एक दर्णप
एक दर्णप
एक दर्पण
“कहानियाँ और कुछ नहीं, ज़िंदगी का दर्पण हैं।”जयपुर के एयरपोर्ट पर आज ज़्यादा भीड़ नहीं थी। मेरी फ्लाइट दोपहर में लैंड की थी, तो धूप थोड़ी ज़्यादा थी। मैं एयरपोर्ट से बाहर निकलकर होटल की कैब का इंतज़ार कर रहा था, पर न तो उनका फोन लग रहा था, न उनका कोई ड्राइवर एयरपोर्ट के बाहर पिकअप पॉइंट पर खड़ा था। एक छोटे इंतज़ार के बाद मैंने खुद से कैब करना ही मुनासिब समझा और मैं होटल रिसेप्शन पहुँच गया।
“तुम लोगों का रोज़ का है, तुम लोग ऐसे ही करते हो और बाद में जब गेस्ट यहाँ पहुँचता है गुस्से से, तुम एक भोले-भाले इंसान को एक गंदी सी स्माइल के साथ सॉरी का बोर्ड पकड़ा देते हो। नहीं, मैं वहाँ 20 मिनट तक वेट कर रही थी, पर न तो तुमने कॉल उठाना ज़रूरी समझा और न कोई आया। फिर पैसे किस बात के लेते हो?”
एक लेडी होटल वालों पर चिल्ला रही थी। उसका दुख भी मेरे जैसा ही था। धूप से परेशान और सबसे बड़ा, खुद के पैसों से कैब करके आने का दुख। मैं भी पहुँचा उसी लाइन में। अब मैं क्या गुस्सा करता, शायद मेरे हिस्से की मेहनत किसी और ने कर ली थी। तो बस मैं चाबी लेकर कमरे में चला गया।
मेरा 15 दिन का स्टे था। आज 13 दिन हो गए थे। रात के करीब 12 बज गए थे। सोने में देर हो गई। सुबह ऑफिस भी जाना था। फिर भी सुबह आँखें देर से खुलीं, देर इतनी कि होटल का ब्रेकफास्ट लगभग बंद होने वाला था। और मुझे इतनी भूख भी नहीं थी कि ब्रेकफास्ट करूँ, लेकिन मुझे चाय पीनी थी और इसके लिए मुझे डाइनिंग हॉल में जाना पड़ा।
मैं जैसे उठा था, उसी हालत में चला गया। बस खुशनसीबी से मुँह धो लिया था। चलते-चलते उँगलियाँ बालों में फेर ली थीं। और मुझे लगता अभी भी है कि इतना तैयार होना ब्रेकफास्ट के लिहाज़ से काफ़ी है।
मैं चाय वाले काउंटर पर खड़ा था। चाय में चीनी मिलाने के लिए स्टिक देख रहा था कि मेरी नज़र पास में ही तैयार हुई एक लड़की पर पड़ी। ड्रेस और मेकअप देखकर अंदाज़ा लग गया कि एयर इंडिया एयरलाइंस से है।
हाँ, मैं बताना भूल गया कि मैं भी एयर इंडिया में काम करता हूँ। और मैंने भी हाल ही में जॉइन किया था।
तो मैंने “हाय” किया और वह “हाय” बोलकर निकलती, उससे पहले मैंने दूसरा सवाल उस पर दाग दिया—
“न्यू जॉइनी?”
तब उसने थोड़ा इंटरेस्ट जाहिर किया और बोली, “हाँ।”
तो मैंने बताया, “मैं भी इसी में काम करता हूँ।”
उसने अंग्रेज़ी में कहा—
“Likewise.”
और फिर मैं अपनी चाय लेकर कमरे में आ गया और वह कोने की एक टेबल पर जाकर बैठ गई।
मैं कमरे तक आते-आते पहले तो “LIKEWISE” का मतलब खोजने लगा और फिर एक हल्की मुस्कान मेरे चेहरे पर छा ही रही थी कि अचानक कुछ हुआ, और यादों में बसा 8-9 साल पहले का एक चेहरा आँखों के आगे घूमने लगा।
ऐसा नहीं था कि दोनों शक्ल एक जैसी थीं या एक ही थीं। नहीं, बहुत फ़र्क था। फिर भी मन ही मन कहे जा रहा था—
वैसी ही आँखें...
वैसा ही बात करने का अंदाज़...
वैसे ही हाव-भाव...
मैं कमरे में बैठा-बैठा उन यादों में गोते लगा रहा था कि अचानक फोन बजा।
फोन ऑफिस से ही किसी कॉल का था।
रात को आने तक मुझे दोबारा उसका ख़याल नहीं आया और न ही...
मैंने उसे देखा, पर रात को खाना खाने के बाद जैसे नींद आने का नाम ही नहीं ले रही थी और वह 8 साल पुरानी किताब के पन्ने एक बार फिर से पलटने लगे।
चलो, मैं आपको शुरू से बताता हूँ। इसको एक कहानी की तरह सुनो।
“कहानियाँ और कुछ नहीं, ज़िंदगी का दर्पण हैं। एक मेरा दर्पण आपके सामने है!”
