहितबेटा विदेश में, बेटी ललितपुर मेंस्वयं का फ्लैट ग्वालियर मेंमैं डायवर्टिक हूँ

गोस्वामीजी स्टेज से उतरकर अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गये। उन्हें लग रहा था कि जिन्दगी की रील रिवर्स हो गयी है। विवाह के लिये स्वयं का परिचय देना वो भी सबके सामने कितना मुश्किल होता है।

पुरूषों का परिचय समाप्त हो गया था। अब महिलाओं का परिचय शुरू हो गया। एक-एक करके महिलायंे आ रही थीं और अपना परिचय देकर जा रही थीं। एक नाम एनाउंस हुआ- माला रावत। एक महिला अपने स्थान से उठी लेकिन वहीं कुर्सी पकड़कर खड़ी हो गयी। स्टेज तक जाने का उसमे साहस नहीं हो पा रहा था। वह फिर से बैठ गयी। उसके साथ आयी युवती ने उसे सहारा दियाऔर उसे ऊपर तक लेकर आयी।

युवती माइक के पास आयी और बोली-’’ये मेरी मौसी हैं-माला रावत उम्र साठ वर्ष बरेली में रहती थीं -पति और दो बेटे थे- जिनकी एक कार एक्सीडेंट में मृत्यु हो गयी।’’

तब व्यवस्थापक ने कहा-कुछ उन्हें भी कहने दो‘‘कहाँ तक पढ़ी हो आप?’’

महिला ने हॉल में नज़र दौड़ाई। सभी उसी को देख रहे थे। लाज की गठरी बनी वह काँपती आवाज में बोली, ‘‘मैं ग्रेजुएट हूँ।’’

‘‘कोई हॉबी’’

‘‘संगीत ’’

‘‘आपकी कोई शर्त ?’’

‘‘दोस्त के रूप में हमसफर चाहिये जो मेरे दुःख को समझ सके। मेरा साथ दे सके।’’

‘‘कोई बीमारी’’

अपनी उखड़ती हुयी साँस पर काबू करते हुए बोली, ‘‘बीपी हाई रहता हैसर्दी में साँस उखड़ती है’’

गोस्वामीजी और उनकी बहन स्टेज पर आने वाली हर महिला को ध्यान से देख रहे थे। अभी तक ज्यादातर महिलायें सर्विस वाली ही आयी थीं। हर महिला के जाते ही राजरानी आँखों से प्रश्न करती और हर बार गोस्वामीजी सिर हिलाकर नकारात्मक उŸार दे देते। गोस्वामीजी की निगाहें किसी जरूरतमंद को ढँूढ रहीं थी जिसका जीवन वे सवार सकें। माला के स्टेज पर आते ही वे उसका रूप देखकर ठगे से रह गये। श्वेत वर्ण कपोलों पर रक्तिम आभासएक अनोखा तेज लिये हुए चेहराचौड़ा माथा बड़ी- बड़ी आँखे सभीत हिरणी जैसी। जिन्हें देखकर सतीश को संध्या की आँखें याद हो आयीं । जब वह बोल रही थी उसके शब्द कानों के रास्ते मन में जलतरंग सी पैदा कर रहे थे। उन्हें लगा माला ही उनके लिये योग्य रहेगी।

लौटते समय राजरानी ने पूछा’’भैया आपको कौन अच्छी लगी ?’’

गोस्वामीजी नवीन से बोले , ’’तुम अपनी राय बताओ’’

नवीन बोले-’’भैया मुझको तो न 11 अच्छी लगीक्या नाम थामाला?’’

राजरानी हँसते हुए बोली‘‘रावत। हाँ भैया मुझे भी वही पसन्द है’’

गोस्वामीजी का चेहरा शर्म से हल्का गुलाबी हो चला था पर जल्द ही अप्पू का घ्यान आते ही चेहरे पर परेशानी छा गयी। वे धीरे से बोले, ’’ठीक है जैसा बहुमत हो।’’

 सम्मेलन से मिली पत्रिका में माला का पता देखा गया। फोन पर बगीचे में मिलने का स्थान और समय तय किया गया।

