एक फूल
एक फूल
एक सुबह उठा तो ख़याल किया,
आसमान को देखकर प्रणाम किया।
एक ख़याल जो मेरे दिलो-दिमाग में घर कर गया है,
फूलों के उस पौधे ने मुझे अपनी सुगंध में जकड़ लिया है।
बारिश का महीना है, एक पौधा तो मुझे भी अपने घर लगाना है।
मुझे फूल पसंद हैं— झड़ते हुए फूल, गिरते हुए फूल, बिखरे हुए फूल। कैसे भी, कोई फूल की कली फूटती हुई, उसकी छोटी-छोटी कोंपलें निकलती हुईं, कैसे भी परिस्थिति में हो, मुझे फूल पसंद है। इसी ख़याल से इसी भाव से उसी सुबह मैं एक फूल का पौधा घर ले आया।
घर में जगह बहुत थी, पर डर भी था। उस फूल के खो जाने का डर, उसके अस्तित्व मिट जाने का डर, डर उस दरख़्त को किसी जानवर द्वारा खा जाने का। मुझे अब ज़्यादा डर लग रहा था, हालाँकि स्नेह अब पहले से बढ़ गया था। मैं उस पेड़ के और करीब आ गया था।
नानी ने ज़रा भी देर न करते हुए उस पौधे को आँगन में जगह दी, जैसे किसी नवजात बच्चे को घर का सबसे सुरक्षित स्थान। पर बात ये भी थी कि मैंने उस पौधे को ऐसे पकड़ रखा था, मानो वो सच में अभी-अभी जन्मा हुआ बच्चा हो। और वैसे देखा जाए तो ये सच ही तो है। वो छोटा-सा एक पौधा अभी एक बच्चा ही तो है।
मैंने उस बच्चे रूपी पौधे की परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ी। वैसे तो मैं बेपरवाह, आलसी, नाकारा हूँ। पर आजकल मुझे थोड़ी चिंता-सी रहती है। हर उस बात की, जिसमें उसके खोने का भाव आता है। वो फिर चाहे घर की खिड़की खुली छोड़ देना हो, किसी घर के ही जानवर के अंदर आ जाने से, तेज़ धूप से, तेज़ बारिश से, ओलावृष्टि से।
वैसे तो ओलावृष्टि दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है, पर इसका ख़याल मात्र ही मुझे अंदर से झकझोर के रख देता है। वैसे तो इस मासूम-से पौधे का किसी से कोई बैर नहीं है, फिर भी नानी मुझे बताती रहती है, “ध्यान रखा करो, ज़माना बहुत खराब है।” और मैं भी हामी भर देता हूँ।
पौधा धीरे-धीरे बड़ा हो रहा है। उसकी कोंपलें अब लंबी हो रही हैं। सुबह-सुबह जब उठकर देखता हूँ, सुकून-सा आ जाता है। और उस पल में मेरे अंदर कोई भय नहीं है। सारा डर उसे देखकर गायब हो जाता है।
अब शायद कुछ बदलने वाला वाला है। पौधा बड़ा हो गया है। उसकी ज़रूरतें बढ़ गई हैं। मुझे पहले लगा था कि बड़ा होने के बाद उसका ध्यान कम रखना पड़ेगा, लेकिन मैं इतना भी ठीक नहीं था। अब उसका ध्यान ज़्यादा रखना पड़ता है। पर अब इस पौधे ने वक़्त के साथ-साथ, हवा के थपेड़ों के साथ, बारिश में, तेज़ धूप में, हर मौसम में खुद को और मज़बूत बना लिया है। अब वो वक़्त आने वाला है जिसके लिए मैं व्याकुल हूँ, जिसके लिए मैंने इसे पानी दिया, ध्यान रखा, इसे हर मार से बचाया।
अब इस पर फूल लगने वाला है।
ऐसा नहीं है कि मुझे पौधा पसंद नहीं है, पर दिल तो फूल से लगा है। से बादल भी पसंद हैं, पर बारिश मुझे अच्छी लगती है। जैसे बारिश भी ठीक है, पर उसके बाद की ठंडी हवा की बात ही कुछ और है। जैसे ठंडी हवा अच्छी है, पर उसके बाद की नींद मुझे बहुत प्यारी लगती है। नींद बहुत अच्छी है, पर नींद में उस फूल का ख़याल—उसका नाम ही सुकून है।
दरअसल, ये तय है कि जैसे ही फूल लगेगा, पौधे की अहमियत कम हो जाएगी। अब मैं फूल को देखूँगा, क्योंकि मुझे वही तो चाहिए था। देखा जाए तो पौधा एक ज़रिया था फूल तक पहुँचने का, उसे पाने का
पर...