शालिनी
बातें कुछ बीते दिनों पुरानी हैं, जब हम स्कूल गाँव के पास वाले शहर में जाया करते थे।
ज़िंदगी में कुछ-कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो आपको जीवन भर नहीं भूलतीं। कुछ-कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें आप भुलाना चाहो, फिर भी नहीं भुला सकते। वैसा ही कुछ पहली बार मेरे साथ हुआ।
मेरा बचपन बहुत ही सीधा-सादा रहा है। खेल-कूद और खाना-पीना ही हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता थी, और यही हमारे लिए एडवेंचर और एक्साइटमेंट पैदा करता था। इसी में हम खुश थे।
हम से मेरा मतलब मैं और मेरा एक भाई, पीके।
हम 12वीं कक्षा में मैथ्स स्ट्रीम में थे। मैथ्स और बायोलॉजी में एक कॉमन विषय होता है—केमिस्ट्री।
वैसे मुझे केमिस्ट्री विषय से कुछ खास लगाव नहीं था, लेकिन पहले तो उसके शिक्षक से हुआ। पढ़ाते अच्छे थे या नहीं, यह मैं समझ नहीं पाया क्योंकि उतना ध्यान दिया नहीं, लेकिन वह बोलते अच्छा थे, मज़ाक अच्छा करते थे और इधर-उधर की चीज़ें ज़्यादा बताते थे, जिसे वह कहते थे—“लाइफ लेसन”।
मेरा वह सबसे प्रिय अध्याय बन गया।
फिर इसमें ऐसा हुआ जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
ऐसा ही एक सामान्य दिन था। हम कक्षा में बैठे थे और वही सबसे प्रिय अध्यापक जी कक्षा में पढ़ा रहे थे, कुछ बता रहे थे।
एक पेंसिल बड़ी अजीब सी और खूबसूरत सी मुझे परेशान कर रही थी। मेरा ध्यान बार-बार उस पर जा रहा था, जो कि उँगलियों में तमर बेल की तरह लपेटे हुए थी और बार-बार कान के पास जाकर झुमकों से टकरा रही थी।
इसके अलावा मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
हम कक्षा में लगभग पीछे ही बैठे थे। यह पेंसिल मुझे दिखाई दे रही थी। मुझे कुछ धुँधला सा याद है, पर वह आगे से दूसरी बेंच थी, खिड़की के पास वाली सीट।
मुझे वे लोग पसंद हैं जिन्हें खिड़की के पास वाली जगह अच्छी लगती है। वे शायद अपने बारे में कुछ कहना चाहते हैं। उनमें कुछ ऐसा दबा रहता है, एक पिंजरा रहता है जिससे वे बाहर जाना चाहते हैं। उनको उड़ते पंछी एक उम्मीद देते हैं।
मैं अब पीछे असहज महसूस कर रहा हूँ। मुझे अब उस पेंसिल से ज़्यादा वे झुमके दिखाई दे रहे हैं।
और बड़े ही प्यारे झुमके थे।
मैंने फिल्मों के अलावा ऐसे झुमके पहली बार देखे थे।
मुझे एक बार को लगा कि मुझे उस पेंसिल से बड़ी शिकायत होने लगी है, क्योंकि वह बार-बार जाकर उनसे लग रही थी, हिल रही थी, और मुझे वे ठीक से दिखाई नहीं दे रहे थे।
कुछ देर निहारने के बाद मालूम पड़ा कि सारा दोष उन पेंसिल वाली उँगलियों का है, जो उन्हें तंग कर रही हैं।
आप किसी चीज़ को आँखों से देख सकते हो, लेकिन आपका नज़रिया क्या है उस चीज़ को देखने का, वह आप पर निर्भर करता है।
मेरी तमाम कोशिशों के बाद भी मुझे सिर्फ उतना ही हिस्सा दिखाई दे रहा था।
पता नहीं, अब मैं उसी पल में खुश था। मेरे अंदर की जो ज़िद थी देखने के लिए, वह एक पल के लिए रुक गई थी।
अब वे झुमके हिल नहीं रहे थे, न वह पेंसिल दिखाई दे रही थी। शायद बोर्ड पर कुछ लिखाया था, जिसे वह लिखने में व्यस्त हो गई।
अब वह बिल्कुल शांत थे, जैसे बंद घड़ी की सुइयाँ।
मैं उसे बड़े ही गौर से देख रहा...
...था, जैसे कोई कारीगर अपने ही बनाए हुए किसी कसीदे की परख कर रहा हो।
फिर से एक ज़ोर से पेंसिल आकर उनसे टकराई और वे इतनी तेज़ी से हिलने लगे जैसे बारिश में तेज़ तूफ़ान आए और सारे पेड़-पौधे झूमने लगें।
और अचानक से मेरे कंधे पर हाथ पड़ा कि पीरियड पूरा हो गया है।
पीके ने कहा, “चल नीचे चलते हैं।”
“चलो नीचे चलते हैं।”
मैंने वापस से उसी खिड़की पर नज़र घुमाई, पर अब खिड़की पर कोई नहीं था।
मैं सीढ़ियों से उतरते वक्त यही सोच रहा था और मन ही मन समझने की कोशिश कर रहा था कि हुआ क्या था।
और सबसे ज़रूरी बात, वह लड़की थी कौन?
अब मैं उसको कैसे पहचानूँगा?
हमारी क्लास से तो नहीं थी शायद। और होगी भी तो क्या उसने आज ही ये झुमके पहने हैं? या पहले भी?
अगर पहले पहने होते तो मेरा ध्यान क्यों नहीं गया?
सब चीज़ों पर मेरा ध्यान जाए, यह ज़रूरी तो नहीं।
तो फिर बायो से है...
बायो से है...
पर बायो की क्लास भी पहले साथ में हुई है?
क्या इसने लेट जॉइन किया है?
क्या इसने आज ही ये झुमके पहने हैं?
अगर इसने दोबारा नहीं पहने तो मैं कैसे जानूँगा?
पर...
उफ़्फ़...
बचा हुआ दिन गुज़रता गया। धीरे-धीरे दिन ढलता गया। शाम हुई अफ़साने में।
शाम को खेलकर थक-हार कर वापस आया। माँ के पास लेटा था। इधर-उधर की बातें चल रही थीं। मैं आसमान को देख रहा था। उनकी बातों में “हम्म”, “हाँ” के हुंकारे लगा रहा था।
बातों-बातों में माँ ने बताया—
“वो देखो, चाँद। आज ईद है।”
मैंने चाँद को देखा।
देख रहा था।
मैंने भी कहा, “अच्छा, ईद है।”
एक लंबे विराम के बाद माँ ने कहा—
“ये ईद का चाँद है, कभी-कभी दिखाई देता है।”
एक हल्की सी मुस्कान मेरे चेहरे पर आ गई।
और मैंने भी हामी भरते हुए, वही मुस्कुराहट चेहरे पर लिए हुए कह दिया—
“ईद का चाँद सच में कभी-कभी ही दिखाई देता है।”
मैंने एक उम्मीद के साथ माँ से पूछा—
“ये फिर कब दिखाई देगा?”