 दोनों परिवारों के बीच बातें हुयीं। कुछ समय गोस्वामीजी और माला ने साथ व्यतीत किया। एकांत पाते ही गोस्वामीजी ने ध्यान से माला को देखा, वे निर्निमेष ताकते रह गये। बहुत ही सलीके से उसने साड़ी बांध रखी है।उसका साइड फेस देखकर तो वे और भी चौंक गये हूबहू संध्या जैसा चेहरावैसी ही कांतिवैसी ही शांति लिये।उन्होंने उसकी चुप्पी तोड़ने के लिये बात करना शुरु की। माला के एक-एक शब्द गोस्वामीजी के ज़ेहन में उतरते जा रहे थे। शब्द का हर कतरा ऐसा लग रहा था जैसे बूंद-बूंद थाली पर गिरकर जलतरंग सा बज रहा हो। उनका शरीर कान और आँख में सिमट गया।

 विवाह के लिए रविवार का मुहूर्त निकला। राजरानी ने अप्पू को फोन लगाया । राजी खुशी के समाचार लेने के बाद राजरानी ने अप्पू से कहा, ‘‘मैं सोचती हूँ भैया विवाह करलें तो अच्छा है इस समय उन्हें एक हमसफर की सबसे अधिक जरूरत है।’’

पापा के विवाह की बात सुनकर अप्पू चौंक गयी और बोली-‘‘ऐसी भी क्या जरूरत है , इतने साल गुज़ार दिये अब कौन सा नया तूफान आया हुआ है।’’

अर्पिता को फिर से समझाते हुए बताया, ’’भैया अकेलापन महसूस करते हैं, कोई उनकी देखभाल करने वाला नहीं है। वैसे भी वे शुगर के मरीज है, और इस बीमारी में जितनी देखभाल होनी चाहिये वह तो कोई घर का व्यक्ति ही कर सकता है। ऐसे में तुम्हे या मुझे किसी को भी इतनी फुरसत कहाँ है कि उनकी देखरेख कर सकें। इसलिये मैंने बहाने से भैया को जयपुर बुलाया है। यहाँ वृद्ध महिला पुरूष का सम्मेलन था। हम लोगों के आग्रह करने पर भैया को एक महिला पसन्द भी आयी है। मुहूर्त के मुताबिक अगले रविवार को दोनों का गठजोड़ है।’’

अर्पिता बौखला गयी थी , बोली, ’’बुआजी आप भी क्या बकवास करती है ! भला इस उम्र में भी कोई ब्याह रचाता है ? अब तो भगवान का भजन करने का टाईम है। क्या इस उम्र में भी उन्हे पत्नी की आवश्यकता है?’’

‘‘देखो अप्पू, ! भैया बड़ी मुश्किल से माने हैं तुम सहमत हो जाओगी तो भैया का एकाकी जीवन समाप्त हो जायेगा। मैं व तुम दोनों ही उनकी देखभाल नहीं कर पाते ,ऐसे में एक साथी की जरूरत है जो अकेलेपन को भर सके।’’

उधर से कोई आवाज नहीं आई।

अब तक गोस्वामी जी पास आ गये। राजरानी से रिसीवर लेकर अप्पू को समझाते हुए बोले-‘‘बेटी गुस्सा थूक दा,े जल्दी से परिवार सहित यहाँ चली आओ’’

 उधर से आवाज आयी, ‘‘पापा मैं आपसेे बात करना नहीं चाहती।’’

 ‘‘इस उमर में शादी का शौक आया है आपको’’ कहकर अप्पू ने फोन रख दिया।

 गोस्वामी जी पसोपेश मंे पड़ गये। वे एक रिश्ता तोड़कर, दूसरा जोड़ना नहीं चाहते थे। बच्चों की खातिर ही तो उन्होंने अब तक अपने बारे में नहीं सोचा था। अप्पू को जब भी जरूरत पड़ी वे उसके हर फ़ैसले में साथ खड़े थे। उसने अन्तर्जातीय विवाह किया उसके लिये भी उन्होंनेे जाति बंधन की दीवारें खड़ी नहीं कीं। यह सही है कि एकाकीपन अब सहा नहीं जाताअकेलापन काटने को दौड़ता है , घड़ी की सुइयाँ ठहरी हुयी प्रतीत होती है।सबसे बड़ी बात तो यह है कि कई बातें ऐसी होती हैं , कई दुःख-दर्द ऐसे होते है, जिन्हे जीवनसाथी के संग ही बंाटा जा सकता है। नौकर न आये तो घर में कोई एक गिलास पानी पिलाने वाला नहीं होता। 

कुछ देर तक वे हताश होकर बैठे रहे। उन्होंने हिम्मत जुटाई अपने दोस्त जीवनलाल को फोन लगाया‘‘ हलो जीवन-मैं सतीश बोल रहा हूँ’’

 उधर से भी उत्साह भरी आवाज़ आयी-’’सतीश कब आ रहे हो ?’’