असल मायने में देखा जाए तो क्या सच में उसकी अहमियत कम हुई है?
शायद हाँ, शायद नहीं।
आपको क्या लगता है ये मायने रखता है. असल में कौन जानता है इस बात को? दो लोग ही—खुद पेड़ और उसका फूल।
फूल को पता है उसे कितनी ज़रूरत है। और पेड़ को तो हम कभी समझ ही नहीं पाए थे। पर इसके अलावा भी कुछ है, कुछ जो जानते हैं, समझते हैं, महसूस करते हैं। और फिर फूल को निहारकर चले जाते हैं।
आज सुबह उठा तो थोड़ी ठंड थी। सुबह आँखें खुल नहीं रही थीं। वैसे भी सुबह आँखें नहीं खुलतीं। काफ़ी जद्दोजहद के बाद मेरी आँखें धीरे-धीरे खुल रही थीं और मेरी पहली नज़र ही उस पौधे पर पड़ी।
मेरी हर सुबह उसे देखकर ही शुरू होती थी। आज भी वैसा ही था। पर जैसे ही मेरी नज़र उस फूल पर पड़ी, वहाँ फूल नहीं था। जबकि रात को मैं बड़े इत्मीनान से उसे देखकर सोया था। उसे पहली बार उस रात मैंने छूकर देखा था। पेड़ के तने और आदमी में कोई ज़्यादा फ़र्क नहीं है। दोनों ही हार्ड दिखते हैं, होते भी हैं, फिर भी तरलता से जीते हैं, उसे ही चलाते हैं। दोनों उसी कोमल भाव को चाहते हैं, उसमें एक सुकून-सा है।
उस पेड़ को देखकर मैं सोचता हूँ कि कितना ख़ुशनसीब होगा। वो हर पल उसकी ख़ुशबू में लीन होता होगा, हर पल उस कोमल एहसास को पाता होगा, हर पल उसे निहारता होगा। क्या ये उसके कठोर होने का फल है? जो भी है, पेड़ को भी फूल पसंद है।
मुझे नहीं पता था कि रात को मैं उसे आख़िरी बार देख रहा हूँ। फिर मैं उस सोच में डूब गया कि क्या होता अगर मुझे पता होता तो? आप सोचिए, अगर आपको पता होता तो?
कुछ बदलता? हाँ... और नहीं भी।
हाँ, मेरा उसे देखने का नज़रिया बदल जाता। मैं उसे उस आख़िरी बार में पूरा समा लेना चाहता। उसे ऐसे स्पर्श करता कि मानो आज का ये एहसास कभी मुझसे अलग नहीं होगा।
पर ये सब सच तो नहीं है। सब एक एहसास है, जो अधूरा रह गया।
तुम्हारा ख़याल जैसे रात का अधूरा सपना है
टूटा हुआ तारा, पर जैसे अपना है।
ख़यालों के समंदर में एक तुम्हारा ही तो ख़याल अपना है,
पर सच तो ये है, ये भी एक सपना है।
और क्या पता अच्छा हुआ मुझे पता नहीं चला। क्या पता वो आख़िरी मुलाक़ात उसके लिए भी खराब होती। ये भी हो सकता है कि मैं उसे रोकना चाहूँ। अपने पास रखने के लिए। वैसे तो मैं नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता, पर क्या पता उसके जाने मात्र के भाव से मेरा इरादा बदल जाए। हो सकता है!
इरादे ऐसे ही तो बदले जाते हैं,
जैसे हालात बदलते नहीं, बदल दिए जाते हैं।
और ये बिल्कुल वैसे ही है,
जैसे दिल टूटते नहीं, तोड़ दिए जाते हैं।
ऐसे ही तो होता है।
इंसान क्यों बदलते हैं , किसी के ख़ातिर बदलते हैं,
किसी का होने को बदलते हैं, किसी को रखने के लिए बदलते हैं।
अब मेरा ख़याल क्या है, अब मेरा खुद से सवाल क्या है?
कि मैं भँवरे की तरह फूल को चाहूँ , या खाद की तरह उसकी जड़ों में समा जाऊँ।
मैंने जवाब तय कर लिया है। मेरा लहज़ा पेड़ के लिए नरम कर लिया है।
मैंने खुद को हवा और पेड़ को फूल कर लिया है।