माँ ने कहा—
“अगली ईद पर।”
“अगर मुझे कल फिर से देखना हो तो?”
माँ ने भी सारे सवालों के जवाब को किस्मत के भरोसे छोड़ते हुए कहा—
“फिर तुम्हारी किस्मत।”
कभी-कभी ज़िंदगी में तर्क से ज़्यादा भावनाएँ हावी होती हैं।
और वे तर्क से ज़्यादा सुंदर होती हैं।
वैसे तो मैं इस घटना को भूल सा गया था, लेकिन हमारे अवचेतन मन में एक टैब खुली रह जाती है और वह बैकग्राउंड में चलती रहती है। जैसे ही उससे जुड़ा कुछ मिलता है, वह सक्रिय हो जाती है।
मुझे कुछ मिला नहीं।
दो हफ़्ते बाद इंटरवल में मैं और पीके नीचे मटकों से पानी पी रहे थे।
लड़कियों के एक समूह के हँसने की आवाज़ सुनाई दी—
“ये मुझे दे दो प्लीज़। तुम मेरी अच्छी दोस्त हो ना, दे दो प्लीज़।”
और जब तक मैं पलटकर देखता, उन्हीं में से एक आवाज़ आई—
“नहीं, ये मैं नहीं दे सकती। ये मेरी मम्मी ने मुझे ईद पर दिए थे।”
..................
ठहराव
मेरे जैसे अंदर के सारे तार हिल गए।
पीछे मुड़कर देखा तो दिन में मुझे ईद का चाँद दिखाई दे रहा हो।
मुझे वह बात याद आई—
“हाँ, फिर मेरी किस्मत...”
मेरी पलकें जैसे एक पल के लिए भी झपकने को तैयार नहीं थीं। बस देखे जा रहा हूँ... देखे जा रहा हूँ।
मैंने इतने गौर से शायद ईद के चाँद को भी नहीं देखा था, जितने गौर से मैं उस झुमके को, झुमके वाली को देख रहा हूँ।
मेरे दिमाग में उस समय कुछ नहीं चल रहा था। शायद दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। शायद तर्क पर भावनाओं ने नियंत्रण कर लिया था।
और इन सब के बीच मैं पाँच गिलास पानी पी चुका था। अचानक मेरा ध्यान टूटा और पीके ने कहा—
“ऊँट है क्या? और कितना पिएगा?”
मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैंने कुछ पा लिया हो। कुछ खोया हुआ ढूँढ़ लिया हो। जैसे कोई खाली पड़ा कोना, जिसका कुछ हिस्सा भर सा गया हो।
कुछ तो बात थी उस बिना ईद के, ईद का चाँद देखने वाले दिन में।
ज़्यादा कुछ नहीं हुआ।
बिना हाव-भाव वाले चेहरे पर एक मुस्कान की परत ओढ़ ली मैंने।
ज़्यादा कुछ नहीं हुआ।
पानी को अमृत समझ लिया मैंने।
ज़्यादा कुछ नहीं हुआ।
क्लास में सीट बदल ली मैंने।
बस इतना तो बनता है...
ज़्यादा कुछ नहीं किया।
मैंने उसका नाम पता लगा लिया।
उसके आने-जाने के समय को अपना टाइमटेबल बना लिया मैंने।
ज़्यादा कुछ नहीं किया...
पर शराफ़त ऐसी कि उसको क्या, उसके देवताओं को भी ख़बर नहीं कि क्या हो रहा है।
मुझसे ज़्यादा मेहनत न हुई।
मैंने ज़्यादा कुछ न किया। न कभी उसके पीछे गया, न उसका रास्ता रोका।
बस संयोग से एक मुलाक़ात हो जाया करती हर रोज़।
संयोग से...
ठहराव
उसका नाम शालिनी था।
शालिनी।
संयोग से एक टकरार में वह मिल गई स्कूल आते समय।
पता नहीं, हम लड़के यूँ तो स्कूल में, ग्राउंड में खेलते हुए, बाहर चलते हुए किसी से भी भिड़ जाते हैं। दो मार आते हैं, दो खाकर आ जाते हैं।
पर इसमें एक सा डर और खुशी दोनों हैं।
कभी-कभी तो समझ नहीं आता 16 साल के लड़के को कि कौन सी भावना सच है।
जैसे ही हम क्रॉस कर रहे थे, एक आवाज़ मुझे लगी।
वह डर की थी, इतना मुझे यक़ीन हो गया था।
उसने कहा—
“राजेश... तुम राजेश हो ना?”
अगर डर न होता तो मैं हकलाकर अपना ही नाम न बताता, जो मैं बचपन से सुनता आया हूँ।
मेरी हालत का अंदाज़ा लगाकर उसने कुछ कहा नहीं और इशारे से पूछा—
“चलें?”
मैं पढ़ाई में उतना अच्छा तो नहीं था, लेकिन मैथ्स में अच्छा था। जटिल से जटिल समीकरण समझ आ जाते थे।
ये वाला ऐसा लग रहा था जैसे पाठ्यक्रम से बाहर हो।
मैं बिना कुछ कहे उसके साथ चलने लगा।
पहली बार उससे अपना नाम सुनकर अच्छा भी बहुत लगा और सबसे ज़्यादा अच्छा इस बात का लगा कि उसे मेरा नाम पता है।
ये खुशी किसी समीकरण को हल करने या कोई मैच जीतने से भी ज़्यादा मालूम हो रही थी।
इस दुनिया में बहुत सी चीज़ें झूठ लगती हैं जब तक खुद पर न बीती हों।
बहुत सी कहानियाँ झूठी लगती हैं जब तक खुद उनको न जिया हो।
ऐसा नहीं है कि मैं ही झिझक रहा था।
मेरा नाम लेने के बाद उसने भी एक शब्द नहीं बोला।
जब गले से हिम्मत न...