 ‘‘अभी कुछ दिन बाद आऊँगाएक खुशखबरी है ’’

‘‘बता जल्दी बता’’

 ‘तेरी भाभी भी साथ में आयेंगीरविवार को मेरी शादी है’’

‘‘क्यों मज़ाक करते हो यार ? आज तो फर्स्ट अप्रैल भी नहीं है’’

‘‘मैं सही कह रहा हूँ। तुम सब लोग यहाँ आ जाओ, तुम अपने ग्रुप को खबर कर देना’’

’’ ’’दूसरी तरफ एक दम सन्नाटा छा गया। गोस्वामीजी सोच रहे थे जीवन उन्हें बधाई देगा तो वे कहेंगे अब तू भी जल्दी से खुशखबरी सुनाना। लेकिन उसने रिसीवर रख दिया था।

उन्हें एक बार फिर से लगने लगा कि वे गलत फ़़ैसला कर रहे हैं। सब क्या सोचेंगे? मेरा मखौल उड़ायेंगे।

रात भर उनके मन में द्वन्द्व चलता रहा।

सुबह जब वे घूमकर लौटे राजरानी किसी से फोन पर बात कर रही थी । राजरानी के चेहरे पर चिन्ता झलक रही थी। उसने बताया-‘‘माला के यहाँ से फोन था। माला की ससुराल बालों ने दो वर्षो से उसकी कोई खबर नहीं ली थी। अब जैसे ही उन्हें पता चला है कि माला शादी कर रही है ,उन लोगों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया। वे लोग नहीं चाहते माला शादी करे।’’

बहुत रुकावटें पैदा हो गयी थीं। गोस्वामीजी नहीं चाहते थे इतनी विसंगतियों में शादी हो। उन्हें लग रहा था कि अब शादी नहीं होगी। इस विचार के साथ ही उनके मन का द्वंद्व भी खत्म हो गया।

 

शाम को माला संगीता के साथ उनके यहाँ आयी। माला के चेहरे पर ख्ूाब चिंता झलक रही थी। कुछ देर खामोशी रही।

 बात संगीता ने ही शुरू की। राजरानी की ओर देखते हुए वह बोली, ’’मौसीजी आज सुबह से परेशान हैं। इनके ससुराल वालों को इनकी शादी की भनक लग गयी। वहाँ से सुबह धमकी भरा फोन आया था।’’ फिर कुछ हकलाते हुए बोली, ‘‘दरअसल इनके देवर इनसे शादी करना चाहते हैं, वे तलाकशुदा हैं।’’

राजरानी ने कुछ सोचते हुए कहा, ’’यह तो और भी अच्छी बात है। ये उसी कुटुम्ब में अपने आप को जल्दी एडजस्ट कर लेंगी।’’

इस बार उŸार माला ने दिया, बड़े ही संयत किन्तु सहमे स्वर उसके मुँह से निकले- ’’वो मुझे नहीं मेरी सम्पŸिा प्राप्त करना चाहते हैं। सुबह तो उन्होंने यही कहा जो कुछ तुम्हारे नाम है, हमारे नाम कर दोफिर चाहे व्याह रचाओ याया किसी के संग मुँह काला करो।’’

एक सन्नाटा छा गया वहाँ। किसी को समझ नहीं आ रहा था क्या करें।

चुप्पी फिर से माला ने तोड़ी-‘‘ देवर शराब पीते हैं और दूसरी महिलाओं से भी उनके संबंध हैं इसीलिये देवरानी ने तलाक ले लिया। दो वर्षों से किसी ने मेरी खोज खबर नहीं ली। मैं कैसी हूँू ? पति व बच्चों के अन्तिम संस्कार में जो खर्चा हुआ था वह भी मुझसे ले लिया था। मेरे दुःख में किसी ने मुझे सहारा नहीं दिया। यदि मायके वालों ने साथ नहीं दिया होता तो मैं आज।’’ थोड़ा रुककर वह फिर बोली, ‘‘ वहाँ जाकर मेरा दुःख और बढ़ जायेगा। और अगर शादी नहीं की तो मुझे और परेशान करेंगे। हो सकता है मुझे मरवा दें फिर सारी जायदाद स्वतः उन्हें मिल जायेगी।’’