...हुई तो आँखों ने हालात को संभाला और बातचीत शुरू हुई।
हमने बिना बोले बहुत सी बातें कीं।
कुछ मेरे समझ में आईं, कुछ नहीं।
पर मज़ा बहुत आ रहा था।
मैंने हिम्मत जुटाकर पूछा—
“आपको मैं कब से जानता हूँ?”
और वह हल्की सी मुस्कान के साथ बोली—
“जब कोई चार गिलास पानी पी रहा होता है किसी को एकटक देखते हुए, तो नज़र तो आ ही जाता है।”
मैंने कहा—
“पाँच।”
शालिनी— “सॉरी?”
मैं— “पाँच गिलास पिए थे।”
शालिनी— “अच्छा!”
हँसते हुए बोली—
“पहला वाला मिस हो गया फिर।”
शालिनी— “आप इधर ही रहते हो?”
मैं— “हाँ, यहीं पास में ही कमरा है।”
शालिनी— “आप सच बोल सकते हैं।”
मैं— “हम्म... नहीं, इधर तो काम से आना-जाना होता है।”
शालिनी— “हर रोज़?”
मैं— “आप नोटिस करती हो क्या कि मैं रोज़ आ रहा हूँ या नहीं?”
शालिनी— “नहीं, मैंने बस देखा है काफ़ी समय से।”
मैं— “आप सच बोल सकती हैं।”
और फिर हम दोनों हँसने लगे।
फिर उसने पूछा—
“और क्या-क्या मालूम किया मेरे बारे में?”
मैं— “ज़्यादा कुछ नहीं किया, बस...”
आगे उसकी मुस्कान ने जैसे सब कुछ बयाँ कर दिया। जैसे सब पता हो उसको।
मैंने भी पूछ लिया—
“मेरे बारे में क्या-क्या जानती हो?”
शालिनी— “ज़्यादा कुछ नहीं। बस इतना कि मैथ्स में ठीक हो, खेलना पसंद है, गाने और फ़िल्में देखते हो, पढ़ने का शौक़ रखते हो, गाँव से आते हो, हर रोज़ किसी का इंतज़ार करते हो... अच्छे लड़के मालूम पड़ते हो।”
मैं— “और?”
शालिनी— “और... और तुम बताओ। तुम्हारे बारे में तुमसे ही जानना है। मैं सुन रही हूँ।”
मेरे लिए “आप” से “तुम” का सफ़र जैसे पहाड़ सा लगा था।
उसने एक ही झटके में उसे सीढ़ी जैसा बना दिया।
मैं— “मैं तो एक खुली किताब हूँ। जिस भी पन्ने को पलटोगे, बड़ी सादगी से खुद को लिख रहा होगा।”
शालिनी— “बातें बनाना बड़ी अच्छी तरह आता है तुम्हें। कहाँ से सीखी?”
मैं— “बातें बनाता नहीं हूँ, जो आता है दिल में होता है, वही ज़ुबान पर है।”
थोड़ी देर के लिए जैसे सन्नाटा सा हो गया। बिना बोले हम चल रहे हैं।
थोड़ी देर बाद उसने पूछा—
“तुम्हें मुझमें क्या अच्छा लगा?”
मैंने भी हँसते हुए कह दिया—
“कुछ नहीं।”
और एक अनकही कहानी शुरू हो गई।
मुझे ऐसा लगता है कि जब हमें कोई पसंद आता है, तो बेशक हम कहते हैं कि वह सुंदर है, हैंडसम है, लेकिन ये मायने सबके लिए अलग-अलग हैं। किसी के लिए कोई सुंदर है, किसी के लिए कोई और।
अगर बाहरी सुंदरता ही सब कुछ होती, तो हम सबको एक ही इंसान क्यों नहीं पसंद आता?
क्यों हम सबने अलग-अलग लोगों को चुना हुआ है?
हमें उसकी सुंदरता के अलावा उसका लहजा, उसका अंदाज़, उसका किरदार पसंद आता है।
अच्छा, इसका एक सीधा सा दूसरा उदाहरण है—अपने दोस्त।
क्या आपको लगता है कि आपके सारे दोस्त ख़ूबसूरत हैं? 😅
हैं ना?
और वो कैसे भी हों, हमें वही चाहिए क्योंकि उनका किरदार पसंद है।
मेरे पास सच में कोई जवाब नहीं था।
जिस इंसान को देखने मात्र से आपको खुशी मिलती है, जिसकी आवाज़ आपको सुकून देती है, वह आपके लिए बहुत अच्छा है।
जब एक आदमी औरत को, जब एक लड़का लड़की को लिखता है, तो वह उसकी सुंदरता का बखान करेगा। पर जब वह उससे मिलता है, उसे जानता है, तब उसको मालूम होता है असल में औरत होना।
और उसको जानना ही उसके लिए प्यार की सबसे बड़ी जीत है।
सब अच्छा चल रहा होता, पर सब अच्छा कैसे चल सकता है?
एक हफ़्ता बीत गया था। मैंने उसका चेहरा तक नहीं देखा था।
और इंतज़ार किया।
दो-तीन हफ़्ते बीत गए।
फिर मैंने हिम्मत जुटाकर बायो की क्लास में किसी लड़की से उसके बारे में पूछा।
तो उसने बताया कि राधिका उसकी दोस्त है। उसको कुछ मालूम होगा, तुम उससे बात कर लो।
जब मैं राधिका से मिला तो शायद वह मुझे थोड़ा-बहुत जानती थी। हो सकता है उसी से सुना हो।
राधिका ने बताया—
“वो तो शहर छोड़ गए हैं, उसके पापा के काम की वजह से।”
मैं— “और कुछ बताया? कोई नंबर या कुछ और?”
राधिका— “जब तुम्हारे पास कोई भी जानकारी नहीं है, तो मेरे पास कैसे होगी? और वो तो बहुत पहले से प्लान था जाने का। तुम्हें बताया नहीं होगा, या शायद बताना ज़रूरी नहीं समझा।”
राधिका का हर एक लफ़्ज़ मेरे कलेजे को चीरता हुआ जा रहा था।
और बहुत सारे सवाल...
पर शायद यही परिपक्वता का पहला पड़ाव है, जब समझ लेना चाहिए कि ज़िंदगी में सब सवालों के जवाब नहीं मिलते।
उस दिन मैं सारे अधूरे सवालों के साथ घर आ गया।
उस दिन पहली बार ज़िंदगी में लगा था कि उदास होना क्या होता है। किसी का यूँ चले जाना कैसा लगता है।
मेरी लगातार खुद से बहस के बाद मालूम पड़ा कि मुझे उसके जाने से ज़्यादा बुरा इस बात का लग रहा था कि वह मुझे बताकर क्यों नहीं गई।
क्या उसको मैं इतना भी समझदार नहीं लगा कि मैं इन सब चीज़ों को समझ पाऊँगा?
इतना तो मैच्योर था मैं, क्योंकि मेरे नाना भी बिना बताए चले गए थे इस दुनिया से। मैंने उनको भी किसी तरह समझा और माफ़ किया।
हद तो तब हो गई थी जब यहाँ के लोगों ने भी मुझे उस दिन नहीं बताया था, जिस दिन वो गए। मुझे दो दिन बाद पता लगा।
शायद तब भी इन्हें लगा होगा कि मैं इतना समझदार नहीं हूँ।
हालाँकि इस बार मुझे पता लग गया था पहले दिन ही।
और मुझे याद है, पहली बार मैं दुखी होकर रोया था।
बहुत रोया।
उस इंसान के साथ मेरा बचपन बीता हुआ था।
मेरा पूरा बचपन ननिहाल में बीता है।
दुख मुझे तब समझ आया।
पहले मैं सिर्फ़ चोट लगने पर रोया हुआ था, पर—
“किसी के चले जाने का दुख, चोट वाले दुख से कहीं ज़्यादा गहरा होता है।”
ख़ैर, वक़्त बीत जाता है तो घाव भी भर जाते हैं।
पर कभी सोचा नहीं था कि इतने दिनों बाद पूरी कहानी फिर से दोहराई जाएगी, और वह भी किसी और की वजह से।
मैं होटल से निकल आया।
कंपनी पीरियड में जितने दिन मिले थे, आज सुबह उनका आख़िरी दिन था।
मेरी कैब आने वाली ही होगी।
मेरी एक नज़र होटल के कॉरिडोर से होती हुई डाइनिंग हॉल तक गई और वापस आकर रिसेप्शन पर रुक गई, चेक-आउट की औपचारिकताओं के लिए।
फिर मैं भी आम ज़िंदगी की भागदौड़ में व्यस्त हो गया।
मुझे वह पंक्ति बड़ी अच्छी लगती है—
“मोहब्बत के सिवा ज़िंदगी में और भी दुख हैं, फ़राज़।
चाहतें और भी हैं...”
करीब-करीब एक हफ़्ते बाद मुझे वह लड़की दिखी जो मुझे होटल में मिली थी।
ख़ैर, मैं तो उसका नाम भी नहीं जानता था।
वह बस मेरी एक सहकर्मी थी।
जॉइन होने के दो महीने तक हमारी कभी कोई ख़ास बात नहीं हुई।
हाँ, एक बार उसने मुझसे ब्लैक पेन माँगा था और फिर वह रख भी लिया था।
मुझे बस इतना याद था।
एक-आध बार कोई चीज़ पूछ ली होगी जो उसे समझ नहीं आई हो।
बस इतना ही संवाद हुआ था।
अगले महीने कुछ लोगों का समूह ट्रेनिंग पर जाने वाला था और उसमें हम दोनों का नाम था।
मैंने भी जाने से एक दिन पहले देखा।
असल में मैंने उसी दिन देख लिया था जिस दिन निर्णय हुआ था, लेकिन उसमें और भी लोग थे।
जाने से एक रात पहले मैं घर जाने के लिए कैब बुक कर रहा था कि मुझे श्रेया दिखाई दी।
मैं आपको नाम बताना भूल गया था।
उस लड़की का नाम श्रेया है।
वह अपने फोन में हमेशा मसरूफ़ रहती है।
मैंने भी धीरे से कहा—
“हेलो।”
उसने दो सेकंड का समय लिया, फिर बोली—
“ओह, सॉरी! मेरा ध्यान फोन में था। हाय, कैसे हो?”
हैंडशेक हुआ।
फिर हमारी बात ट्रेनिंग को लेकर हुई।
उसने कहा—
“हम मुंबई घूमकर आएँगे पूरा।”
असल में हम ट्रेनिंग के लिए मुंबई जा रहे थे।
सपनों की नगरी मुंबई, मेरी जान...
ऐसा लोग कहते हैं मुंबई के बारे में।
आमतौर पर जब हम किसी को देखते हैं, तो हमारे दिमाग में उस शख़्स को लेकर एक तस्वीर बन जाती है।
मेरे भी बनती हैं।
लेकिन इस बार कुछ नहीं बना।
बस जैसा है, वैसा ही...
...एक भी ख़याल नहीं।
और मैं भी थोड़ा अपने बर्ताव को लेकर हैरान था। शायद मन इस बार इस इंसान को जैसा है, वैसा ही समझना चाहता था।
उसकी हँसी अच्छी लगती है मुझे।
अच्छा हँसती है।
मेरी तरह झूठी हँसी नहीं है।
मैं भी बहुत हँसता हूँ, पर मुझे खुद को पता है कि यह हँसी असल में है ही नहीं। यह तो बस लोगों को दिखाने के लिए है।
शायद इसी लिए श्रेया की कोई पूर्वधारणा नहीं बनी, क्योंकि उसमें मैं खुद को देख रहा था।
पाँच-छह साल पहले वाला रवि देख रहा था।
मैं भी कितना बुद्धू हूँ, मेरा नाम रवि है।
अक्सर मैं खुद को बताना भूल जाता हूँ। दूसरे को सुनने में इतना मसरूफ़ हो जाता हूँ।
चेहरे पर हँसी का झूठा मुखौटा कब स्थायी बन जाता है, हमें खुद नहीं पता लगता।
हमें समझ भी तब आता है जब हम ऐसे किसी इंसान से टकराएँ जो बिल्कुल जैसा दिखता है, वैसा ही हो।
शायद मैं कह सकता हूँ कि मुझे थोड़ी-बहुत परख हो गई है इंसानों की।
किसी-किसी को देखकर लगता है कि जितने भी लेखक, कवि हुए हैं, सच ही कहते होंगे।
आख़िर इतनी तारीफ़ मैं क्यों कर रहा हूँ?