गोस्वामीजी को माला का बोलना अच्छा लग रहा था। अचानक माला ने गोस्वामीजी की ओर देखा ,अपनी ओर ताकता हुआ पाकर वह सकुचा गयी। माला की आँखों में उन्हें अपने प्रति आकर्षण की गहराई दिखाई दी। उन्हें उससे जुड़ाव महसूस होने लगा। काफी देर चर्चाएँ चलती रहीं। बातों में पता चला कि माला गोस्वामीजी से शादी करना चाहती है। लेकिन गोस्वामीजी बच्चों के विरोेध के कारण फ़ैसला नहीं ले पा रहे थे।इसलिये समस्या का समाधान नहीं हो पाया।

रात्रि में खाना खाते समय गोस्वामीजी ने राजरानी से कहा मैं कल वापस चला जाता हूँ , अब क्या करना रुककर?

नवीन ने कहा-‘‘अभी आप क्या करेंगे वहाँ जाकर। यहाँ आराम से रहोबच्चों को भी अच्छा लग रहा है। हम सबको नयी-नयी डिशेज खाने को जो मिल रही हैं जो खासतौर पर आपके आने के कारण राजरानी बना रही है।’’

सभी लोग मुस्कराने लगे। बोझिल वातावरण थोड़ा हल्का हुआ। गोस्वामीजी के मोबाइल पर रिंग आयी। वे चौंक गये राजरानी उनके चेहरे को पढ़ते हुए बोली, ‘‘किसका फोन है?’’

अरे आज तो वरुण का फोन आया है। सब आश्चर्यमिश्रित हर्षातिरेक में आ गये। गोस्वामीजी ने स्पीकर ऑन कर दिया। कॉल रिसीव करके उमगते हुए कहा -‘‘‘हाँ बेटा कैसे हो?’’

इस बात का कोई उŸार नहीं आया बल्कि उनसे ही प्रश्न पूछा गया , ‘‘पापा क्या आप शादी कर रहे हैं?’’

वे अचकचा गये, क्या उŸार दें‘‘तुम्हें किसने बताया ? सात समुंदर दूर मेरी बीमारी की खबर तो नहीं पहुँची अलबत्ता विवाह की खबर पहुँच गयी।’’

‘‘अप्पू का फोन आया था’’

‘‘ और क्या कहा अप्पू ने?’’

उधर से झल्लाया हुआ वाक्य ,‘‘पापा आप शादी-वादी नहीं करें। इस उम्र में शोभा देगा क्या ? देखिए हम लोगों की भी इमेज का सवाल ह ै?’’

पश्चिमी सभ्यता में रचा बसा उनका बेटा आज अच्छे बुरे की वकालात कर रहा है।

‘‘ फिर आप समझते क्यों नहीं प्रोपर्टी का क्या होगा ?’’ इस वाक्य ने उनके पैरों तले जमीन खिसका दी। अब उन्हें समझ आया कि वरुण क्यों जिद कर रहा था कि सब कुछ बेचकर उसके पास चले आओ।

गोस्वामीजी बेटे के मोह में सब कुछ बेचकर जाने को तैयार भी हो गये थे। अखबार के विक्रय कॉलम में विज्ञापन भी दे दिया था। उन्होंने खुशी-खुशी फोन करके बेटे को इसकी सूचना देना चाही , तब बातों मे पता लगा कि वो उन्हें अपने साथ नहीं वरन् ’’सीनियर सिटीजन हाऊस’’ में रखना चाहता है जो एक तरह से वृद्धाश्रम है।

उन्होंने वरुण को कोई उŸार नहीं दिया, मोबाइल बन्द कर दिया। वे कुछ फैसला नहीं ले पा रहे थे। राजरानी और नवीन भी अचंभित थे वरुण की बात सुनकर। इतने वर्षों बाद फोन, वो भी इस तरह से