आपसे पहले यह ख़याल मेरे दिल में हज़ारों दफ़ा आ गया है।
और फिर मेरे अंदर से एक जवाब निकलकर आया...
हमारी फ़्लाइट शाम के 5 बजे थी।
हम सब शाम को 4 बजे एयरपोर्ट पर मिले।
सबको पहली बार एयरलाइन यूनिफ़ॉर्म के अलावा देखा।
जब आप लोगों को एक ही यूनिफ़ॉर्म में रोज़ देखते हो, उसी अंदाज़ में, तो उनकी वही छवि दिमाग में छप जाती है।
लेकिन जैसे ही उन्हें उनके पसंद के कपड़ों में, उनके आरामदायक अंदाज़ में देखते हैं, उसकी कुछ बात ही और होती है।
क्योंकि यही वह अंदाज़ है जो उन्होंने खुद अपने लिए चुना है।
अपने आप को बाहर दिखाने के लिए।
अपने आप के लिए।
शायद इस अंदाज़ में हम खुद को देखते हैं तो काफ़ी हद तक पसंद करते हैं।
इसकी सबसे अच्छी बात जो मुझे लगी, वह यह है कि इसमें हमारे पास आज़ादी होती है।
बदलने की।
अपडेट करने की।
अगर अच्छा नहीं लगा तो हम बदल देते हैं।
कुछ ऐसी ही आज़ादी ज़िंदगी में भी होती है बदलने की।
है भी...
और नहीं भी।
कुछ में हालात नहीं बदलने देते।
कुछ में हम बदल नहीं सकते।
और इस पर मेरे दोहरे विचार हैं।
पहला तो यह कि हाँ, हमें अपनी ज़रूरत के हिसाब से, अपनी सहूलियत से बदल लेना चाहिए।
आख़िर बदलने में हरज ही क्या है?
दूसरा यह है कि अगर यही आदत बन गई हमारी ज़िंदगी में, तो हम स्थिर कैसे हो पाएँगे?
खुद के साथ।
किसी और के साथ।
रिश्तों में।
उन चीज़ों में जो ठहराव माँगती हैं।
क्योंकि कभी कोई छोटी सी बात हमें अच्छी नहीं लगी, या कुछ हुआ, तो हम वही करेंगे जो हमारी आदत बन चुकी है—बदल जाना।
इसका मैंने अपने लिए एक उपाय निकाला है कि दोनों विचारों का संतुलन बहुत ज़रूरी है।
यह कहना बड़ी मूर्खता होगी कि कोई एक ग़लत है।
दोनों अपनी जगह बिल्कुल सही हैं।
बस हमें पता होना चाहिए कि कब कौन-सा विचार उपयोग में लाना है।
हमें इस पर बहस करने की बजाय कि दोनों में से कौन सही है, दोनों परिस्थितियों को अच्छे से समझने की ज़रूरत है।
ख़ैर...
वह अपनी एक सहेली के साथ, जो मालूम पड़ा कि अभी-अभी बनी है, फोटो खिंचवाने में व्यस्त हो गई।
और मैं भी फोन में कुछ ढूँढ़ने लगा...
...जिससे खुद को किसी चीज़ में मसरूफ़ दिखा सकूँ।
ख़ैर, कुछ ही पल के बाद हम सब साथ बैठे थे। बस इधर-उधर की बातें चल रही थीं। मैं बड़े इत्मीनान से बातें सुन रहा था। मुझे कोई जल्दी नहीं थी।
मैंने महसूस किया कि एक हल्की सी खुशी थी मेरे चेहरे पर। और यह न तो मुंबई जाने की थी।
हाँ, शायद इस बात की थी कि...
ख़ैर, वैसे अभी तक इतनी कोई बात हुई नहीं थी।
हम चढ़े साथ में थे, लेकिन उतरते समय सब अपने हिसाब से आ रहे थे।
मुझे लगा मैं सबसे पीछे हूँ, पर मैं उनमें सबसे आगे निकल आया।
मैंने इंतज़ार भी खूब किया था। बार-बार पीछे मुड़कर भी देखा, पर शायद—
“इतना इंतज़ार काफ़ी नहीं होता।”
मुझे थोड़ा और समय देना चाहिए था।
यह बात मेरे एक सहकर्मी ने कही—
“तुम थोड़ा और वेट कर सकते थे। जब हम साथ आए हैं तो साथ ही जाना चाहिए।”
मैंने जैसे सुना भी और नहीं भी।
मैं बहुत से लोगों की बातों के साथ ऐसा ही करता हूँ।
अगर कोई मुझे हेलो बोलता है, तो या तो मैं बहुत देर बाद प्रतिक्रिया देता हूँ या बिल्कुल ही अनदेखा कर जाता हूँ।
यह बात मेरे एक अज़ीज़ दोस्त ने कई दफ़ा कही है मुझे।
वह मेरे काफ़ी साथ रहा है।
पर सच में मैं ऐसा जानबूझकर नहीं करता।
लोगों को लगता ऐसा है।
यही तो भ्रम है ना?
हमें लगता है किसी के बारे में कुछ और है, जबकि होता कुछ और है।
सारा खेल ही धारणा का है।
अब इसमें जो लोग आपको अच्छे से जानते हैं, उनको सच्चाई पता होती है। पर जो नहीं जानते, वे आपकी बनाई हुई धारणा से ही आपको परखेंगे।
यही हम करते हैं।
तभी मैं लोगों के बारे में जितना हो सके, उतनी कम धारणा बनाने की कोशिश करता हूँ।
मैंने एक बहुत अच्छी बात सुनी थी, जो इससे बिल्कुल मिलती-जुलती है—
“न मैं आपके बारे में बुरा सोचता हूँ, न मैं आपके बारे में अच्छा सोचता हूँ।
दरअसल, मैं आपके बारे में सोचता ही नहीं हूँ।”
तो जब आप किसी के बारे में सोचते ही नहीं हैं, तब धारणा बनने की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।
हम शाम के समय होटल पहुँचे।
हमारा होटल अलग-अलग था।
उसने एयरपोर्ट पर हल्की सी आँख मटकाते हुए कहा—
“यार, एक साथ ही होना चाहिए था ना?”
मैंने भी जवाब में एक हल्की सी मुस्कान भेज दी।
वैसे सच कहूँ तो हँसते रहना चाहिए।
और कुछ नहीं तो सामने वाले की आपके प्रति धारणा ही सकारात्मक हो जाती है।
ख़ैर, हम सब अपने-अपने होटल चले गए।
देर रात खाना खाने के बाद सो गए।
सुबह ट्रेनिंग के लिए निकलना था।
जीवन में हमारे बहुत से लोग आते हैं।
उस समय भी थे।
पर उसके मिलने में, “हाय” बोलने में, कोई दिखावा या बनावटीपन नहीं लगता था।
हाँ, शायद यही बात मुझे उसकी पसंद आई थी।
शालिनी ने यह पूछा था।
अगर वह मिलेगी तो मैं उसे यही बताऊँगा।
श्रेया ने अभी पूछा नहीं।
वो जो लोग होते हैं ना, जो अपनेपन से मिलते हैं।
और मुझे थोड़े समय बाद पता चला कि वह सबसे ही ऐसे मिलती है।
बड़े खुले दिल से।
ऐसे लोग बहुत कम रहे हैं।
आपके मिलने मात्र से, कुछ बोलने से, आपकी मुस्कान से अगर आप किसी दूसरे को अच्छा महसूस करवा रहे हो—
That’s the best thing you can give to someone else.
हम सबने कुछ न कुछ अच्छा पढ़ रखा होता है या सुन रखा होता है।
मैंने भी सुना था कि जब आप किसी के साथ यात्रा करते हैं, तब आप उस इंसान को सबसे ज़्यादा जान पाते...
...हो।
मतलब कि अगर आपको किसी व्यक्ति को जानना है, तो उसके साथ यात्रा करो।
हम भी शाम को मुंबई घूमने चले गए थे।
मैं थोड़ा देर से पहुँचा।
ज़्यादा नहीं, लेकिन फिर भी देर, देर होती है।
लेकिन मेरे पहुँचते ही उसके चेहरे पर जो खुशी थी, वह बिल्कुल सच्ची थी।
मतलब मेरे सोचने से भी ज़्यादा।
मैं उससे नौकरी के अलावा पहली बार बाहर मिल रहा था और वह बिल्कुल एक अलग इंसान थी।
जितना मैं सोच रहा था, उससे भी कहीं ज़्यादा खुशमिज़ाज।
हाँ, अब इस मुकाम पर आने के बाद आप थोड़ा-बहुत अपने आसपास के लोगों के बारे में सोचने लग जाते हो।
उसकी सबसे अलग बात थी उसका वह प्यारा सा मुँह बनाना।
जब एक आदमी एक औरत को लिखता है, उसको वर्णित करता है, तो वह उसकी ख़ूबसूरती, उसके शरीर के बारे में लिखता है।
यह बात मेरे एक दोस्त ने कही थी।
यह कहीं न कहीं सच भी है, पर यह आधा सच है।
आप यह तब तक ही कर रहे हो जब तक आप उसको जानते नहीं हो।
अब जिससे बात भी नहीं की, उसके बारे में अगर कोई लिखेगा तो और क्या लिखेगा?
तो इसमें आदमी और औरत कहाँ से आ जाएँगे?
जब वह पुरुष उस स्त्री को जान जाता है, तब वह भी उसके दुखों, उसके घावों को उतनी ही गहराई से देखता और लिखता है, जितनी गहराई से वह बिना जाने उस स्त्री के शरीर की प्रशंसा कर रहा था।
यह इस समाज का बचपना है कि जिस चीज़ के बारे में लिखने या बोलने से बात जल्दी फैलती है, उसी को लिखते हैं।
यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे मेरे सामने किसी के साथ ग़लत हो रहा हो और मैं उस पर लिखने या बोलने की बजाय बाकी चीज़ों को प्राथमिकता दे रहा हूँ।
हाँ, इस पर कोई संदेह नहीं कि हम स्त्री को थोड़ा और बेहतर ढंग से लिख सकते थे।
हमें यह लिखने की ज़रूरत नहीं थी कि—
“एक गोरे रंग की लंबी सी लड़की...”
क्यों?
क्या साँवले रंग की लड़कियाँ अच्छी नहीं होतीं?
क्या कम कद की लड़कियाँ समझदार नहीं होतीं?
बेशक इन चीज़ों ने समाज में सुंदर दिखने के पैमाने बना दिए थे।
और वे आज भी चल रहे हैं।
मैं यह बात मानता हूँ कि अगर उस समय लोगों को जैसा वे थे, वैसा ही चित्रित किया गया होता, तो आज इसके मायने कुछ हद तक अलग होते।
फिर मेरे दिमाग में एक ख़याल आया—
क्यों मुझे एक साँवले रंग की लड़की अच्छी नहीं लग सकती?
जब आप ऐसे सवाल खुद से करने लग जाते हो, तब आप समाज में नई सोच पैदा करते हो।
आप पहले से बने हुए सारे मायनों को चुनौती देने लगते हो।
हम इस बीच कई दफ़ा साथ घूमने गए।
हर बार उसे थोड़ा और क़रीब से जाना।
थोड़ी और बातें कीं।
कुछ व्यक्तिगत, कुछ पेशेवर।
कुछ मैंने बताईं, कुछ मैंने उससे सुनीं।
आम तौर पर ऐसा होता है कि जब हम अपने भीतर का कोई हिस्सा किसी के साथ साझा करते हैं, तो शुरुआत में एक झिझक होती है कि करना चाहिए या नहीं।
और लोग पूछते भी हैं—
“क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकती हूँ?”