गोस्वामीजी के हृदय में तूफान उठ रहा था। उन्हें अब समझ आ रहा था कि अब तक वरुण शान्त था, क्योंकि उनकी सारी सम्पŸिा उसी की तो थी पर अब छिनने का भय उसके मस्तिष्क पर हावी हो रहा था।

वे कमरे में चहलकदमी करने लगे। सब शान्त थे पर अन्दर हलचल लिये। उन्होंने सबके चेहरों की ओर देखा फिर मोबाइल पर कॉल करने लगे। उधर अर्पिता थी। उसनेे पापा से सबसे पहला प्रश्न किया-‘‘ पापा आपने क्या सोचा?’

‘‘बेटा तुम क्या चाहती हो ?’’

‘‘पापा इतनी उम्र गुज़र गयी अब क्या करेंगे शादी करके ?’’

’’माला को भी जरूरत है मेरी ’’

‘‘दो दिन में ही आप अपने रक्त संबंधों को भूलकर दूसरे के बारे में सोचने लगे ’’’’नहीं ये बात नहीं है बेटा मुझे समझने की कोशिश करो।’’

’’तो ठीक है लुटा देना अपना पूरा पैसा उस दूसरी औरत पर’’

यह दूसरा अवसर था जब गोस्वामीजी हक्के-बक्के रह गये ।अब उन्हें समझ आ रहा था कि बच्चे उनकी शादी का विरोध क्यों कर रहे हैं ?

वे रातभर करवटें बदलते रहे ,एक निश्चित किन्तु दृढ़ निर्णय लेने के लिये। जैसे दही मथने के बाद मक्खन ऊपर तैर आता है।

वे निरन्तर सोच में डूबे रहे मैंने अपने बच्चों के सुख के लिये अपने सुख-वैभव के दिन यों ही अकेले गुज़ार दिये। जब जिसने जो इच्छा की हर संभव पूरी की। बेटे ने विदेशी लड़की से शादी करना चाही मैंने विरोध नहीं किया। लड़की ने अन्तर्जातीय विवाह करना चाहा मैंने सहमति दी समाज और रीति परंपराओं के विरुद्ध जाकर । उन लोगों के हर सुख के आगे अपनी इच्छायें, आकांक्षाये सब कुर्बान कर दीं। संध्या की मृत्यु के बाद कितने रिश्ते आये थे कुँवारी लड़कियों के भी आखिर वे बैंक की नौकरी में थे और हर दृष्टि से योग्य भी। बच्चों को कोई असुविधा न हो या समाज बच्चों के मन में ’सौतेला’ शब्द न उगा दे यही सोचकर वे बच्चों में ही डूबे रहे।अब मैं अकेला हँू नितांत अकेला । उन लोगों को सम्पŸिा से मोह है ,मुझसे कोई सरोकार नहीं । मेरे प्यार का, मेरे विश्वास का, मेरी आत्मीयता का अच्छा सिला दे रहे हैं ये लोग। उनके मन में एक जिद पलने लगी।

जयपुर आने से पूर्व वे भी नहीं चाहते थे विवाह करना। पर यहाँ आकर, माला से मिलकर एक ख्वाब पलने लगा है मन में, जीवन में फिर से वो बहार लौटती लगती है। उधर माला के परिजन भी उसकी संपत्ति चाहते हैं। हम किसी की परवाह नहीं करेंगे।हम विवाह जरूर करेंगे। यह तय करते ही उनके मन में उत्साह के स्फुलिंग जग उठे। उन्हे लग रहा है पतझड़ के बाद बसन्त आ रहा है। सुखद कल्पनाओं में वे विचरण करने लगे। संध्या और माला माला और संध्यादोनों चेहरे एकमेव हो रहे थे। वही अहसासवही चाहत वही आकर्षण और वही जलतरंग।

इसी ऊहापोह में भोर हो गई । प्रातःकालीन सैर के लिए लोग निकलने लगे थे। आज गोस्वामीजी ने जल्दी ही बिस्तर छोड़ दिया और नित्य कर्म से निबट गए। उन्होंने राजरानी और नवीन को बुलाकर अपना फ़ैसला सुना दिया कि वे माला को ही अपना जीवनसाथी बनायेंगे। वे तैयार हुए और माला के घर की ओर चल दिए।


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