हालाँकि यह पूछने वाला हिस्सा मुझे आज तक समझ नहीं आया।
क्योंकि जो चोर है, वह थोड़ी बताएगा कि मैं चोर हूँ।
पर एक बात ज़रूर है।
जब सामने वाला इंसान आपकी आँखों में आँखें डालकर पूछता है—
“Can I trust you?”
तो एक पल के लिए जवाब आने से पहले ही बहुत कुछ पता चल जाता है।
घर के बाहर वाली दुनिया में देखा जाए तो आज़ादी बहुत ज़्यादा है।
क्योंकि उन लोगों को हम खुद चुनते हैं।
हम खुद इजाज़त देते हैं उन्हें अपनी ज़िंदगी में आने की।
मैं भी जैसे उसे एक खुली किताब की तरह पढ़ रहा था।
वह बाकी किसी भी चीज़ के...
...बारे में बोल देना, किसी भी मज़ाक पर खुलकर हँस देना, बिना किसी की परवाह किए कि कोई क्या सोचेगा।
मैं तो मन ही मन कहता था—
“ऐसे ही हँसो, भाड़ में जाए दुनिया।”
ज़्यादा कुछ नहीं, बस उस हँसते हुए चेहरे की तस्वीर ने जैसे मेरे मन में घर कर लिया था।
इंट्रोवर्ट और एक्स्ट्रोवर्ट का एक सरल सा खेल समझ आया मुझे उससे मिलकर।
श्रेया से जब मैं वर्क स्टेशन पर मिला या उसके साथ काम कर रहा था, तो कम से कम तीन महीने साथ काम करने के बाद हर कोई यही कहेगा कि यह बहुत ज़्यादा इंट्रोवर्ट है।
और मेरी भी यही राय थी श्रेया के बारे में।
पर अब मेरी राय बिल्कुल अलग है।
श्रेया ने चुना ही कहाँ था कि उसे कहाँ इंट्रोवर्ट होना है और कहाँ एक्स्ट्रोवर्ट।
क्योंकि वह बाहर बिल्कुल अलग थी।
पूरी तरह विपरीत।
ऐसा ही मैं हूँ।
वैसे तो मैं हर किसी से बात कर लेता हूँ, अगर मैं चाहूँ तो।
पर मैं ज़्यादातर चुप ही रहता हूँ।
अकेले बैठना पसंद करता हूँ, जब तक कि मेरे अपने लोगों में से कोई आकर मेरे पास न बैठ जाए।
“अकेले होने में और अकेलापन चुनने में फ़र्क होता है।”
शायद यही बहुत सी चीज़ें थीं जो हम दोनों में समान थीं।
एक दिन श्रेया ने कहा था—
“तुम बातें कितनी अच्छी करते हो, कहाँ से आती हैं?”
मैंने भी हँसकर कह दिया—
“पूरा टूटने के बाद खुद को जोड़े रखा है।”
उसे देखकर लगा नहीं कि उसके समझ आया होगा, पर उसे बात ठीक सी लगी।
श्रेया अब भी रोज़ नौकरी पर आती है।
वह कहाँ रहती है, इस बात की भी ख़बर मुझे रहती है।
फिर भी प्रतिक्रिया ऐसे देता हूँ जैसे मुझे कुछ पता ही नहीं।
एक दिन मुझे कुछ एहसास हुआ।
उसको लेकर।
एक पल को लेकर।
एक तरह का अधिकार-बोध।
जो बिल्कुल वैसा था जैसा मेरे अतीत में छह महीने पहले हुआ था।
मैं फिर से बताना भूल गया।
पाँच महीने पहले मेरा ब्रेकअप हुआ था।
अच्छा, एक बात ब्रेकअप को लेकर मैं बता दूँ।
जब रिश्ता टूटने वाला होता है, तो हमें पता होता है कि चीज़ें कहाँ से ख़राब होना शुरू हुईं।
यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है।
मेरे मामले में तो ऐसा ही हुआ।
कम से कम तीन-चार महीने लगे टूटने में।
श्रेया का भी ब्रेकअप हुआ था, उसने बताया था।
हाल-फिलहाल में ही हुआ था।
पर मुझे यह एक दिन वाला समझ नहीं आया।
एक दिन में ब्रेकअप कैसे हो सकता है?
ख़ैर, चलो...
सबकी अपनी-अपनी ज़िंदगी है।
मैं तो यही कहूँगा—
खुशनसीब हैं वो लोग जिन्हें एक ही झटके में मौत मिली।
बदनसीब तो वो हैं जो पल-पल मरे।
लगाव मुझे डराता है।
या दूसरे शब्दों में कहूँ तो, जिनसे हम जुड़ जाते हैं, या जिन्हें जानने के बाद और जानना चाहते हैं, उन्हें किसी दूसरे के साथ वैसे नहीं देख पाते।
पता नहीं यह कैसी अजीब सी भावना है।
पर अब खुद से तो झूठ नहीं बोल सकते।
नहीं अच्छा लगता उसका किसी और से यूँ क़रीब होकर बात करना, जैसे वह मुझसे करती है।
हाँ, यह भी सच है कि मरते दम तक उसको यह बात बताएँगे नहीं।
लेकिन यह उम्मीद भी रखते हैं कि उसको समझ आ जाए।
हर बात बताई नहीं जाती।
कुछ महसूस भी होनी चाहिए।
वही मुझे उस पल श्रेया के साथ हुआ।
और उस वक़्त मुझे एहसास हुआ कि वैसे तो टूटने को मेरे अंदर कुछ बचा नहीं है, पर इस बार टूटा तो शायद जुड़ नहीं पाऊँगा।
तो बस...
अब मैं उससे उतना ही मिलता हूँ जितना संयोग में लिखा होता है...!

